राजबली के साथ कुछ समय – बसुला और कलम का मेल

मुझे उनका काम स्वप्निल लगता है और उन्हे मेरी साहबी। हम दोनो जानते हैं कि एक दूसरे से केवल बोल बतिया ही सकते हैं। आपस में मिलने का आनंद ले सकते हैं। न वे मेरा काम कर सकते हैं न मैं उनका।


एक सप्ताह पहले राजबली को खिन्न पाया था। वे एक गुमटी बना रहे थे। बताया कि किसी ग्राहक के लिये नहीं, घर के बाहर लगेगी और पोता उसमें दुकान लगायेगा। पान मसाला बेचेगा।

“अरे, आप लोग तो कारीगर हैं। हाथ में हुनर है। इस तरह दुकान लगाने की क्या जरूरत? काम तो आप लोगों के पास आता है!” – मैंने कहा। मुझे वास्तव में आश्चर्य हो रहा था।

राजबली विश्वकर्मा गांव के कारीगर हैं – खाती और लुहार। भट्ठी, धौंकनी, बसुला, घन, हथौड़े से काम करने वाले। खेती किसानी उनके बल पर चलती रही है। आज भी उनके हुनर के अनेक प्रकार के काम गांवदेहात और शहर को कराने होते हैं। मेरी मचिया के फ्रेम उन्होने ही बनाये हैं।

गुमटी बनाते राजबली

जो उस दिन राजबली ने कहा; उससे स्पष्ट हुआ कि हुनर ही काफी नहीं। काम समय और नियमितता मांगता है। आपको अपनी साख के अनुसार मिल कार्य समय पर निपटाना पड़ता है – गुणवत्ता से भी और समय से भी। उसमें कोताही नहीं चल सकती। लगता है, उनके पोतों ने काम करने में कोताही की थी। उसका दर्द राजबली की बातचीत में झलक रहा था। बताया कि सवेरे छ बजे से काम में लगे हैं और चार घण्टे में पेट में एक दाना तक नहीं गया है।

दो ही दिन में गुमटी लगभग बन गयी है। उनकी गाय जहां बंधा करती थी, वहां अब गुमटी रख दी गयी है। अभी शायद कुछ काम बाकी है। पर मैं आशा करता हूं कि गुमटी का प्रयोग करने की उनके परिवार को जरूरत न पड़े। उनका परिवार अपने हुनर, अपने धर्म के अनुसार चले। देखें, आगे क्या होता है।

[…]

उस दिन की खिन्नता के उलट आज राजबली प्रसन्नमन थे। बसुला से एक लम्बी लकड़ी छील रहे थे। मैंने पूछा – क्या बना रहे हैं?

“फरसा का बेंट।”

बसुला से फरसा के बेंट के लिये लकड़ी छील रहे राजबली

“पर इसको तो बसुले से छील कर आधा कर दे रहे हैं। आप खुद ही कहते हैं कि लकड़ी बहुत मंहगी है। उसमें भी आधी लकड़ी छिलाई में निकल जायेगी। पैसा तो आप पूरी लकड़ी का ही लेंगे?!”

राजबली ने बताया कि लकड़ी मंहगी है, उसकी चिराई भी मंहगी है और छिलाई का भी अपना दाम है। पर कोई चीज बरबाद नहीं होती।

राजबली ने मेरे लिये कुर्सी मंगाई। घर से एक महिला चाय ले कर आई। मुझे कहा कि पी लूं। “चीनी बहुत कम डाली है।”

राजबली के चीनी न लेने के बारे में सवाल पूछने पर मैंने कहा – “नौकरी की जिंदगी में शारीरिक काम तो किया नहीं। चीनी जितनी खानी थी जिंदगी भर में, उससे दुगुनी, तिगुनी खा डाली। तो अब रोक तो लगानी ही पड़ेगी। … आपकी तरह बसुला तो चलाया नहीं। इसी लिये कहता हूं कि आप अपना काम सिखा दीजिये मुझे।”

“आप से नहीं चल पायेगा। दो दिनमें पेखुरा पिराई लागे। हाँथ की कोई न कोई उंगली कट जायेगी या चोटिल हो जायेगी। अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जायेगी। आप मेरा काम नहीं कर सकते, मैं आपका काम नहीं कर सकता।” राजबली कहते हैं कि दो तीन घण्टा बसुला और घन चलाते हैं वे। भट्ठी की धौंकनी भी खींचते हैं। इस उम्र में भी इतना करते हैं। अब आंखें कमजोर होने लगी हैं इसलिये पलंग बनाने का बारीक काम नहीं करते, बाकी सब कर रहे हैं।

