आज जो देखा #गांवदेहात #गांवपरधानी

“मेरे पास परधानी की तीन चार झकाझक, सनसनीखेज खबरें हैं। पर सुनाऊंगा तभी जब बढ़िया हलुवा बनेगा। और एक खबर, जो बहुत ही खास है, वह तो तभी सुनाऊंगा, जब हलुये में काजू किशमिश भी पड़ेगा।”


#गांवपरधानी की हलचल पीक पर है। हर उम्मीदवार कह रहा है कि वह जीत रहा है। सुनने में आ रहा है पैसा बंटने लगा है। पुचकारने और धमकाने की बातें सुनने में आ रही हैं। परधानी और जिलापंचायत के उम्मीदवारों में वोट ट्रांसफर के डील भी हो रहे हैं। यहां प्रधानी के लिये सीट शेड्यूल कास्ट – महिला के लिये आरक्षित है। महिला उम्मीदवार केवल पोस्टर पर हैं। नाम और प्रचार उनके पति या पुत्र का ही हो रहा है।

महिला उम्मीदवार केवल पोस्टर पर हैं। नाम और प्रचार उनके पति या पुत्र का ही हो रहा है।

महिला उम्मीदवार अपने बूते पर, अपने लिए चुनाव लड़ने में सशक्त बनने में अभी कम से कम 15 साल लगेंगे। अभी तो उनका केवल नाम का ही प्रयोग उनके पति/पुत्र/स्वसुर कर रहे हैं। … कम से कम पिछले पांच साल में महिला प्रत्याशी की हैसियत में कोई बदलाव मैंने तो नहीं पाया।

एक चीज बड़ी साफ नजर आ रही है। शिड्यूल कास्ट उम्मीदवार या उनके प्रचारक भले ही कुछ मैले कपड़े में आते हैं, पर उनकी स्थानीय राजनीति की समझ और चुनाव जिताने के घटकों का चतुराई से प्रयोग वे बखूबी समझते हैं। उत्तरोत्तर चुनावों नें उन्हे राजनीति सिखा दी है। और शायद इसी समझ से वे आमचुनावों में भी वोट करते हैं। पंचायती चुनावों नें समाज को बांटा जरूर है, पर प्रजातंत्र को मजबूत किया है। सामन्ती पकड़ बहुत धसकी है!

मेरा और मेरी पत्नीजी का इस प्रधानी-पंचायती चुनाव से “बाजार से गुजरा हूं, खरीददार नहीं हूं” वाला नाता है। लिहाजा स्थानीय खबरों, अफवाहों और आकलन का जो कुछ पता चलता है उसे पसस्पर शेयर करने का आनंद लिया जा रहा है। कल तो मैंने ब्लैकमेल किया; बोला – “मेरे पास परधानी की तीन चार झकाझक, सनसनीखेज खबरें हैं। पर सुनाऊंगा तभी जब बढ़िया हलुवा बनेगा। और एक खबर, जो बहुत ही खास है, वह तो तभी सुनाऊंगा, जब हलुये में काजू किशमिश भी पड़ेगा।” 😆

और आप यकीन मानिये हलुआ बना, और शानदार बना! काजू किशमिश भी मजे से पड़ा! परधानी-पंचायती चुनाव की खबर की लोकल टीआरपी मैंने खूब भुनाई! 😀

गांवदेहात में गेंहूं की थ्रेशिंग से जो धूल उठ रही है, उससे बचने के लिये भी मास्क ज्यादा फायदेमंद है।

कोरोना बढ़ रहा है। आज मुझे कुछ ज्यादा लोग मास्क लगाये दिखे। गांवदेहात में गेंहूं की थ्रेशिंग से जो धूल उठ रही है, उससे बचने के लिये भी मास्क ज्यादा फायदेमंद है। गेंहू की कटाई में लगे लोग भी या तो गमछा बांधे हैं, या मास्क लगाये हैं।

लेवल क्रासिंग पर मिला किसान जो गेंहू के गठ्ठर बनाने के लिये पुआल की रस्सी ले कर जा रहा था, बोला था – हफ्ता भर में खेत साफ हो जायेंगे। वही लगता है।

वैसे जितनी तेजी से गेंहूं की कटाई, थ्रेशिंग हो रही है, उसके अनुसार खेत बिल्कुल खाली हो जायेंगे पंद्रह अप्रेल तक। लेवल क्रासिंग पर मिला किसान जो गेंहू के गठ्ठर बनाने के लिये पुआल की रस्सी ले कर जा रहा था, बोला था – हफ्ता भर में खेत साफ हो जायेंगे। वही लगता है।

गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नीलाल पाण्डेय की स्थानीय समझ का मैं कायल हूं। कल उन्होने बड़े काम की बात बताई। “अभी जो गले में हाथ डाल कर घूम रहे हैं, जो डील कर रहे हैं वोटों की। वह सौहार्द ज्यादा दिन टिकने वाला नहीं है। साल भर में ही विधानसभा चुनाव आयेंगे। तब ये सारी लोकल समीकरण पलट जायेंगी। जो आज दोस्त हैं, कल वे विपरीत खेमे में चले जायेंगे। विधान सभा के लिये टिकट अगर एक के मनमाफिक आया तो दूसरा (जो अभी मित्र/पट्टीदार बना घूम रहा है); डाह के मारे शत्रु बन जायेगा या जड़ खोदने में लग जायेगा।”

इमली को वोट दो। यह अजब गजब टोपी पहने आदमी आज दिखा प्रचार करता हुआ।

यह सब समाज, कुटुम्ब, परिवार, जाति का विग्रह भले कराये; प्रजातंत्र तो मजबूत हो रहा है। लोग ‘परजा (प्रजा)’ होने के फ्रेम ऑफ माइण्ड से मुक्त हो कर अपने वोट की ताकत समझ रहे हैं।

अच्छा ही है!


