गांवदेहात डायरी

बरियापुर का शांतिधाम नये युग में पुराने का घालमेल है। गंगा किनारे से एक किलोमीटर दूर है। गंगा वहाँ यू-टर्न लेती हैं, इसलिए शांतिधाम से नदी एक किलोमीटर दक्षिण में है और लगभग उतनी ही दूर पूरब और पश्चिम में भी। अभी यहाँ सात लोग आकर रहने लगे हैं—जीवन के तीसरे चरण में। सब अकेले हैं। या तो मेरी तरह अविवाहित हैं, या उनके बच्चे बाहर रहते हैं।
वे रहते इस गाँव के माहौल में हैं, पर बातचीत पूरी दुनिया की करते हैं। इस रिटायर्ड-होम में बिजली, पानी, वाई-फाई, सुरक्षा और डिस्पेंसरी की सुविधाएँ हैं। हर आदमी या औरत के पास इतनी आर्थिक मजबूती है कि सामान्य जरूरतें पूरी होने में कोई झिकझिक या तनाव नहीं होता।
लोग खूब मजे में बातचीत करते हैं, अपनी छोटी-मोटी हॉबी में मगन रहते हैं।
मैं आज मृणालिनी जी की बात कर रहा हूँ।
मृणालिनी देवधर पचहत्तर साल की हैं। किसी जमाने में वे कथक नृत्य किया करती थीं। पत्रिकाओं में उनके बारे में छपता भी था। फिर बारह साल पहले घुटने जवाब देने लगे। नृत्य छूट गया, पर चेहरे और हाथों की लालित्यपूर्ण भंगिमाएँ उनके व्यक्तित्व का अब भी हिस्सा हैं। उनके सोचने और बोलने में माधुर्य है और सरलता भी।
सामने बरामदे में वे बैठी थीं। मेज पर अखबार खुला था जिसमें खबर थी कि आठवीं की किताब में न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार के जिक्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी वालों को लताड़ लगाई है।
मैं अपनी साइकिल की ओर कदम बढ़ा रहा था कि मृणालिनी जी ने रोक लिया—
“एक कप चाय पीकर जाइये नीलकंठ जी। मेरी एक पुरानी शिष्या ने नीलगिरि की चाय भेजी है।”
मृणालिनी जी से बातचीत के कॉमन ईश्यूज़ मेरे पास कम ही होते हैं। आर्ट और नृत्य के मामले में मैं औरंगजेब टाइप हूँ। लोग मुझे रूखा कहते हैं। सो मैंने बैठकर अखबार की उसी खबर पर बात शुरू की—
“फँस गये हैं एनसीईआरटी वाले। कुछ भी कहें तो कोर्ट की अवमानना का खतरा। और आठवीं की नागरिकशास्त्र की किताब में वह लेख भी तो मिशेल देनीनो की देख-रेख में लिखा गया है।”
मिशेल देनीनो की सरस्वती नदी पर लिखी किताब से मैं उनका प्रशंसक हो गया हूँ। उनका लिखा या कहा मुझे अच्छा लगता है।
मृणालिनी बोलीं—
“हाँ नीलकंठ जी। भारत के बाहर तो कोर्ट व्यवस्था की समीक्षा बच्चों को बड़े सलीके से बताई जाती है। वहाँ कभी किसी कोर्ट ने नाराज़गी नहीं दिखाई। मेरी बहन तो ऐसा ही बताती है।”
फिर उन्होंने अपने मोबाइल में कुछ खोजा और उसे मेरी ओर बढ़ाया—
मेरी बहन की पोती एमस्टर्डम में पढ़ती है। वहाँ वे ‘Maatschappijleer नाम का विषय पढ़ते हैं—कुछ-कुछ हमारे नागरिकशास्त्र जैसा। उसकी किताब के Rule of Law वाले अध्याय का यह पन्ना उसने भेजा है।
मोबाइल पर अंग्रेज़ी में भावार्थ लिखा था कि अदालतों का काम कानून की व्याख्या करना और सबको निष्पक्ष न्याय देना है। अदालतों को सरकार से स्वतंत्र रहना चाहिए। किताब यह भी बताती है कि मुकदमे कभी-कभी लंबे चल सकते हैं और फैसले विवाद पैदा कर सकते हैं, इसलिए लोकतंत्र में लोग अदालत के फैसलों पर चर्चा भी करते हैं।
मृणालिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“देखिये… वहाँ बच्चों को यह भी पढ़ा रहे हैं कि अदालतों के फैसले विवाद पैदा कर सकते हैं। और यह भी कि वहाँ भी मुकदमे लंबे चलते हैं।”
बातचीत और चलती तो मेरा साइकिल चलाना रह जाता। मैं उठ खड़ा हुआ। चलते-चलते उन्होंने अपनी सहज मुस्कान के साथ जोड़ा—
“नीलकंठ जी, हर बात पर सवाल तो उठने ही चाहिये। लोकतंत्र में सवाल पूछना बुरा तो नहीं है।”
ठीक कह रही थीं मृणालिनी जी।
पर भारत का लोकतंत्र नीदरलैंड का लोकतंत्र थोड़े ही है।
— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
13 मार्च 2026
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