मैं उनकी चाय की तारीफ करता हूं तो वे अपने तरीके से कॉम्प्लीमेण्ट लेते हैं। “चाय हम लोगों के लिये क्या है! उपरी क पेट सोहारी से थोरौ भरथअ (उपले की जरूरत वाली खुराक के लिये पतली मठरी से कुछ फर्क थोड़े ही पड़ता है)। हम लोग तो मोटी मोटी खूब रोटियां खाने वाले लोग हैं।” उनके कहने का तात्पर्य यह था कि ग्लास भर की चाय उन लोगों के लिये तो ऊंट के मुंह में जीरा है!

राजबली ने कहा कि अगर मैं उनसे दस बीस साल पहले मिला होता तो वे मेरे साथ ही हो लेते। कोई भी नौकरी दिला देता तो ज्यादा बढ़िया रहता। … मुझे उनका काम स्वप्निल लगता है और उन्हे मेरी साहबी। हम दोनो जानते हैं कि एक दूसरे से केवल बोल बतिया ही सकते हैं। आपस में मिलने का आनंद ले सकते हैं। न वे मेरा काम कर सकते हैं न मैं उनका।

पर हम दोनो को एक दूसरे का साथ अच्छा लगता है। ऐसा मुझे अनुभव होता है। उन्हे भी होता ही होगा! उनसे मुलाकातें होती ही रहती हैं।

राजबली के घर के आगे गुमटी रख दी गयी है। आशा है उसकी जरूरत न पड़े। उनका परिवार अपने हुनर से ही समृद्धि अर्जित करे।

पहले का ग्रामीण रहन सहन और प्रसन्नता

लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।


गांवदेहात में घूमते हुये जब मुझे अपनी या उससे अधिक उम्र के लोग मिलते हैं तो उनसे बातचीत करने में मेरा एक प्रमुख विषय होता है कि उनके बचपन से अब में ग्रामीण रहन सहन में कितना और कैसा परिवर्तन हुआ है। अलग अलग लोग अलग अलग प्रतिक्रिया करते हैं। मुख्यत: दलित बस्ती के लोगों की प्रतिक्रिया होती है कि पहले से अब उनकी दशा में बहुत सुधार हुआ है।

अन्य वर्गों के लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।

कल अगियाबीर में गुन्नीलाल पाण्डेय जी से मुलाकात हुई। उनके साथ रिटायर्ड प्रिंसिपल साहब – प्रेमनारायण पाण्डेय जी भी थे। दोनो सज्जन सत्तर के आरपार हैं। दोनो के पास पुराने और नये जमाने की तुलना करने के लिये पर्याप्त अनुभव-आयुध है।

प्रेम नारायण मिश्र (बायें) और गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नी पांंड़े ने मेरे अनुरोध पर अपनी छत पर चढ़ी लौकी से तीन लौकियां मुझे दी थीं। जब बात पुराने नये रहन सहन की चली तो गुन्नी बोले – “हेया देखअ; पहिले अनाज मोट रहा। बेर्रा, जवा, बजरी, सांवा मुख्य अनाज थे। गेंहू तो किसी अतिथि के आने पर या किसी भोज में मिलता था। पर उस भोजन में ताकत थी। लोग पचा लेते थे और काम भी खूब करते थे।

“आजकल सब्जी भाजी रोज बनती है। तब यह यदा कदा मिलने वाली चीज थी। बाजार से सब्जी तो कभी आती नहीं थी। घर के आसपास जो मिल जाये, वही शाक मिलता था। और तब ही नहीं, युधिष्ठिर ने भी यक्ष-संवाद में कहा है कि पांचवे छठे दिन सब्जी बना करती थी।”

मेरे लिये यह एक नयी बात थी। मैंने पूछा – “अच्छा? युधिष्ठिर ने क्या कहा?”

यक्ष – युधिष्ठिर संवाद

गुन्नीलाल जी ने महाभारत का एक श्लोक सुनाया। उन्होने बताया कि अरण्य पर्व में यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद है। उसमें यक्ष का एक प्रश्न है –

यक्ष उवाच – को मोदते?