ढूंढी बोले – बहनोई, मानसम्मान ही बड़ी चीज है, #गांवपरधानी का क्या!

ढूंढी प्रधानी के व्युह से अलग हो दार्शनिक टाइप हो गये थे। हर आदमी हो जाता है! पर अच्छा लगा ढूंढी का आ कर मिलना और बोलना बतियाना।


परधानी चुनाव में पहले तय हुआ कि गांव की सीट ओबीसी-महिला की होगी। चौदह उम्मीदवार अपना प्रचार करने लगे। सबसे पहले मिले थे मुझे ढूंढी यादव। छ मार्च की उनपर ट्वीट है –

उसके बाद एक ब्लॉग पोस्ट का हेडर भी ढूंढी के नाम गया। मेरे हिसाब से ढूंढी एक स्टार उम्मीदवार थे। पर तभी लोग हाईकोर्ट पंहुच गये और वहां से परधानी-पंचायती का रोस्टर बदलवाने का आदेश झटक लाये। अब यह सीट ओबीसी की बजाय शिडूल कास्ट महिला के नाम हो गयी।

ढूंढी और अन्य लटक गये। अब नये नये उम्मीदवार सामने हैं। नये समीकरण। अभी सवेरे छठ्ठन घर पर आये थे। उनकी पतोहू को कोट का चुनावचिन्ह मिला है। अभी पेम्फलेट छपा नहीं पर प्रिण्टिंग प्रेस वाले से कोट का चुनाव-चित्र ले कर ही प्रचार के लिये निकल पड़े छठ्ठन। पंद्रह अप्रेल को वोट पड़ेंगे। एक एक दिन महत्वपूर्ण है!

छ्ठ्ठन बिना उम्मीदवार के नाम का पर्ची ले कर प्रचार करने निकल लिये।

छठ्ठन रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग में गेट मैन थे। हण्डिया में पोस्ट थे। वीआरएस ले कर अपने लड़के को नौकरी दिलवाई। लड़के की पत्नी उम्मीदवार है। रेलवे की गेटमैनी-गैंगमैनी में भी ताकत है प्रधानी का चुनाव लड़ने की! जब पहले ओबीसी के नाम थी यह सीट तो मेरे पुराने बंगलो-पियुन भरतलाल की पत्नी भी चुनाव में खड़ी थी। कुल मिला कर रेलवे का जलवा है! 😆

खैर, ढूंढी पर लौटा जाये। वे अपने घर पर अक्सर दिख जाते हैं। घर हाईवे की सर्विस लेन से सटा है। चलते हुये उन्हे देखता हूं तो वे ऊंची आवाज में कहते हैं – जीजा परनाम!

ढूंढी यादव

आज उन्होने मुझे रोका। पास आ कर चरण छुये। मैंने हाल चाल पूछा तो बोले – “अब ऊ (परधानी का चक्कर) त नाहीं रहा। अब तो अपने बात व्यवहार की ही बात है। और बहनोई परधानी का क्या? आज कोई है, कल कोई। अपना मान सम्मान बड़ी चीज है। वही बना रहे। आप लोगन की किरपा बनी रहे। बस यही चाहिये।” ढूंढी प्रधानी के व्युह से अलग हो दार्शनिक टाइप हो गये थे। हर आदमी हो जाता है! पर अच्छा लगा ढूंढी का आ कर मिलना और बोलना बतियाना। अन्यथा पुराने परधानी के केण्डीडेट तो अब नजर ही नहीं आते।

उन्होने जोर से बोला – अरे, गमछवा लियाउ रे! फिर गमछा पहन कर हाथ जोड़ते पोज में एक चित्र खिंचवाया।

मैं उनका चित्र लेने लगा तो उन्हे अपने मेक-अप का ध्यान हो आया। अपने नाती को उन्होने जोर से बोला – अरे, गमछवा लियाउ रे! फिर गमछा पहन कर हाथ जोड़ते पोज में एक चित्र खिंचवाया।

इस मुलाकात से यह मन बना – अगली बारी अगर ओबीसी की सीट बनी प्रधानी की तो वोट ढूंढी को दे दूंगा!


#गांवपरधानी; अब होली का रंग चढ़ने लगा है, गांव में!

मुझे पता नहीं कि बुज्जू भांग में रुचि रखते हैं या नहीं। पर उनकी सवेरे सवेरे कही बात मुझे कहीं गुदगुदा गयी! होली आने को है। ऐसे में यह जवान मुझे रेल के विभाग के शीर्ष से गांवपरधानी पर उतार रहा है और मुझे जिताने का जिम्मा ले रहा है। 😀


होलिका दहन की तैयारियां होने लगी हैं। पेड़ों की टहनियां काट कर इधर उधर उनका स्तूप बनने लगा है। लोगों के मन में भी होली की मस्ती आती जा रही है। सवेरे सात-आठ बजे तक एक चक्कर लगा लेता हूँ, गांव का। इतनी जल्दी भांग-ठण्डई छानने का कोई प्रावधान परम्परा में नहीं है; पर लोगों की हंसी-ठिठोली देख सुन कर लगता है कि विजया चढ़ गयी हो!

