राम सेवक के बागवानी टिप्स

उनके आते ही घर के परिसर की सूरत बदलनी शुरू हो गयी है। हेज की एक राउण्ड कटिंग हो गयी है। मयूरपंखी का पौधा अब तिकोने पेण्डेण्ट के आकार में आ गया है। एक दूसरे से भिड़ रहे पेड़ अब अनुशासित कर दिये गये हैं।



राम सेवक मेरे पड़ोस में रहते हैं। गांव से बनारस जाते आते हैं। आजकल ट्रेनें नहीं चल रही हैं। बस का किराया ज्यादा है और शहर में आस पास जाने आने के लिये वाहन चाहिये, इस कारण से साइकिल से ही बनारस जाना हो रहा है। पचास किलोमीटर एक तरफ का साइकिल चला कर जाना और शाम को वापस पचास किलोमीटर चला कर गांव आना सम्भव नहीं, इसलिये शहर में एक कमरा किराये पर ले रखा है रुकने के लिये और सप्ताहांत में ही गांव वापस आते हैं।

राम सेवक

राम सेवक; जिनका कहना है कि माता-पिता ने उनका नाम ही सेवा करने के लिये रखा है; बनारस में माली का काम करते हैं। कई बंगलों में समय बांध रखा है। समय के अनुसार लोग पेमेण्ट करते हैं। कहीं हजार, कहीं दो हजार, कहीं चार हजार।

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चीनी पाण्डेय ने बनाई चिड़िया की कहानी

“उस बाग में ढेरों चिड़ियाँ रहती थीं। वहीं एक पेड़ पर बुलबुल भी रहती थी। वह सुनहरे रंग की थी। दिन में वह अकेली रहती थी। उसके माता पिता दूर कहीं काम पर जाते थे …”


आज मैं कॉपी कलम ले कर लिखने की कोशिश कर रही थी कि मेरी पोती चीनी ने आ कर कहा – दादी, आप एक चिड़िया की कहानी लिखिये।

चीनी (पद्मजा पाण्डेय), सवेरे बगीचे में घूमते हुये।

मैंने कहा – आप बताओ, तो लिख देती हूं। तो चीनी ने एक कहानी सुनाई।

एक बहुत सुंदर बाग था। उसमें बहुत सुंदर सुंदर फूल लगे थे। कई फलों के पेड़ भी थे। आम, अनार, अमरूद और सेव। और भी बहुत सारे। उस बाग में ढेरों चिड़ियाँ रहती थीं। वहीं एक पेड़ पर बुलबुल भी रहती थी। वह सुनहरे रंग की थी। दिन में वह अकेली रहती थी। उसके माता पिता दूर कहीं काम पर जाते थे और शाम के समय उसके लिये ढेर सारा खाना ले कर आते थे।

एक शाम उसके माता पिता नहीं लौटे। सुनहरी बुलबुल बहुत परेशान थी। उसे बहुत दुख हो रहा था। अंधेरा होने पर भी उसके माता पिता नहीं लौटे। सारे पक्षी सुनहरी बुलबुल के पास बैठे थे। सारे पेड़ भी सुनहरी बुलबुल को समझा रहे थे कि शायद किसी काम में फंस गये होंगे माता पिता।

सुनहरी बुलबुल रोने लगी और रोते रोते सो गयी।

सुबह उसने देखा कि उसके मम्मी-पापा जल्दी जल्दी आ रहे हैं। उन्होने बताया कि बेटा हम तो शाम के समय घर आ रहे थे तो हम पर एक लड़के ने पत्थर मार दिया। तुम्हारी मम्मी के पंख में चोट लग गयी। इस लिये हम रात एक जामुन के पेड़ पर बैठ गये। सुबह तक चोट थोड़ी थोड़ी ठीक होने पर जल्दी जल्दी तुम्हारे पास लौटे हैं।

घर में घोंसला बनाये ग्रेट इण्डियन रॉबिन। अपने चूजों के लिये भोजन ले कर आती हुई।

कहानी सुनाने के बाद चीनी ने कहा – दादी, पक्षियों को नहीं मारना चाहिये, न?

यह कह कर वह अपने खेल मेंं लग गयी। मैने उसकी कही कहानी को कागज पर हूबहू उतार दिया। चीनी (पद्मजा पाण्डेय) छ साल की है। आजकल कोरोना काल में छुट्टियां हैं। वह घर में और पेड़-पौधों के बीच अकेली घूमती है। घूमते चिड़ियों को देखती है। कई जोड़ा बुलबुल भी हैं घर की चिड़ियों में। घर में एक इण्डियन रॉबिन दम्पति ने घोंसला बनाया है चीनी के लटकाये चिड़िया “घर” में।

चिड़िया का घोंसला, जिसे चीनी बार बार निहारती है।

यह सब देखती-घूमती वह कहानी भी बुन लेती है। कहानी कुछ कल्पना और कुछ परिवेश को देखने परखने से उपजती है।