युधिष्ठिर उवाच – पंचमेSहनि षष्ठे वा, शाकम पचति स्वे गृहे। अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते॥

इसका हिंदी अनुवाद मैंने अंतरजाल से उतारा –

यक्ष प्रश्न : कौन व्यक्ति आनंदित या सुखी है?

युधिष्ठिर उत्तरः हे जलचर (जलाशय में निवास करने वाले यक्ष), जो व्यक्ति पांचवें-छठे दिन ही सही, अपने घर में शाक (सब्जी) पकाकर खाता है, जिस पर किसी का ऋण नहीं है और जिसे परदेस में नहीं रहना पड़ता है, वही मुदित-सुखी है।

गुन्नीलाल जी ने अपने शब्दों में स्पष्ट किया कि शाक-सब्जी रोज बनने की चीज नहीं थी; महाभारत काल में भी नहीं। सम्पन्नता आज के अर्थों में नहीं थी। पैसा नहीं था। लोग अपनी आवश्यकतायें भी कम रखते थे। इसलिये उनपर कर्जा भी नहीं हुआ करता था। गांगेय क्षेत्र में लोग बहुत यात्रा भी नहीं करते थे। परदेस में जाने रहने की न प्रथा थी, न आवश्यकता। इस प्रकार लोग आज की अपेक्षा अधिक आनंदित और सुखी थे।

राजबली विश्वकर्मा

लगभग ऐसी ही बात मुझे राजबली विश्वकर्मा ने भी बताई थी। उन्होने तो बारह किलोमीटर दूर अपनी किराना की दुकान खोली थी, जिसे उनके बाबा बंद करा कर उन्हें गांव वापस ले आये थे। उनके अनुसार भी खाने को मोटा अन्न ही मिलता था, जिसमें आज की बजाय ज्यादा ताकत थी। “आज अनाज उगने में पहले से आधा समय लेता है। इस लिये उसमें स्वाद भी नहीं होता और ताकत भी आधा ही होती है उसमें।”

राजबली के अनुसार भी उस समय लोग ज्यादा प्रसन्न रहा करते थे। “अब तो मोबाइल में ही लगे रहते हैं। दो घर आगे वाले से महीनों बीत जाते हैं, बात ही नहीं होती।”

अपने बचपन की याद कर राजबली बताते हैं कि उन्हें कोई कपड़ा छ साल की उम्र तक नहीं सिलाया गया। पुरानी धोती आधी फाड़ कर उसी की भगई बनाई जाती थी उनके लिये। वही पहने रहते थे। ऊपर बदन उघार ही रहता था। सर्दी में पुआल और एक लोई-दुशाला में दुबके रह कर गुजार देते थे।

ये साठ की उम्र पार सज्जन जो बताते हैं; उसके अनुसार पहले पैसा नहीं था, चीजें नहीं थीं। अभाव बहुत ही ज्यादा था; पर प्रसन्नता बहुत थी।

पता नहीं आज लोग इससे सहमत होंगे या नहीं होंगे; पर इन सीनियर सिटिजन लोगों ने जो बताया, वह तो यही है।


मिशन मचिया पीछा नहीं छोड़ रहा :-)

मिशन मचिया पीछा नहीं छोड़ रहा। पर यह भी है कि हम पीछा छुड़ाना भी नहीं चाहते! क्रियेटिव आनंद मिल रहा है उसमें। 🙂


machiya
machiya मचिया

चार दिन पहले जब नीरज घर से मचिया का पैकेट ले कर गये थे, तो लगा कि महीने भर से चल रहा जुनून और उसका बोझ खत्म हो गया। सर्दी भी कम हो गयी थी। लगा कि अब सामान्य जिंदगी, अपने ढर्रे पर शुरू होगी। साइकिल उठा सवेरे घण्टा डेढ़ घण्टा घूमना, देखना और लिखना। दिन में चिड़िया की तरह चुगते हुये अखबार, पत्रिकायें या पुस्तक पढ़ना; बस।

पर, फिर लगा कि अभी दो मचिया अपनी बिटिया के लिये और दो अपने घर के लिये बनवानी बाकी हैं। रघुनाथ जी के यहाँ नोयडा में जो दो पंहुच गयी हैं, जो उन्होने अपने ड्राइंग कक्ष में सजा कर फोटो भी पोस्ट कर दी।

दिन भर उनके मैसेज और फोन आते रहे। सम्प्रेषण चलता रहा। हमने उन्हे कहा कि इसे हमारे क्रियेटिव -फन (आनंद) के लिये रहने दें; उसकी कीमत चुकाने की जिद न करें। पर उन्होने सीधे न सही, उल्टे तरीके से अपना रास्ता निकाल ही लिया। रिटर्न गिफ्ट के लिये जो कुछ उन्होने चुना, वह ऐसा है, जिसे कोई इनकार ही नहीं कर सकता! वे बड़े ही प्रिय दम्पति हैं – रघुनाथ और गीतांजलि। उम्र भी शायद हमारे आसपास होगी। ट्विटर पर वैसे जुड़े थे, मचिया ने और जोड़ दिया!