श्रीनिवास दुबे (बुज्जू), स्वर्गीय संत भाई के बड़े बेटे

बुज्जू (श्रीनिवास दुबे), स्वर्गीय संत भाई जी के पुत्र – शायद सबसे बड़े पुत्र – अपने घर से बोलते हैं – “फूफा जी, प्रणाम।” उनके घर के कुंये को देख कर मेरे मन में उसे खनाये जाने का इतिहास जानने का कौतूहल मेरे मन में हाल ही में जगा है। उस बारे में पूछने के लिये उनके घर की ओर मुड़ गया। जानकारी उनके चाचाजी – कैलाश भाई से मिल सकती थी, पर वे घर पर नहीं थे। इधर उधर की कुछ बात कर मैं चलने को हुआ। तब यूंही पूछ लिया – “परधानी का क्या होने जा रहा है?”

“परधानी अब जनरल होने जा रही है और आपको उम्मीदवार बनना है; फुफ्फा। आप होंगे तो इस गांव का विकास होगा। बाकी लोग तो अपना अपना देखते हैं।” – बुज्जू ने कहा। फिर अपना हाथ अपने सीने पर रख कर जोड़ा – “आपका पर्चा मैं दाखिल करूंगा। आपके नाम से कोई और खड़ा नहीं होगा। आपका जीतना तय है। बस, आप मना मत करियेगा।”

मुझे पता नहीं कि बुज्जू भांग में रुचि रखते हैं या नहीं। पर उनकी सवेरे सवेरे कही बात मुझे कहीं गुदगुदा गयी! होली आने को है। ऐसे में यह जवान मुझे रेल के विभाग के शीर्ष से गांवपरधानी पर उतार रहा है और मुझे जिताने का जिम्मा ले रहा है। 😀

“परधानी जनरल होने जा रही है और आपको उम्मीदवार बनना है; फुफ्फा। आप होंगे तो इस गांव का विकास होगा। बाकी लोग तो अपना अपना देखते हैं।” – बुज्जू ने कहा। फिर जोड़ा – “आपका पर्चा मैं दाखिल करूंगा। आपका जीतना तय है।”

गांव की बभनौटी। कुल मिला कर बीस घर होंगे। बीस घरों में बीस परधानी के पोटेंशियल कैण्डीडेट। सब साल दो साल से दण्ड-बैठक करते रहे। पूरी गम्भीरता से अपना अपना दांव-गणित बिठाते रहे। अब रोस्टर प्वॉइण्ट बदलने के साथ ब्राह्मणों के लिये पंचायत चुनाव गंवई राजनैतिक मल्लयुद्ध की बजाय होली के परिहास की बात भर रह गया है। और बुज्जू मुझे इस ‘घोर कर्म’ की कीचड़ में घसीटना चाहता है – होलियाना अंदाज में। 😆

होलिका दहन की तैयारी

बाभन साल-दो साल उछलकूद मचाये। समाजसेवा में बाजी मारने की होड़ लगती रही। किसी के घर कोई बीमार हो जाये तो उसे अस्पताल ले जाने के लिये चार चार पोटेंशियल केण्डीडेट अपनी चार चक्का गाड़ी ले कर दौड़ते थे। कोई मर जाये तो उस परिवार की बजाय ये परधानी प्रत्याशी ज्यादा मुंह लटकाये दिखते थे।

उसके बाद ओबीसी वाले उछले। उनके पोस्टर-बैनर लगे और फटे। वे भी ताजा बनते गुड़ के उफान की तरह उठे और बैठ गये। अब सुना है कि सीट शेड्यूल कास्ट महिला के खाते जा रही है। अब उनके मन में लड्डू फूटने का अवसर है।

भगवानदास कहता था परधानी के इतने उम्मीदवार हैं, कोई बाटी चोखा नहीं खिला रहा!

और तो और; अब तक उमेश की किराना दुकान पर बैठा भगवानदास सरोज, जो अब तक मुझे यही बताता रहा कि चौदह परधानी के केण्डीडेट हैं, पर कोई बाटी चोखा नहीं खिला रहा; अब खुद अपना केण्डीडेचर घोषित कर हाथजोड़क मुद्रा में आ गया है!

भगवानदास ने कहा कि वह बाटी चोखा खिलायेगा। उमेश की किराना दुकान के पास ही आयोजन होगा और मुझे बाकायदा निमंत्रण देगा।

भगवानदास उर्फ मुसई अब हाथ जोड़ने की मुद्रा में

होली का मौसम है। वातावरण में बौर की गंध है। टिकोरे भी बड़े हो रहे हैं। साथ ही, इस साल एक महीने में परधानी के तीन तीन रंग देखने को मिल गये हैं। इस साल स्पेशल रहेगी होली।


लालजी यादव का काम कराने का मंत्र – बाभन खाये, लाला पाये

लालजी समाजवादी ब्रिगेड के बढ़े प्रभुत्व के आईकॉन हैं। उनकी तुलना मैंने ‘गणदेवता’ के श्रीहरि पाल से की; पर आज बदलते गांव का जितना सशक्त चरित्र लालजी है; उतना ताराबाबू का छिरू पाल नहीं है।


परधानी के चुनाव में माननीय हाईकोर्ट के डायरेक्टिव के कारण फच्चर फंस गया है। अब सत्ताईस मार्च तक तय होगा कि #गांवपरधानी वर्तमान के अनुसार ओबीसी महिला के खाते रिजर्व रहेगी, या आरक्षण बदल जायेगा। पहले एक दर्जन से ज्यादा प्रत्याशियों के श्वसुर, बेटे या पति ताल ठोंक रहे थे। उनमें से प्रमुखतम थे लालजी यादव।