नई पौध के लिये नर्सरी तो जाना ही है! #गांवकाचिठ्ठा

नर्सरी जा कर कुछ मोगरे के पौधे तो लाने ही हैं। यूं, कोरोना काल में बाहर निकलने का खतरा तो है। … पर सावधानी से डर को किनारे करते चलना है।


बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं। विषय की कमी हो, ऐसा तो कतई नहीं है। समय की कमी का तो प्रश्न ही नहीं है। बस, तारतम्य नहीं बना। पिछली पोस्ट 14 मई को लिखी थी, आज डेढ़ महीने बाद लिख रही हूं। इस बीच मेरे पति की पोस्टें (लगभग) आती रही हैं।

कोरोना संक्रमण गांव में चारों ओर से घेरने लगा है। आरोग्य सेतु पर पांच किलोमीटर के इलाके में तो कोरोना का कोई मरीज नहीं दिखता, पर पांच से दस किलोमीटर की परिधि में 4-5 मामले नजर में आते हैं। जो समस्या अभी बड़े शहरों में थी, और हम कहते थे कि यह बड़े जगहों की बीमारी है, वह अब गांव की तरफ न केवल आ रही है बल्कि तेजी से फैल रही है। इसके साथ साथ दिनचर्या भी, पहले की ही तरह सामान्य करने की कवायद भी चल रही है। बार बार, बहुत से लोग कह रहे हैं कि हमें इसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिये।

गांव में घर
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दार्शनिक, कारोबारी या बाहुबली #गांवकाचिठ्ठा

उसने उत्तर देने के पहले मुंह से पीक थूंकी। शायद मुंह में सुरती थी या पान। फिर उत्तर दिया – “सोचना क्या है। देख रहे हैं, काम करने वाले आ जाएं, नावें तैयार हो कर उस पार रवाना हो जाएं। आज काम शुरू हो जाए। बस।


वह पत्थर की बेंच पर पेड़ के नीचे बैठा था। बगल में एक पुरानी साइकिल। पेड़ के तने से उंठगा कर खड़ी कर रखी थी। गंगा किनारे नावों और उनके आसपास की गतिविधि निहार रहा था। अकेला था। पूरा दृश्य कुछ ऐसा था सवेरे साढ़े पांच बजे कि लगा कोई अपने विचारों में खोया या सवेरे की शांत छटा निहारता दार्शनिक टाइप जीव हो। मुझे लगा कि ऐसा बहुत सम्भव है। गंगा विचारों में विचरण करने वालों को आकर्षित अवश्य करती हैं।

वह बेंच पर बैठा गंगा का दृश्य निहार रहा था

मैंने उसके एक दो चित्र लिए, इससे पहले कि वह मुझे देख अपनी मुद्रा बदले। उसके बाद उन सज्जन से बात की – कैसा लगता है गंगा का यह दृश्य? क्या सोचते हैं?

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संदीप कुमार को एक व्यवसाय और, उससे ज्यादा, आत्मविश्वास चाहिये #गांवकाचिठ्ठा

नौकरी में दिक्कत है, व्यवसाय के लिए पूँजी की किल्लत है। संदीप के यह बताने में निराशा झलकती है। पर मेरा आकलन है कि उसमें आत्मविश्वास की कमी है। उसको प्रोत्साहित करने वाले नहीं मिलते उसके परिवेश में।


कोरोना संक्रमण भदोही मेंं प्रतिदिन 6 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रहा है। संदीप कुमार का काम रोज तीस किलोमीटर साइकिल चला कर डेढ़ सौ ग्रामीण घरों में अखबार बांटना है। जिन गांवों में उसका जाना होता है वे कोरोना वायरस की पकड़ में आते जा रहे हैं। संदीप के काम के खतरे हैं और उसको इनका एहसास भी है। वह मुंह पर एक गमछा लपेटे रहता है। कहीं बहुत ज्यादा रुकता नहीं। सवेरे साढ़े तीन बजे उठता है। पांच बजे महराजगंज कस्बे की अखबार एजेंसी से अखबार ले कर दस बजे तक अखबार बांटने का काम खत्म कर पाता है।

संदीप कुमार, अखबार वाला नौजवान ।
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राजेश सरोज – जल्दी ही बम्बई लौट जाऊंगा #गांवकाचिठ्ठा

वह लॉक डाउन के पहले ही गांव आया था, उसके बाद लॉक डाउन हो गया और वापस नहीं जा सका। अब मौका लगते ही फिर वापस जाएगा। वहां का काम राजेश को पसंद है।


कुछ दिन पहले राजेश सरोज का जिक्र था ब्लॉग पोस्ट में –

कल जब मैं द्वारिकापुर घाट पर टहल रहा था, तो वह स्वत: मेरे पास आ कर खड़ा हो गया। मुझसे बात करना चाहता है, जब भी वह दिखाई पड़ता है। कभी कभी वह बम्बई से भी फोन किया करता था। अपने परिवेश से अलग व्यक्ति के साथ जुड़ना शायद उसे अच्छा लगता है।

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