मैंने उस गुड़ बनाते किसान का चित्र न खींचा होता तो यह झंझट ( 🙂 ) ही न खड़ा हुआ होता। न रघुनाथ जी मचिया देख मचलते, न हमने कारपेण्टर, पेण्ट करने वाले और मचिया बुनने वाले सज्जनों की तलाश की होती। न गांव को इस कोण से देखा होता। अब तो मैं राजबली विश्वकर्मा के माध्यम से पिछले सत्तर साल में हुये ग्रामीण जीवन के परिवर्तन का खाका समझने और लिखने के मनसूबे बांधने लगा हूं। और यह एक ‘गरीब मचिया’ से शुरू हुआ!

मचिया पेण्ट करते हुये अशोक

और अब तो रघुनाथ जी कह रहे हैं कि गांव के कारीगरों को प्रोत्साहन देने के लिये हमें मचिया मिशन को आगे बढ़ाना चाहिये।

मचिया विषयक पोस्टें इस लिंक को क्लिक कर देखें।

संतोष मिश्र जी ने अमेजन पर मिलने वाली जो मचिया पोस्ट की है, वह तो इस देसी मचिया से कहीं अलग, कुछ अर्बन टाइप लग रही है और लागत भी देसी नहीं, अर्बन ही है! –

देसी और शहरी सामान का अंतर रहेगा ही। यहां कारीगर जो बनाता है वह हर एक पीस दूसरे से अलग होता है। एक और दूसरे में कारीगर की मनस्थिति, आसपास का वातावरण, उपलब्ध सामग्री – सब का असर होता है। उसके सामने लक्ष्य एक ही पीस को बनाना होता है। मास-प्रोडक्शन की वह सोच नहीं रहा होता। उसके सामने एक ग्राहक और एक पीस की जरूरत होती है। जब सामने 100 या हजार का ऑर्डर हो, तब मानकीकरण होगा। तब कारीगर से कारखाना बनेगा और रूरल से रूरर्बिया (rural-urbia) या सबर्बिया बनेगा।

कुल मिला कर लगता है, हम पीछा छुड़ाना भी चाहें तो यह मचिया मिशन जल्दी पीछा नहीं छोड़ेगा! 😆

राजबली विश्वकर्मा – लुहार भी हैं और खाती भी। गायत्री परिवार से जुड़े राजबली सामान्य गांव वासी से अलग और सुलझे हुये व्यक्ति हैं।

वैसे भी राजबली से मैं आगे मिलना चाहूंगा ही। वे एक सुलझे हुये, कर्तव्यपारायण, नैतिक और आम से हट कर जीव हैं। उनके साथ बातचीत कर आनंद आता है। उनसे दोस्ती का अपना आनंद है!

मचिया बीनने वाले रामसेवक जी भी मेरे माली हैं और उनका पूरा परिवार बिना किसी छल छद्म के अपने काम से काम रखता है और हर व्यक्ति कर्मठ है। अशोक तो मेरे घर के व्यक्ति जैसे हैं। इन सब के साथ मचिया को ले कर जुड़े रहना गांव को गहरे से अनुभव करना है!

मचिया बीनते रामसेवक बिंद।

फिलहाल दो मचिया पेण्ट हो रही हैं। फिर उनपर सुतली की बुनाई होगी। रामसेवक जी का कहना है कि अगर हम इस बार दो अलग अलग रंग की सुतली ले आयें (पता नहीं मिलती है या नहीं) तो मचिया और डिजाइनदार हो जायेगी। अब उसकी भी तलाश की जायेगी।

मिशन मचिया पीछा नहीं छोड़ रहा। पर यह भी है कि हम पीछा छुड़ाना भी नहीं चाहते! क्रियेटिव आनंद मिल रहा है उसमें। 🙂