अब लालजी की दावेदारी रहेगी या नहीं, सत्ताईस मार्च को पता चलेगा। फिलहाल लालजी ने ह्वाट्सएप्प पर एक स्कूप पढ़ाया – ब्लॉक दफ्तर में जो अनुशंसा की गयी है, उसके अनुसार विक्रमपुर गांव की प्रधानी अनुसूचित जाति के खाते जायेगी।

शायद अनुसूचित वर्ग को भी लालजी का यह स्कूप मिल गया है। वहां भी ख्याली लड्डू फूटने लगे हैं! 🙂

Lalji Yadav
लालजी यादव, #गांवपरधानी का एक सशक्त दावेदार

आरक्षण बिंदु के बदलाव की सम्भावना के कारण लालजी यादव ‘स्थितप्रज्ञता’ में आ गये हैं। वर्ना उनका चरित्र ताराशंकर बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘गणदेवता’ के श्रीहरि या छिरू पाल जैसा है। लालजी के पास हाईवे पर ट्रक-ढाबा है। कई ट्रेक्टर हैं। शायद ट्रक और जेसीबी मशीन भी हैं। गांव और आसपास में जो भी आर्थिक गतिविधियां हैं उनमें लालजी की दखल या रुचि है। और उस सब के बल पर उनका सामाजिक कद भी पिछले दशकों में बढ़ा है।

“पोस्टर-बैनर वह छपाये, लगाये जिसकी शकल लोगों को नहीं मालूम। मुझे तो गांव में सब जानते हैं। मुझे पोस्टर लगाने की क्या जरूरत?!” – लाल जी ने कहा।

लालजी समाजवादी ब्रिगेड के बढ़े प्रभुत्व के आईकॉन हैं। उनकी तुलना मैंने ‘गणदेवता’ के श्रीहरि पाल से की; पर आज बदलते गांव का जितना सशक्त चरित्र लालजी है; उतना ताराबाबू का छिरू पाल नहीं है। छिरू पाल के चरित्र को मैंने उपन्यास में पढ़ा है और लालजी को प्रत्यक्ष देखा है। बस फर्क यह भर है कि ताराशंकर बंद्योपाध्याय की कलम कालजयी उपन्यासकार की है और मेरी एक अनिच्छुक ब्लॉगर (reluctant blogger) की।

चाय का कप, स्मार्टफोन और अखबार लिये लालजी

जहां बाकी तेरह प्रधानी के उम्मीदवार बहुत खर्चा कर चुके हैं, लालजी ने केवल लोगों से मिल कर अपनी उम्मीदवारी का चेहरा भर दिखाया है। और लोगों के पोस्टर छपे, लगे और लगते ही नुच कर खतम भी हो गये। लालजी ने बताया कि उन्होने अब तक कोई पैसा खर्च नहीं किया चुनाव में। “पोस्टर-बैनर वह छपाये, लगाये जिसकी शकल लोगों को नहीं मालूम। मुझे तो गांव में सब जानते हैं। मुझे पोस्टर लगाने की क्या जरूरत?!” – लाल जी ने कहा। उनके यह कहने में जो आत्मविश्वास दिख रहा था, वह किसी और उम्मीदवार में नहीं दिखा। यह अलग बात है कि अगर आरक्षण के पिनप्वाइन्टिंग में परिवर्तन हो जाये तो लालजी परधानी की रेस से बाहर हो जायेंगे; वर्ना साम-दाम-दण्ड-भेद सबका खेला खेलने में लालजी फिट लग रहे थे।

“मैने तो संत भईया के लड़के से कहा भी; खर्चा करूंगा। खर्चा समय से करूंगा। खिलाऊंगा। सभी बाभनों को खिलाऊंगा। अच्छे से। आखिर वोट तो जैसे मिलता है, जानता हूं। ‘बाभन खाये लाला पाये’ से काम आते हैं।”

रागदरबारी में यह मंत्र शायद नहीं आया है – बाभन खाये, लाला पाये। बाभन को पूड़ी कचौड़ी, साग तरकारी, बुंदिया, खीर हलुआ आदि से साधा जाता है। वह नमक खा लेता है तो वोट देता है। या व्यापक अर्थों में ‘आपका काम’ करता है। लाला पैसे से सधता है। पुराने जमाने में लाला मतलब ब्यूरोक्रेसी। तब सारी मुनीमी, सारी कलम की ताकत लाला लोगों के पास थी। उस वर्ग को साधने का मंत्र है – पैसा।

मजे की बात है कि जिंदगी के छ दशक गुजर जाने और दुनियाँ में बहुत घिसने के बाद मुझे यह मंत्र बताया तो किसी चाणक्य या मेकियावली की परम्परा वाले बुद्धिजीवी ने नहीं। बताया लालजी यादव ने। और वह भी, अपने साले साहब – शैलेंद्र दुबे के घर पर चाय पीने न बैठा होता तो लालजी से मुलाकात भी न होती और यह ज्ञान भी न मिला होता! 😆

शैलेंद्र के नौकर ने चाय बना कर रखी। हमने भी पी और लाल जी ने भी। लाल जी थोड़ी देर बैठे। किसी काम से आये होंगे तो उसकी चर्चा नहीं हुई। शायद मेरे सामने वह न होने लायक हो। या शायद लालजी यूं ही मिलने चले आये हों। सवेरे शैलेंद्र का भाजपाई दरबार लगता है। उसमें भाजपाई-सपाई सम्पर्क भी शायद यूं होता हो। … कुल मिला कर यह लगा कि मेरी तरह साइकिल ले कर इधर उधर घूमने बोलने बतियाने की बजाय नेता लोगों की संगत करना, उनके सवेरे के ‘दरबार’ की बातें सुनना कहीं ज्यादा ज्ञानवर्धक होता है। गांवदेहात समझने में वह ज्यादा insight देता है।

गांव की नव-सम्पन्नता के प्रतीक लालजी।

फिलहाल आज क्लियर हुआ – बाभन खाये, लाला पाये!

