गांवदेहात डायरी

सवेरे सवा सात बजे घर से निकलता हूं बिजली की साइकिल पर। तापक्रम 28 डिग्री के आसपास और हवा भी (अपेक्षाकृत) साफ। घूमने का मजा ऐसे ही मौसम में है।
यातायात कम होता है। हाईवे की सर्विस लेन पर चारपहिया वाहन लगभग नहीं के बराबर। ज्यादातर लोग साइकिल पर अपने छोटे बर्तन में दूध लेकर डेयरी की ओर जा रहे होते हैं, या बच्चे साइकिल से स्कूल और ट्यूशन के लिए निकल चुके होते हैं।
बच्चों को देखता हूं तो एक बदलाव साफ दिखता है—लड़कियों की संख्या अब लड़कों से तेजी से बढ़ी है। ट्यूशन की जगहों पर खड़ी साइकिलों की कतारें भी पहले से लंबी हो गई हैं।
सड़क से दिखने वाली कई ट्यूशन कक्षाओं में अब चाक और ब्लैकबोर्ड के साथ-साथ व्हाइटबोर्ड और मार्कर भी दिखने लगे हैं। बदलाव धीरे नहीं, अब कुछ तेज चाल में है।
एक फेरी वाला साबुन बेचता दिखता है। पर वह पहले की तरह आवाज लगाकर नहीं बेचता। उसकी साइकिल पर मेगामाइक लगा है और मोबाइल से प्री-रिकॉर्डेड संदेश बज रहा है—
“तीस रुपये का आधा किलो… एक नहीं, दो पैकेट फ्री… माल खत्म होने से पहले लाभ उठाइए…”
सोचता हूं—इतना लंबा संवाद तो पहले कोई फेरीवाला बोल ही नहीं सकता था।
स्कूली बच्चे मेरी तेज चलती बिजली की साइकिल और मेरी उम्र—दोनों को साथ देखकर मुझसे आगे निकलने की कोशिश करने लगते हैं। मुझे भी अच्छा लगता है कि बच्चों के साथ रेस लगाने लायक अभी बचा हुआ हूं।
वे 14-15 साल के—और मैं 70 का। तुलना का कोई अर्थ नहीं, फिर भी एक खेल बन जाता है।
आज तीन बच्चियों के साथ यह खेल कुछ ज्यादा ही चल गया। जींस पहने थीं—शायद ट्यूशन को जा रही थीं। तीनों के पीठ पर पिट्ठू बैग।
पहले उन्होंने मुझे पीछे छोड़ने की कोशिश की। फिर मैंने पैडल-असिस्ट 1 में लगातार कुछ तेज पैडल मारे और आगे निकल गया। फिर धीरे होकर उन्हें आगे जाने दिया। खेल फिर शुरू हो गया।
दूसरी बार जब मैंने पीछे वाली को पार किया, तो वह हंसकर बोली—
“दद्दा, वो आगे वाली प्रिया को हरा दीजिए!”
प्रिया से आगे निकलना मुश्किल नहीं था। पैडल-असिस्ट 3 पर गया और कुछ सेकेंड में आगे था।
पर जैसे ही आगे निकला, नजर उसके चेहरे पर पड़ी। वहां एक हल्की-सी हार थी—और उसी क्षण मेरी जीत का अर्थ बदल गया।
बच्चियां हैं—इनसे क्या प्रतिस्पर्धा?
साइकिल आगे बढ़ रही थी, पर मन कहीं और चला गया। लगा—अगर कभी इनकी क्लास में बैठने का मौका मिले, तो क्या कहूंगा? अपनी जिंदगी की दौड़ों के बारे में? उन हारों के बारे में जो बाद में समझ में आईं कि जरूरी थीं? या उन जीतों के बारे में, जो उस समय जितनी बड़ी लगीं, बाद में उतनी नहीं रहीं?
मुक्तापुर की बनती सड़क के किनारे पानी की टंकी दिखी। गांवदेहात तेजी से बदल रहा है—यह बात तो दिखती है। पर शायद उससे भी ज्यादा, देखने वाले के भीतर कुछ बदलता रहता है।
सोचते-सोचते साइकिल अपने आप धीमी हो गई।
जितना सवेरे की सैर में देखते और सोचते हो, जीडी—उसका आधा भी लिख नहीं पाते। लिखना अभी और मांजना है।
घर लौटकर लिखते समय यही ख्याल आता है।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
19 मार्च 2026
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