1941 से 2021 – अनिरुद्ध कर्मकार से राजबली विश्वकर्मा

मैं ‘गणदेवता’ जैसे किसी दस्तावेज सृजन का स्वप्न तो नहीं देखता; पर अपने जीवन की दूसरी पारी में गांव में रहने के कारण यह तो मन में है कि पचास साल से हुये ग्रामीण बदलाव को महसूस किया जाये और लेखन में (भले ही ब्लॉग पर ही हो) दर्ज किया जाये।


गणदेवता – ताराशंकर बंद्योपाध्याय

“गणदेवता” (सन 1941-46 के बीच लिखा कालजयी उपन्यास। लेखक ताराशंकर बंद्योपाध्याय) के प्रारम्भ में आते हैंं पात्र – अनिरुद्ध कर्मकार लुहार और गिरीश सूत्रधार बढ़ई। पंचग्राम (पांच गांवों का समूह) के गांव वालों के सभी लुहार/बढ़ई के काम ये करते हैं। ये दोनों बेगारी और बिना पैसा दिये काम कराने की गांव की व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े होते हैं। उपन्यास का समय बंगाल और भारत के नवजागरण काल का है। ताराबाबू उपन्यास के हिंदी अनुवाद की भूमिका में लिखते हैं –

बंगाल के ग्राम्य जीवन का जो चित्र इस उपन्यास का आधार है, वह केवल बंगाल का होने के बावजूद भी, उसमें सम्पूर्ण भारत के ग्राम्यजीवन का न्यूनाधिक प्रतिबिम्ब मिलेगा। बंगाल के गांव का खेतिहर-महाजन श्रीहरि घोष, संघर्षरत आदर्शवादी युवक देबू घोष, अथवा जीविकाहीन-भूमिहीन अनिरुद्ध लुहार केवल बंगाल के ही निवासी नहीं हैं। इनमें भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम – सब दिशाओं के भिन्न भिन्न राज्यों के ग्रामीण मनुष्यों का चेहरा खोजने पर प्रतिबिम्बित मिल जायेगा। बंगाल के श्रीहरि, देबू या अनिरुद्ध ने दूसरे प्रांतों में जा कर सिर्फ नाम ही बदला है, पेशे और चरित्र में वे लोग भिन्न नहीं हैं।

राजबली विश्वकर्मा की लोहा तपाने की भट्ठी। बांयी ओर धौंकनी (bellow) दिख रही है। भट्ठी के सामने कूट (anvil) है।

मैंं मचिया मिशन के संदर्भ में आसपास के लुहार – खाती/बढ़ई लोगों से मिला हूं। द्वारिकापुर के भोला विश्वकर्मा और कटका पड़ाव के राजबली विश्वकर्मा से कई बार मिला हूं। राजबली के साथ उनके घर-कम-वर्कशॉप पर पीढ़ा और कुर्सी पर बैठ कर उनसे बात की है। उनके घर की तीन पीढ़ी से मेरा परिचय है। हर एक के गुणों, बदलावों और बदलते जीवन मूल्यों को मैंने महसूस किया है। मैंने यह भी विश्लेषण करने का यत्न किया है कि भोला विश्वकर्मा ने कई बार चक्कर लगाने और उसके द्वारा मांगी गयी कीमत पर सहमत होने के बावजूद भी क्यों नहीं बनाया मचिया का फ्रेम? लीक से अलग काम करना क्यों नहीं चाहता आम गंवई कारीगर? उसके उलट राजबली ने अपने कहे को निभाया। राजबली की इज्जत, प्रतिष्ठा और जीवन मूल्य क्या हैं?

राजबली का पोता ईश्वरचंद्र मुझे भट्ठी की कार्यविधि समझाते हुये।

समाज में, विशेषकर कारीगर समाज कैसा है और उसके जीवन में क्या परिवर्तन हुये पिछले पचास साठ साल में – वह जानना और दर्ज करना मुझे एक चैलेंज लगता है।

गणदेवता को तो ज्ञानपीठ पुरस्कार ही मिला। मेरे ख्याल से उससे कई कमतर पुस्तकों को नोबेल मिल चुका है। मैं उस पुस्तक जैसे किसी दस्तावेज सृजन का स्वप्न तो नहीं देखता; पर अपने जीवन की दूसरी पारी में गांव में रहने के कारण यह तो मन में है कि पचास साल से हुये ग्रामीण बदलाव को महसूस किया जाये और लेखन में (भले ही ब्लॉग पर ही हो) दर्ज किया जाये।

