
नर्मदा दंड परिक्रमा
मंडला में नर्मदा के दक्षिण तट से प्रेमसागर ने नर्मदा दंड परिक्रमा प्रारम्भ की। शुरुआत सूर्यकुंड से हुई—दक्षिणमुखी हनुमान जी को प्रणाम कर।
सवेरे लगभग दस बजे निकलना हुआ। आज उनके पास कमंडल नहीं था। आगे दो लीटर का कमंडल खरीदना है। सामान फिलहाल अंकित जी के यहाँ रखा है—वे लेकर आ जायेंगे। धीरे-धीरे लोग जुड़ते जायेंगे, ऐसा उनका विश्वास है। नर्मदा माई व्यवस्था करती रहेंगी। प्रेमसागर के जिम्मे बस दंड भरना है।
दंड यात्रा का अर्थ है—बार-बार सड़क पर लेटना, उठना, और आगे बढ़ना। एक किलोमीटर में लगभग 1670 कदम, या 560 दंडवत। बैजनाथधाम की दंड कांवड़ यात्रा का अनुभव उनके पास पहले से है। लेकिन यह यात्रा उससे कहीं बड़ी है। पूरी नर्मदा परिक्रमा दंडवत—लगभग सोलह लाख बार शरीर को धरती पर टिकाना और उठाना।
सोलह लाख—संख्या सुनने में ही भारी लगती है।
आज की दूरी मात्र दो किलोमीटर रही। शुरुआत थी, इसलिए शरीर और मन दोनों को लय पकड़नी है। धीरे-धीरे पाँच किलोमीटर प्रतिदिन का औसत बन जायेगा—ऐसा अनुमान है। कुल मिलाकर डेढ़ साल का समय इस यात्रा में लगेगा।
गर्मी से बचने के लिये सड़क-सड़क चलना है, समय चुनना है, पानी का इंतजाम रखना है। मानसून की चिंता उन्हें नहीं है—बरसात में मौसम ठंडा रहता है, तब दूरी भी ज्यादा तय हो जाती है।
मैं सोचता हूँ—अगर इस यात्रा के साथ लिखना हो, तो क्या लिखा जाये? शायद रास्ते में मिलने वाले लोगों के बारे में। जो सहयोग करते हैं, जो रास्ता दिखाते हैं, जो पानी देते हैं, जो चुपचाप देखते हैं—उनके बारे में।
लगभग पाँच सौ लोगों की कथाएँ—“नर्मदा के लोग”—शायद यही इस यात्रा का असली लेखा-जोखा होगा।
कल से उसी अनुशासन की शुरुआत करूँगा—लोगों को जानने, उनसे बात करने और लिखने का।
आज सूर्यकुंड से बंजार-नर्मदा संगम तक की यात्रा हुई। दो जगह लोगों ने प्रेमसागर को अतिथि की तरह रखा — मंडला में नर्मदा के उत्तर तट पर अंकित जी और उनकी धर्म पत्नी ने और आज सतवार गांव के देवचंद कुशवाहा ने। आज रात में ये दोनो परिवार एक साथ थे प्रेमसागर के साथ।

कल से यात्रा के साथ जुड़ेंगे और लोग—और उनकी कहानियाँ।
#NarmadaDandParikrama
4 अप्रेल 2026
नर्मदे हर!
