मौसम का मिजाज 

गांवदेहात डायरी 

हफ्ता दस दिन हो गये, रोज बादल आ जा रहे हैं। आंधी आ रही है। किसान परेशान हो रहा है। गेंहूं की फसल तैयार है। कटाई का काम चलता – रुकता है। किसान की सांस भी ऊपर नीचे होती है। 

थ्रेशिंग करने वाले भी बहुत व्यस्त हैं। एक जगह से दूसरी जगह दौड़ लगा रहे हैं अपने ट्रेक्टर और थेशर अटैचमेंट के साथ। उनके रेट भी बढ़ गये हैं, पर बारिश आ जाने से उनका टाइम भी खोटा हो रहा है। 

जोखन की फसल कटी पड़ी है। बार बार थ्रेशर वाले को फोन करता है, बार बार वह कहता है कि अब आ रहा हूं, तब आ रहा हूं। खीझ कर वह भगवान को कोसता है— ई दऊ के हमार सुख नाहीं देखा जात। बहुत हरामी हयेन दऊ।
भगवान को कोसना और भगवान को अपने घर समाज का अंग मान कर गरिया भी देना— यह लिबर्टी हिंदू धर्म में ही मिलती है। 

कल शाम मौका पा कर हमारी अधियरा सुग्गी ने एक खेत के गेंहू की थ्रेशिंग कराई। गेंहू सफरते सफराते रात दस बज गये। फोन किया— दीदी, आई क बंटईया कराइ ल। 

मेम साहब रात दस बजे खेत में जा कर अंधेरे में खड़े हो आधा गेंहूं बंटाने के मूड में नहीं थीं। उन्होने कहा कि सुग्गी खुद ही बांट ले और उनका हिस्सा ला कर पंहुचा जाये। 

कई साल से अधियरा है सुग्गी। एतबार बन गया है उसकी ईमानदारी का। ज्यादा होगा तो थोड़ा बहुत उन्नीस बीस होगा। उतना झेलने को तैयार हैं मेम साहब। 

रात इग्यारह बजे सुग्गी के लड़के सगड़ी से दो फेरा कर गेंहू के बोरे पंहुचा गये। नीचे पोर्टिको में ही रख दिये। थ्रेशिंग की धूल में भूत की तरह लग रहे थे वे। गोविंदा ने तो कमीज-बनियान उतार दी थी। एक चड्ढी भर पहने था। किसानी मेहनत का काम है। उसमें फैशनबाजी का कोई स्थान नहीं।  

आधी रात के बाद ही सोये होंगे वे। 

… 

सवेरे देखा — पोर्टिको में आठ दस बोरे जमा थे। पांच क्विंटल गेंहू होगा। अभी कुछ और भी खेत हैं, उनमें कुछ खड़ी, कुछ कटी फसल है। अभी तनाव के दिन खत्म नहीं हुये हैं। दऊ का क्या भरोसा — अगले तीन चार दिन में तापक्रम गिरने, यदा कदा बारिश वाले मौसम की सूचना है। 

मैं अपनी साइकिल से सवेरे दूध-सब्जी लेने निकला तो आधे रास्ते में बारिश से सामना हुआ। एक परित्यक्त शेड में खड़ा हो गया। साइकिल भीगती रही। मुझे खड़ा देख बगल की एक वृद्ध महिला निकल कर आई और बोली— बारिश हल्की हो गई है। निकल सकते हो। कहां जाना है? 

“ज्यादा दूर नहीं, विक्रमपुर” — मैने कहा। अपने चश्मे से पानी की बूंदें पोंछीं और घर लौटा। 

मौसम ने मुझे बिना ज्यादा भीगे घर लौटने का मौका दिया। उसी तरह आंधी-पानी रुक रुक कर आने से किसान की धुकधुकी भले ही बढ़ी है, पर खलिहान निपटाने का मौका मिल ही जा रहा है। 

दऊ किसान को टेंटरहुक्स पर भले ही रखे हैं, पर मौसम की लगान भी थामे हैं। काम हो ही जा रहा है! 

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
8 मार्च 2026 

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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