बाभन खाने से और लाला पाने से काम करता है। तो अहीर काहे से करता है? यह प्रश्न व्यापक ऑडियेंस के लिये छोडा जाता है। सुधीजन अपना दिमाग लगायें! 😆


आज गांव और #गांवपरधानी

“नेता लोगन क बहुत कपड़ा धोवात-कलफ-प्रेस करात हयें। फुर्सत नाहीं बा (नेता लोगों के आजकल प्रधानी चुनाव के कारण बहुत कपड़े धुलाई-कलफ लगाई और प्रेस कराई के लिये मिल रहे हैं। फुर्सत नहीं मिल पा रही)।”


दूध लेने गया था मन्ना पण्डित के अहाता में। आज मिल गये। वर्ना सामान्यत: सात बजे गायों के दुहने और दूध घर में आने के बाद वे मोटरसाइकिल पर निकल चुके होते हैं। चुनाव के उस दौर में जब सीटों के आरक्षण की घोषणा नहीं हुई थी, तब वे सवेरे क्लीन शेव, कलफ लगा कुरता पायजामा और बढ़िया स्पेर्ट्स शू के साथ तैयार दिखते थे। तब उनके जिला पंचायती के वार्ड नम्बर 26 से चुनाव लड़ने के पोस्टर लगे थे।

क्षेत्र बड़ा होने के कारण दिन भर प्रचार के लिये व्यतीत करना होता था। पर वार्ड की सीट आरक्षित वर्ग के लिये हुई घोषणा ने सब गुड़ गोबर कर दिया। पोस्टर लगवाने और घूम कर प्रचार करने में फुंके पेट्रोल का खर्चा बट्टे खाते चला गया। चूंकि रसूख वाले व्यक्ति हैं; अत: उनके पोस्टर अब भी लगे हैं। किसी ने फाड़ने की गुस्ताखी नहीं की है। पर चांस तो चला ही गया!

मन्ना पण्डित

मन्ना दुबे को परधानी के परिदृष्य का जायजा लेने के लिये सवाल किया। जवाब – “सब बेकार है। सब सरये हाथ जोड़ घूमत हयें। अभी पैर छूने को कहो तो सारे के सारे दण्डवत लेट जायेंगे आपके सामने। जीत जाने पर रंगबाजी छांटेंगे।”

“तब भी, किसी को बैकिंग देने का तय तो किया होगा?”

मन्ना ने नॉन कमिटल जवाब दिया – “नाहीं जीजा। जो कोई ढंग का निकलेगा। काम करेगा। उसको देखा जायेगा। अभी मन नहीं बनाया है।”

मन्ना का अहाता बड़ा है। तीन चार बीघे की चारदीवारी है। गांव में सबसे ज्यादा रसूख-रुतबा! सभी उम्मीदवार यहां ‘आसीर्बाद’ ले कर गये ही होंगे। मन्ना खुद प्रधान रह चुके हैं। इसलिये गांव की राजनीति को समझने में उनसे बेहतर व्यक्ति कोई नहीं हो सकता। गांव की सामाजिकता और राजनीति वे ओढ़ते बिछाते हैं। पर उन्होने पत्ते नहीं खोले; सिवाय इस जनरल स्टेटमेण्ट के कि ‘सब सरये मायावती क जैजैकार करई वाले हयेन’। उन्होने यूंही, या जानबूझ कर मुलायम/अखिलेश को जैजैकारियत से नहीं जोड़ा! 🙂

पांड़े लोगों के आसपास की दीवार पर पोस्टर

इमलिहा पांड़े लोगों की दीवार पर किसी श्रीमती निर्मला सोनी का परधानी का पोस्टर लग गया था। पिछला एक उम्मीदवार का पोस्टर तो नुच गया था। अब क्या अंदाज लगाया जाये कि पंड़ान निर्मला सोनी के पाले में है? कल पण्डित रमाशंकर पांड़े मिले थे। कलकत्ता से किसी के तेरही में आये थे। फ्लाइट से आये और फ्लाइट से ही लौट गये। अब गांव में लोग बम्बई-कलकत्ता से यूं आते जाते हैं मानो बनारस-प्रयागराज से आ-जा रहे हों। हवाई जहाज अब (अपेक्षाकृत सम्पन्न) गांववासियों के डोमेन में आ चुका है। एक हम ही साइकिलहे बचे हैं!

राजेश की जलेबी – समोसा की दुकान पर रुक कर मैंने पूछा – “कोई परधानी का केण्डीडेट जलेबी-समोसा खिलवाने नहीं लाया लोगों को अभी तक?” राजेश का उत्तर नकार में था। अभी लगता है परधान लोग नाश्ता कराने की प्रतिस्पर्धा में नहीं जुटे। शायद पर्चा दाखिल होने के बाद जलेबी-समोसा जोर पकड़े। वैसे यह सुना है कि असल जोर तो बोतल, चिलम, गांधी जी वाले कागज आदि से पड़ता है। उसकी सूचना शायद मुझ जैसे कमजोर ब्लॉगर को न मिल पाये। 😆

फुलौरी-उमेश पण्डित की सरसों का खलिहान

उमेश पण्डित की सरसों खलिहान में आ गयी है। सवेरे आज फुलौरी (उनका अधियरा) नहीं था वहां। पर सरसों की खलिहान में रखी फसल का चित्र तो मैंने साइकिल रोक कर लिया। उमेश की किराना दुकान पर आज उमेश नहीं दिखे, पर भगवानदास जरूर मिले। मैंने पूछा – “कोई बाटी-चोखा खिलाने वाला आया या नहीं?”