भट्ठी पर गलीचा बुनकर के औजार को तपाते और धार देते राजबली।

राजबली का जीवन बंगाल के अनिरुद्ध कर्मकार जैसा तो नहीं दिखता। उनके बेटे शिवकुमार ने बताया कि उनके घर में अभाव जैसा कुछ नहीं था। औराई से गडौली तक पांच-छ कोस के इलाके में सारी खेती किसानी उन्ही के द्वारा बनाये गये औजारों-हलों पर निर्भर थी। लोगों के पास पैसे नहीं होते थे और पैसे की बजाय बनी-मजूरी का प्रचलन था। उनके घर में इतना अनाज आता था कि मौसम से इतर उसे खरीदने वाले भीड़ लगाये रहते थे। यह सब उनकी कारीगरी के बल पर ही था। अब भी काम मिलने की समस्या नहीं है। हुनर के लिये ग्राहक हैं ही। यह जरूर है कि समय के साथ काम का स्वरूप/प्रकार बदला है। पहले जिन चीजों की जरूरत होती थी, आज उनकी मांग नहीं है।

शिवकुमार जो बता रहे थे, वह मेरी सामान्य सोच और “गणदेवता” में पढ़े बदलते समय के द्वंद्व से अलग, एक खुशनुमा रोमाण्टिक कथा जैसा लगा। किसी बदलते समय की क्राइसिस जैसा नहीं। क्या ऐसा है? क्या ऐसा इसलिये है कि राजबली ने अपने और अपने परिवार के लिये नैतिक चरित्र के प्रतिमान बना दिये हैं और उनका पालन करते हैं? क्या ऐसा अगर वास्तव में है तो वह इसलिये कि उनके परिवार की जरूरतें संयमित थीं/हैं? या सामान्यत: कारीगर वर्ग दलित या खेत मजदूरों की अपेक्षा हमेशा बेहतर रहा और उसे अपने हाथ के हुनर के बल पर कभी आर्थिक समस्या नहीं आयी?

मेरे घर पर शिवकुमार अपने पिताजी (राजबली) के बारे में बताते हुये।

मैं शिवकुमार से कहता हूं कि उनके पिताजी के पास मुझे फुर्सत में समय गुजार कर उनके जीवन की गाथा सुननी और नोट करनी है। कुछ दिनों में मौसम सुधरे तो यह किया जाना है। शिवकुमार ने बताया कि राजबली सवेरे तीन बजे उठ कर शौच-स्नान-पूजा-पाठ में समय व्यतीत करते हैं। उनहत्तर साल के हो गये हैं पर दिनचर्या के नियम पूरी कड़ाई से पालन करते हैं। अपनी जिंदगी अपने उसूलों के अनुसार चलाते हैं और उसमें किसी की दखल नहीं होती! शिवकुमार अपने पिता के बारे में जो भी बताये, उसके अनुसार राजबली के पास फुर्सत के समय में मिलने की इच्छा बलवती हो गयी है। अभी तो जब भी उनसे मिला हूं, वे काम में लगे मिले हैं। कभी खड़ाऊं बनाते, कभी भट्टी पर लुहार का काम करते पाया है।

‘गणदेवता’ के अनिरुद्ध कर्मकार के समांतर राजबली विश्वकर्मा को रख कर तुलना करना रोचक होगा। उन दोनो का जीवन अब तक ज्ञात जानकारी के अनुसार बहुत अलग नजर आता है।

देखें; राजबली से विस्तृत मुलाकात कब होती है!


2 मचिया बन गये अंतत:

मचिया के फ्रेम से मेरी पत्नीजी को एक और रचनात्मक काम मिल गया। … मैं बार बार जा कर उन्हे तन्मयता से पेण्ट करते देखता रहा। बहुत कुछ ऐसा भाव था उनके मन में जैसे कोई महिला एक शिशु को दुलार रही हो।


मैंने राजबली विश्वकर्मा जी से मिल कर तय किया था कि वे दो मचिया के फ्रेम बनायेंगे।

