बरियापुर के महेश उपधिया

गांवदेहात डायरी

महेश उपधिया और नीलकंठ

महेश उपधिया के बब्बा के पास आसपास के गांवों में एक सौ तीस बीघा खेत थे। सवेरे लाठी लेकर निकलते तो सांझ हो जाती थी, सब खेत-बारी देख कर लौटने में। बीच रास्ते उपधिया की पाही पर उनका नौकर खिचड़ी, दही, बाटी-चोखा और दाल जैसा कुछ बना कर रखता था। बब्बा एक-दो घंटा वहीं भोजन कर आराम करते, फिर अपनी ‘रियासत’ का शेष भ्रमण पूरा करते।

आदर्श पुरुष थे महेश उपाध्याय के बब्बा—पंडित चंद्रशेखर उपाध्याय। ज़ुबान के खरे। सही को सही और गलत को गलत बिना लाग-लपेट कहने वाले। उनको जानने वाले उन्हें चलता-फिरता देवता मानते थे।

पर बब्बा के बाद ज़मीन बँटते-बँटते महेश के पास छत्तीस बीघा बची। छत्तीस बीघा में महेश और उनके दो अर्ध-निकम्मे लड़के थे। उपधियाइन जल्दी चली गईं। पाँच-सात साल लगे महेश को समझने में कि इन लड़कों-पतोहुओं के बल पर वे नहीं रह सकते। रोज किच-किच ही मचती। एक दिन उन्होंने पंद्रह-पंद्रह बीघा दोनों को बाँट दिया और अपने लिए बरियापुर के उत्तर कोने में सड़क किनारे छोटा-सा घर बना लिया।

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यहाँ रामचरितमानस की एक मंझले आकार की पोथी लेकर वे रहते हैं। मित्र और चेले लोग दिन में कभी-कभार आ जाते हैं। कभी उनके लिए मट्ठे का इंतज़ाम होता है, वरना अपनी अलमारी में काजू, किशमिश, मूंगफली और गुड़ रखते हैं—स्वागत के लिए। परसाल नवरात्रि में वे बहत्तर के हो गए हैं।

महेश उपाध्याय गांवदेहात को समझने के लिए एक आदर्श पात्र हैं। मुझसे दोस्ती उन्हें भी जँचती है, और मुझे भी उनका संग अच्छा लगता है।

अपने लड़कों को इतनी सहजता से उन्होंने ज़मीन-जायदाद दी कि लड़के और उनकी पत्नियाँ उनकी इज़्ज़त करते हैं। महेश उनकी ज़िंदगी में दखल नहीं देते, पर आर्थिक सहायता की पेशकश भी कभी नहीं करते। छोटा लड़का घर-प्रबंधन में कुछ कमजोर है, पर लटपटाते हुए जिंदगी चला रहा है। बड़ा वाला मुखर है और स्थानीय नेतागिरी भी थोड़ी-बहुत करता है।

मुझे जब भी ग्रामीण जीवन को समझने के लिए कोई शंका होती है, कोई जिज्ञासा होती है, तो मैं अपनी छोटी पॉकेट डायरी में नोट करता हूँ और मौका लगने पर महेश जी से चर्चा करता हूँ। महेश भी मुझे अपने एक विशिष्ट मित्र का दर्जा देते हैं—ऐसा मुझे लगता है।

दो साल हो गए उनसे दोस्ती को। लगता है, वे मुझसे भले ही दो साल बड़े हैं, पर ज्यादा फिट हैं। और हमारा बुढ़ापा—आने वाले दो-तीन दशक—शायद एक-दूसरे की जुगलबंदी में ही कटेगा।

— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
21 मार्च 2026

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यह बरियापुर नामक स्थान – जिसे गंगा किनारे का एक गांव-कस्बा के रूप में रचा है और जहां शांतिधाम नामक एक सीनियर सिटिजन होम बना है – पर एक पात्र का सृजन है। महेश उपधिया बार बार आते रहेंगे चर्चा में।
– ज्ञानदत्त पाण्डेय


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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