हंसते हुये भगवानदास ने जवाब दिया – “अभी तक नहीं। इतने पोस्टर लग गये हैं, पर अभी किसी ने हामी नहीं भरी। लगता है पर्चा भराई होने पर खिलायेंगे!” भगवानदास छाप आशावाद पूरा गांव पाले हुये है।

कल गांजा गैंग का शिवरात्रि की रात का हरिनाम कीर्तन/जागरण अलबत्ता खूब बढ़िया मना। रात भर माइक पर उनकी आवाज आती रही!

मेरी पत्नीजी ने कहा था कि असल परधानी हालचाल उमेश या तूफानी की दुकान पर मिलेगा; जहां लोगों की बैठकी होती है। पर दोनो ही अपनी दुकान पर नहीं थे। तूफानी की दुकान पर राजन भाई जरूर विराजमान थे। पर मेरा आजकल का आकलन है कि उनके पास गांव की सामान्य और #गांवपरधानी हलचल की कोई झन्नाटेदार खबर नहीं होती। वे गांव की रहचह के बुझते कारतूस हैं।

लेवल क्रॉसिंग पर एक व्यक्ति लहसुन प्याज की बोरी लिये था। ट्रेन आने वाली थी। उससे भुजाली ने लहसुन का दाम पूछा तो बताया अस्सी रुपया किलो। पर मैंने पूछा तो बताया – नब्बे रुपये किलो लहसुन और तीस रुपया किलो प्याज। खरीददारी करनी हो तो मुझे अपने कपड़े और मैले, और पुराने पहनने चाहियें।

यह लहसुन प्याज वाला भी फेरी से सामान बेच रहा था।

वैसे यह लहसुन प्याज वाला भी फेरी से सामान बेच रहा था। सवेरे सात बजे महराजगंज बाजार से लहसुन प्याज ले कर निकला है और कई गांवों में घूम कर ईग्यारह बजे वापस अपने स्थान पर पंहुच जायेगा। कई प्रकार के कई सामान वाले फेरीवाले इस प्रकार सवेरे के काम से 3-4 सौ कमा ले रहे हैं। बाकी दिन कोई और काम करते हैं।

एक और नित्य का कमाई वाला काम करता दिखा। साइकिल पर बेलपत्र और दूब के गठ्ठर लादे था। यह बेलपत्र और दूब बनारस जाती है – बाबा विश्वनाथ मंदिर के लिये।

वह साइकिल पर बेलपत्र और दूब के गठ्ठर लादे था। यह बेलपत्र और दूब बनारस जाती है – बाबा विश्वनाथ मंदिर के लिये।

बेल पत्र तथा दूब तोड़ने और उसे ठीक से जमा करने, ले जाने के काम में करीब गांव के पचास लोगों की जीविका चलती है। जब सवारी ट्रेन चलती थी तो किराये की भी बचत होती थी। अभी यह ऑटो या टाटा मैजिक से जाती है बनारस। विश्वनाथ मंदिर बहुत लोगों की जीविका चलाता है।

यह एक और किशोर था बेल पत्र और दूब ले जाता हुआ।

ये फेरीवाले या बेलपत्र-दूब वाले परधानी के चुनाव से निस्पृह, अपने काम में लगे हैं। रोजी रोटी कमा रहे हैं। परधानी की चकल्लस तो हम जैसे निठल्लों के लिये मनोरंजन का साधन है।

घर वापसी के समय बसंत भी मिल गये। बसंत कनौजिया। उनके भाई सुबेदार ग्रामपंचायती के लिये खड़े होने वाले थे, पर सीट ओबीसी के पाले में चली गयी। फिलहाल बसंत भी बहुत व्यस्त हैं। “नेता लोगन क बहुत कपड़ा धोवात-कलफ-प्रेस करात हयें। फुर्सत नाहीं बा (नेता लोगों के आजकल प्रधानी चुनाव के कारण बहुत कपड़े धुलाई-कलफ लगाई और प्रेस कराई के लिये मिल रहे हैं। फुर्सत नहीं मिल पा रही)।”

तो यह था #गांवपरधानी के एक दिन का हाल। ऐसे जाने कितने दिन गुजरेंगे! विक्रमपुर टाइम्स की कई चार-छ-आठ कॉलम की हेडलाइंस की खबरें बनेंगी! इधर ही समय व्यतीत हो जा रहा है। गंगा किनारे जाना ही नहीं हो रहा! 😆


सुंदर नाऊ की पतोहू #गांवपरधानी उम्मीदवार

साल भर बाद विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। यद्यपि प्रधानी का चुनाव पार्टी आधार पर नहीं हो रहा पर हर एक पार्टी अपने अपने पक्ष के प्रधान जितवाने का जोर लगायेगी। और ऐसा नहीं कर रही तो जल्दी ही करेगी भी। इस लिये सुंदर नाऊ की सिधाई की अपनी सशक्त ब्राण्ड वैल्यू है!


