नीलकंठ के कयास

नीलकंठ खाड़ी युद्ध हेडर

[ नीलकंठ एक मानसिक चरित्र है। वह गंगा किनारे बरियापुर में रहता है। गंगा वहां मनोरम दृष्य बनाती हैं— यू टर्न इस तरह लेती हैं कि वहां घाट से सूर्योदय और सूर्यास्त, दोनो गंगा के जल में होते दिखते हैं। रेलगाड़ियों के प्रबंधन से थका नीलकंठ वहां एक रिटायर्ड होम में अगली पारी जी रहा है। 

उसने मुझे अपनी सोच का ई-मेल भेजा – “इसे अपने ब्लॉग पर ठेल देना, मैंने तुम्हारी ओर से बना दिया है”।

वह मैं पोस्ट कर रहा हूं।

नीलकंठ के कयास

खाड़ी में लड़ाई हो रही है और नीलकंठ खुश है। वह युद्धोन्मादी नहीं है। पर जब दुनिया की जमी हुई सतह कहीं टूटती है, तब उसे एक अजीब-सी उत्सुकता होती है। स्थिरता उसे ऊबा देती है।

जब आसपास डीजे के शोर में भोजपुरी गीत बजता है और औरत पटना में फ्लैट लेने की बात गा रही होती है, तब नीलकंठ जिद्दू कृष्णमूर्ति को सुनना चाहता है। जब पर्यावरणवादी जंगल बचाने की बातें करते हैं, तब वह विकास और गरीबी उन्मूलन के आँकड़े निकालने लगता है।

नीलकंठ का स्वभाव ही कुछ ऐसा है। वह कॉन्ट्रेरियन है। सब दायें जाते हैं तो वह बांये।

खाड़ी की लड़ाई शुरू हुई तो उसने घटनाओं को थोड़ी अलग नजर से देखा। शुरुआत में ही खामेनई और ईरान की टॉप लीडरशिप के साफ हो जाने की खबर आई तो वह मुस्कराया। उसे लगा कि इससे एक स्थिर लेकिन जकड़ा हुआ ढाँचा हिल सकता है। वह तब भी उत्सुक हुआ जब इजराइल की प्रॉक्सी के बजाय अमेरिका खुद मैदान में उतरा। उसे यह भी दिलचस्प लगा कि ईरान ने जवाब में खाड़ी के अपने बिरादरी के भाइयों—चचेरे ही सही—को भी लपेट लिया। आईआरजीसी के ठिकानों पर हमलों की खबरें आईं तो नीलकंठ ने उन्हें भी एक बड़े बदलाव के संकेत की तरह पढ़ा।

आगे की लड़ाई में वह क्या चाहता है?

नीलकंठ की कल्पना एक चेन रिएक्शन की है। वह चाहता है कि आईआरजीसी के भीतर दरारें पड़ें। गुटबाजी बढ़े। बसीज एक क्षण ऐसा आये जब अपनी ही जनता पर बंदूक तानने से मना कर दे। चीन और रूस दूर से देखते रहें और हस्तक्षेप न करें। इसी बीच अमेरिका उत्तर के कुर्द इलाकों के सहारे ईरान में दबाव बनाये। और जब ईरान की जनता को लगे कि सत्ता का ढाँचा अजेय नहीं है, तब वह सड़कों पर निकल आये।

नीलकंठ की कल्पना सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है। वह खाड़ी के नक्शे पर और भी लहरें देखता है। वह सोचता है कि अगर होरमुज़ चार हफ्तों के लिये बंद हो जाये और तेल सौ डॉलर छू ले तो क्या होगा। पाकिस्तान में पेट्रोल की एक बूंद न बचे और खरीदने की ताकत भी न रहे—कटोरा आगे करने पर भी नहीं। बांगलादेश भी हाय-हाय करने लगे।

पर यह सब हमेशा के लिये नहीं। नीलकंठ चाहता है कि यह उथल-पुथल लंबी न चले। चार हफ्ते काफी हैं। उसके बाद लड़ाई अपने किसी तार्किक मुकाम पर पहुंच जाये। अगर बहुत लंबी चली तो सब थक जायेंगे और फिर वही जमी हुई स्थिति लौट आयेगी।

नीलकंठ खाड़ी युद्ध
अपनी मेज पर खाड़ी युद्ध खंगालता नीलकंठ

पाकिस्तान के बारे में नीलकंठ भारत की आधिकारिक नीति से अलग सोचता है। भारत अक्सर हाथी की चाल चलता है—धीमी, भारी और सावधान। नीलकंठ को वह चाल बहुत पसंद नहीं। वह चाहता है कि अगर चार हफ्तों का ऐसा उथल-पुथल वाला समय आये तो भारत भी अवसर देखे। उस दौरान पाकिस्तान तेल के बिना जूझ रहा हो और पश्चिम से बलूच और अफगान उसे कस कर कोंच रहे हों।

चार हफ्तों के युद्ध में, नीलकंठ को लगता है, भारत के लिये बहुत-से अवसर पैदा हो सकते हैं।

ये भविष्यवाणियाँ नहीं हैं। यह बस नीलकंठ के कयास हैं—एक ऐसे आदमी के, जिसे दुनिया की स्थिरता से ज्यादा उसके हिलने-डुलने में दिलचस्पी है।

कभी-कभी उसे खुद भी संदेह होता है कि कहीं वह घटनाओं को नहीं, बल्कि अपनी कल्पनाओं को देख तो नहीं रहा। पर फिर वह सोचता है—दुनिया बदलती भी तो ऐसे ही है, पहले किसी के मन में एक कयास बन कर।

नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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