गांवदेहात डायरी

आज सुबह सात बजे साइकिल लेकर निकला तो पहली नज़र में ही लगा कि कुछ अलग है। मार्च का महीना है, इसलिए कोहरे की उम्मीद नहीं रहती। पर सामने का दृश्य जैसे धुंध की गहरी चादर में लिपटा था।
शांतिधाम से साइकिल गंगा किनारे जाने की बजाय रेल पटरी की ओर मुड़ गई। वहाँ बरियापुर रेलवे स्टेशन पर दो दिन से एक पैसेंजर रेक खड़ी है। आज वह बिल्कुल दिखाई नहीं दे रही थी। ध्यान से देखने पर कुछ आभास भर होता था।
सूरज ऊपर था, पर उसकी किरणें साफ़ उतर नहीं रही थीं—बस एक धुंधला-सा गोल चिह्न। सवेरा साफ न दिखना मन को भी कुछ वैसा ही बना रहा था—जैसे भीतर भी हल्की धुंध उतर आई हो।
सोचा, चलो साइकिल से खेतों की तरफ़ घूम लिया जाए। गांवदेहात की सुबह में हवा, आवाज़ें और रास्ते सब अपने ढंग से खुलते हैं।
पर आज कुछ ही देर में महसूस हुआ कि सांस थोड़ी भारी है। हवा में कोई तेज़ धुआँ नहीं था, न कोई जलन। बस जैसे हवा थोड़ी बोझिल हो।
थोड़ा आगे गया तो रास्ते में रामभरोस मिले। वे भी खड़े-खड़े आसमान की तरफ़ देख रहे थे। मैंने पूछा—“आज यह धुंध कैसी है, मार्च में?”
वे बोले—“रात भर हवा नहीं चली होगी बाबूजी। ऊपर से पत्ते बहुत गिर रहे हैं, लोग जगह-जगह जला भी रहे हैं। वही धुआँ अटका होगा।”
थोड़ा और आगे बढ़ा तो हरिचरण अपने दरवाज़े पर झाड़ू लगा रहे थे। उनसे भी वही बात छेड़ी। वे सामान्यत: बुद्धिमानी की मुद्रा में रहते हैं। बोले—“आज तो सूरज भी जैसे आलस में है। धूप है, पर नहीं भी है।”
गांव के लोग मौसम को विज्ञान की भाषा में नहीं बताते, पर बात अक्सर ठीक ही पकड़ लेते हैं।
मुझे खुद लगा कि आज साइकिल का आगे बढ़ाने का मन नहीं है। सांस कुछ सहज नहीं लग रही थी। सो साइकिल घुमा कर लौट आया। मन में आया कि ऐसे दिनों में शायद मास्क साथ रखना चाहिए। … पर मास्क भी तो उलझन ही करता है।
शांतिधाम में एक और बात ध्यान में आई। रोज़ की तरह दाना रखा था, पर पक्षी कम आए। जो आए भी, उनकी चहचहाहट में वह तेज़ किलक नहीं थी जो आम तौर पर सुबह को भर देती है।
बाद में धूप चढ़ने लगी तो वह धुंध धीरे-धीरे हल्की हुई। दोपहर तक आसमान फिर साफ़ दिखने लगा। पर सुबह का वह दृश्य मन में रह गया—धूप के बीच एक हल्की-सी परत, और गांव की हवा में एक असामान्य ठहराव।
गांवदेहात में मौसम के ऐसे छोटे बदलाव भी तुरंत ध्यान खींच लेते हैं। यहाँ मौसम केवल आकाश में नहीं बदलता, लोगों की बातचीत में भी बदलता है। शहर में शायद यह बस एक धुंधला दिन होता, पर यहां वह बातचीत का विषय भी बन जाता है और साइकिल की दिशा भी बदल देता है।
मेरे लिये यह विचित्र था। पिछले चार दशकों में, मार्च के महीने में, मैंने इतनी कम दृष्यता नहीं देखी कि 200 मीटर दूर रेलवे का रेक न दिखे। और धूल-धुयें से गला चोक होने लगे।
— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
12 मार्च 2026
फुटनोट:-
यह धुंध क्यों बनी?
मार्च में सामान्यतः कोहरा नहीं होता, क्योंकि रातें उतनी ठंडी नहीं रहतीं कि जलवाष्प घनीभूत हो सके। पर कुछ परिस्थितियों में “हैज़” या “स्मॉग-मिस्ट” बन सकता है। इसके पीछे तीन कारण साथ आते हैं। पहला, रात में हवा बिल्कुल शांत रहने पर वातावरण की निचली परत में तापमान उलटाव (temperature inversion) बन जाता है, जिससे नमी और धूल ऊपर नहीं उठ पाती। दूसरा, इस मौसम में पेड़ों की सूखी पत्तियाँ जलाने, खेतों की धूल और अन्य सूक्ष्म कण हवा में मिल जाते हैं। तीसरा, गंगा के मैदान में सुबह की हल्की नमी इन कणों से चिपक कर सूक्ष्म बूंदों की परत बना देती है। जब ये तीनों साथ होते हैं तो दृश्यता अचानक कम हो जाती है और धुंध दोपहर तक बनी रह सकती है।
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