सुंदर नाऊ मेरे ब्लॉग के एक प्रतिष्ठित पात्र हैं। आपने उनके बारे में न पढ़ा हो तो कृपया लिंक खोल पढ़ने की कृपा करें।

मैं कई दिनों से सुन रहा था कि सुंदर परधानी के उम्मीदवार हैं। पर वे मुझसे मिले नहीं थे। वैसे भी गांव की राजनीति में मेरी कोई हैसियत तो है नहीं कि मेरा कृपापात्र बनने का कोई यत्न करे। किसी को रेलवे से कोई कामधाम (मसलन नौकरी की चाह) होता है तो जरूर चला आता है और उसे सामान्यत: सूखा जवाब मिलता है – भईया, हमारी खुद की नौकरी बड़ी मुश्किल से लगी थी रेलवे में। बड़ी पढ़ाई करनी पड़ी थी। अब तो हम रिटायर हैं, अब तो कुछ हैसियत नहीं रखते।

और सही में कुछ हैसियत नहीं है। पर सुंदर नाऊ मुझे पूरी इज्जत देते हैं।

सुंदर नाऊ

सुंदर अपने औजार और अपने हाथ साबुन से साफ कर चुके थे। कोरोना काल से यह अनुशासन चलन में आया है। उसके बाद मेरे बाल बनाने का अवसर था। सुंदर ने साफ गमछा उढ़ाते हुये कहा कि वे परधानी के लिये खड़े हो रहे हैं। वे यानि उनकी पतोहू। लड़का पतोहू तो बम्बई में हैं, दो-चार दिन में आयेंगे। बकिया, प्रचार वे कर ही रहे हैं।

मैंने उनसे परधानी परिदृष्य का उनका आकलन सुना। भगवानपुर में उनकी बड़ी जजिमानी है। वहां सबसे मिल लिये हैं। पहले हफ्ता-दस दिन में जाते थे; अब हर तीसरे दिन जजिमानी में जाते हैं। भगवानपुर में सभी ने उन्हें वोट का भरोसा दिया है। टुन्नू भईया (शैलेंद्र दुबे – भाजपा नेता) से मिल लिये हैं। उन्होने भी पूरा आश्वासन दिया है। “हाता में नाहीं गये; काहे कि उहां एक जबर कुकुर बा। दऊड़ाई ले थ। (अहाता – देवेंद्र भाई, कांग्रेस के प्रमुख के यहां नहीं गया, वहां एक खूंखार कुकुर है जो दौड़ा लेता है।)” पर बकौल सुंदर, देवेंद्र भाई उसे मानते हैं और उन्हे यकीन है कि वहां से उन्हे ही वोट मिलेगा।

सुंदर नाऊ मेरे (जितने भी शेष हैं) बाल काटते हुये। “परधान होई जाब त का, आपन काम न छोड़ब। (प्रधान हो जाऊंगा तो भी क्या? अपना काम तो नहीं छोड़ूंगा।)”

“चमरौटी वाले भी देंगे और पसियान से भी काफी वोट मिलेंगे। बिंद लोग भी बड़ी संख्या में मुझे वोट देने की बात किये हैं। यादव लोग तो आपस में ही उलझे हैं। चार पांच खड़े हैं उनकी बस्ती से।”

कुल मिला कर सुंदर को पक्का यकीन है कि वह परधानी निकाल लेंगे! वैसे कहने वाले कहते हैं कि सुंदर शर्मा कैसे परधानी करेंगे – उनकी बोली साफ नहीं है, गुड़गुड़ा कर बोलते हैं और सुनते भी ऊंचा हैं। उनकी ही जाति का भरतलाल भी मैदान में है (भरतलाल की उम्मीदवारी पर चर्चा आगे किसी पोस्ट में)। और बन भी गये तो उनको तो हर कोई दबा लेगा। पर जैसा बाइबिल में लिखा है – meek shall inherit the earth; सुंदर का सीधापन उनकी ताकत बन सकता है। दलित बस्ती के लोग यह समझ सकते हैं कि अगर चुनाव जीते तो सुंदर के पास अपनी समस्यायें ले कर जाया जा सकेगा। वर्ना अभी तो कई उम्मीदवार सिर्फ इसी आशा में प्रत्याशी हैं कि जीतने पर अपनी दबंगई, अपनी रंगबाजी छांटने का अवसर मिलेगा।

इस चुनाव में, जब सीट ओबीसी महिला के लिये पहली बार आरक्षित हुई है, गांव की जिंदगी में खलबलाहट देखने में आती है। इस बार यादव, नाऊ, कंहार, सोनार, बिंद आदि जातियों को अवसर मिला है। इसमें सबसे पुख्ता राजनैतिक-सामाजिक दशा यादवों की है। उनमें दबंगई भी है। समाजवादी पार्टी के शासन के दौरान वे सत्ता का लाभ भी चख चुके हैं। नाऊ सवर्णों के सबसर्वियेण्ट रहे हैं और अब भी उन्ही के साथ जीतने की आस लगाये होंगे। वैसे भी कहावत है – जहां गंगा तहां झाऊ, जहां बाभन तहां नाऊ! बाकी सभी ओबीसी जातियों के लोग इस और उस छोरों के बीच झूलते होंगे। वोट देने वाले लोग इस सब को तोल रहे होंगे – और चुनाव सिर्फ जलेबी, समोसा, दारू-मुरगा, पैसा बांटने के हार्डवेयर पर नहीं, इन जातिगत समीकरणों के सॉफ्टवेयर पर भी निर्भर करेगा।

साल भर बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। यद्यपि प्रधानी का चुनाव पार्टी आधार पर नहीं हो रहा पर हर एक पार्टी अपने अपने पक्ष के प्रधान जितवाने का जोर लगायेगी। और ऐसा नहीं कर रही तो जल्दी ही करेगी भी। इस लिये सुंदर नाऊ की सिधाई की अपनी सशक्त ब्राण्ड वैल्यू है!


