जरई और रक्षाबंधन


राखी का बाजार बचा रहा, जरई का संसार चला गया। गरिमा, मेरी बहन, की राखी समय पर आ गई है—स्पीड पोस्ट से। सालों से पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलती रही है। पहले सामान्य लिफाफे में आती थी, फिर कोई समय आया कि स्पीड पोस्ट से आने लगी। शायद सामान्य डाक पर हम जैसे सामान्यContinue reading “जरई और रक्षाबंधन”

बेहन, बारिश और एक बंद छाता


कुछ परिस्थितियाँ बदली नहीं जातीं। उनमें अपने मन को बदला जाता है। एक औरत धान की नर्सरी से पौधे उखाड़कर उनके छोटे-छोटे गट्ठर बना रही थी। इधर उसे बेहन कहते हैं। दो छोटे बच्चे भी उसके साथ थे। वे पौधे समेटते, गट्ठर पकड़ाते और बीच-बीच में पानी में छपाछप भी कर लेते। नर्सरी में इतनाContinue reading “बेहन, बारिश और एक बंद छाता”

धान की रोपाई की रहचह


रात भर बारिश होती रही। अब तक इस मौसम में मानसून करीब अस्सी प्रतिशत कमजोर रहा था, इसलिए यह बारिश किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आई। सुबह तक पानी थम चुका था और साइकिल लेकर निकलने का मौसम बन गया था। कमीज़ की जेब में नोकिया का चुटपुटिया मोबाइल रखा और मैं निकल पड़ा।Continue reading “धान की रोपाई की रहचह”

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