नयी सुबह


 

सूर्योदय

हनुमान जी अपने मन्दिर में ही थे। लगता है देर रात लखनऊ से लौट आये होंगे पसीजर से। लखनऊ जरूर गये होंगे फैसला सुनने। लौटे पसीजर से ही होंगे; बस में तो कण्डक्टर बिना टिकट बैठने नहीं देता न!

सूर्जोदय हो रहा था। पहले गंगा के पानी पर धूमिल फिर क्या गजब चटक लाल। एक नये तरह का सवेरा! बड़ी देर टकटकी बांध देखते रहे हम।

जूतिया के व्रत का नहान। पर गंगाजी में इतना ज्यादा पानी आ गया है कि अच्छों अच्छों को पसीना आ जाये पानी में हिलने में। लिहाजा एक दो औरतें ही दिखीं। पण्डाजी की दुकान चमक न पा रही थी।

मैने जोर से सांस भरी – आज नई सी गन्ध है जी। नया सा सवेरा।