#गांवपरधानी की रहचह

ढूंढ़ी यादव तुरंत हाथ जोड़ने का पोज बना लिये। उन्होने बताया कि सूरज उगते ही प्रचार में निकल देते हैं और यही करते रात हो जाती है। उन्होने किरपा बनाये रखने का एक बार और अनुरोध किया। यह भी बताया कि अपनी जीत के लिये आश्वस्त हैं।


भगवानदास साफ नीले रंग के कुरते और झक्क सफेद पायजामे में खड़े थे, उमेश पण्डित की दुकान के पास। गले में साफ गमछा। एकबारगी लगा कि वह भी तो परधानी में उम्मीदवार नहीं हो गये?! पर वैसा नहीं था। परधानी ओबीसी के लिये आरक्षित हो गयी है; उनकी जात बिरादरी उसमें नहीं आती। वह बोल रहे थे – “एतना जने खड़ा होत हयें। सब बोटई मांगत हयें। केऊ बाटी चोखा खियावई क नाम नाहींं लेत बा। (इतने लोग खड़े हो रहे हैं प्रधानी के लिये; सभी वोट ही मांग रहे हैं। कोई बाटी-चोखा खिलाने के लिये हामी नहीं भर रहा।)”

उमेश दुबे (बांंये) और भगवानदास सरोज

मैंने फोटो लेने के लिये अपना फीचर फोन निकाला तो भगवानदास अटेंशन की मुद्रा में आ गये। उन्हे लग गया कि फोटो खिंचवानी है।

भगवानदास मेरे सोशल मीडिया के क्लासिक पात्र हैंं। पहले वह अपने घर के पास दिखते थे; और सवेरे की साइकिल सैर के दौरान ही दिखते थे; तो तुरंत खड़े हो कर मुझे अंगरेजी में “गुड नाइट सर” कहते थे। कालांतर में किसी ने उन्हे गुड नाइट की बजाय गुड मॉर्निंग सिखाया होगा। वर्ना साल दो साल तक तो वह मुझे गुड नाइट ही करते रहे! अंग्रेजी में इस हिंदी पट्टी का हाथ बहुत ही तंग है! 😆

आगे एक जगह परधानी के टटके (टटके=ताजा) पोस्टर लगे और फटे दोनो दिखे। प्रधानी ओबीसी महिला के लिये आरक्षित है। इसलिये महिला की फोटो पोस्टर में लगाना मजबूरी है। पर उसमें पति, श्वसुर या पुत्र का नाम जरूर लिखा जाता है। असल चुनाव तो पति/श्वसुर/पुत्र ही लड़ रहे होते हैं।

एक नोच कर फैंका गया पोस्टर

एक जमीन पर फैंका पोस्टर किसी निर्मला देवी का था। उनके श्वसुर स्वर्गीय लक्खन यादव और पति या पुत्र अनिल कुमार यादव का नाम था। यह पोस्टर कई और दीवारों पर लगा भी दिखा। लगता है कि रात में किसी ने लगाये होंगे और सवेरे सवेरे किसी अपोजिट पार्टी वाले ने नोच दिया होगा। बहरहाल पोस्टर लगने की शुरुआत हो गयी है। अब दर्जन भर उम्मीदवार गांव की सभी लावारिस और विज्ञापन के लिये उपयुक्त दीवारें एक दो दिन में पोस्टरों से पाट देंगे।

महिलायें खड़ी हैं परधानी चुनाव में पर प्रचार पुरुष ही कर रहे हैं। ढूंढ़ी यादव मुझे दिख गये लेवल क्रासिंग पर। चार दिन पहले उनसे मुलाकात हो चुकी थी।

ढूंढ़ी यादव के बारे में छ मार्च की ट्वीट

मैंने उन्हे कहा कि पहले वाली फोटो अच्छी नहीं आयी थी, एक बार और खींचनी है। वे तुरंत हाथ जोड़ने का पोज बना लिये। उन्होने बताया कि सूरज उगते ही प्रचार में निकल देते हैं और यही करते रात हो जाती है। उन्होने किरपा बनाये रखने का एक बार और अनुरोध किया। यह भी बताया कि अपनी जीत के लिये आश्वस्त हैं; बावजूद इसके कि उनकी बिरादरी से ही तीन चार और खड़े हो गये हैं। “आप का आसीर्बाद रहा तो सीट निकाल ले जायेंगे”।

ढूंढ़ी यादव

घर वापस लौटा तो सुंदर नाऊ पहले से आ चुके थे। मेरे बाल काटने का दिन था। पर सुंदर मुख्यत: परधानी के प्रचार के लिये आये थे। साथ में उस्तरा, कैंची, कंघी आदि लिये थे। सो बाल भी कटाये मैंने। पैसे देते समय सुंदर ने कहा – “पईसा चाहे जिनि द। वोटवा जरूर दई दिय्ह्य (पैसे की कोई खास बात नहीं, वोट जरूर दे दीजियेगा)।” खैर सुंदर नाऊ से बाल कटवाई के दौरान हुये संवाद अगली #गांवपरधानी पोस्ट के लिये। 🙂

मेरे घर पर सुंदर नाऊ पहले ही आ चुके थे। वे भी परधानी लड़ रहे हैं।