अपने कहे के पक्के निकले राजबली जी। वे सोमवार को मुझे बना कर देने का वायदा किये थे, पर रविवार को ही उन्होने सूचना दी कि उनका काम पूरा हो गया है। मैंने जा कर देखा तो उनके बनाये फ्रेम को संतोषजनक पाया। उसी दिन शाम को उनका पोता ईश्वरचंद्र मेरे घर पर दोनो मचिये के फ्रेम दे गया। शायद उन्हे मेहनताना लेने की जल्दी थी। पर निश्चय ही, राजबली पहले वाले खाती भोला विश्वकर्मा से बेहतर – बहुत बेहतर साबित हुये। व्यक्ति के रूप में भी और कारीगरी के रूप में भी।

2 मचिया पूर्णत: बनने के बाद सेण्टर टेबल पर रखे हुये।

फ्रेम बनने के बाद हमें यकीन हो गया कि अब मचिया बन ही जायेंगे। अब मेरी पत्नीजी के मन में यही चलने लगा कि कैसे उत्कृष्ट मचिया बन सके। वे आजकल अपने बगीचे के साथ बहुत प्रयोग करती हैं। घर के बेकार प्लास्टिक के डिब्बे – बोतल काट कर उन पर पेण्ट कर कई खूबसूरत गमले उन्होने बनाये हैं। पेड़ पर पुराने जूते भी टांगें हैं कि कोई चिड़िया उसमें अपना घोंसला बना ले। कार के टायर बदलने के बाद पुराने टायर फैंके नहीं गये। उनके साथ भी मुड्ढ़ा, या सेण्टर टेबल या कोई हैंगिंग गमला बनने जा रहा है। इस सब करने में वे अपने को दिन भर व्यस्त रखती हैं।

मचिया के फ्रेम से उन्हे एक और रचनात्मक काम मिल गया। हम ह्वाइट प्राइमर, ब्राउन पेण्ट, तारपीन का तेल, सैण्डपेपर और ब्रश आदि ले कर आये। एक कागज पर मचिया का फ्रेम रख कर वे अकेले पोर्टिको में बैठ गयीं। मैं बार बार जा कर उन्हे तन्मयता से पेण्ट करते देखता रहा। बहुत कुछ ऐसा भाव था उनके मन में जैसे कोई महिला एक शिशु को दुलार रही हो।

सर्दी में ठण्डी हवा में बाहर पोर्टिको में बैठ मचिया पेण्ट करती रीता पाण्डेय

एक मचिये पर उन्होने पेण्ट किया। उसके बाद हमारे वाहन चालक अशोक को भी जोश आया। दूसरे पर अशोक ने पेण्ट किया। और बढ़िया काम किया उन्होने।

मचिया बीनने के लिये हमारे माली रामसेवक जी ने अपनी सेवायें दीं। उन्होने बताया कि वे चारपाई तो बुनते हैं, पर मचिया बीने बहुत अर्सा हो गया। अब मचिया का प्रचलन नहीं है तो बुनना भी नहीं होता। हम मचिया की जरूरत भर की मोटी सुतली महराजगंज बाजार से खरीद लाये। लोग आजकल सुतली का भी प्रयोग नहीं करते। इसलिये, सुतली मिल तो गयी, पर आशा से ज्यादा रेट लगा। खैर, प्रयोग करते समय एक अच्छी मचिया बनाना ध्येय था, कीमत नहीं! 😀

फ्रेम का पेण्ट कल तक सूख गया था। सवेरे बहुत कोहरा था। रामसेवक बनारस जाते हैं काम करने। घने कोहरे के कारण नहीं जा पाये। सो गांव में उनके पास समय था और दिन भर में उन्होने मचिया ही बुन डाले।

पहली मचिया अपने घर पर बुन कर रामसेवक लाये तो मन मुग्ध हो गया।

बहुत सुंदर मचिया की बुनावट थी रामसेवक की। मेरे मित्र गुन्नीलाल पांड़े, जो कल आये थे, ने देख कर कहा कि “मचिया खूब गझिन बुनी है। आम तौर पर इतनी बढ़िया बुनावट देखने में नहीं आती। पहले कभी कदा कोई ऐसी बुनता था। अब तो कोई बुनता भी है तो सीधी सपाट बुनाई करता है। आपके बुनने वाले ने शानदार काम किया है।”

गुन्नी पांड़े, जो पूरी जिंदगी गांव में रहे हैं, अगर ऐसा कहते हैं तो मचिया की बुनावट वास्तव में उत्कृष्ट मानी जानी चाहिये। यही ध्येय मेरी पत्नीजी का था। इस ‘गझिन, तीन लेयर की बुनावट में’ सामान्य से दुगनी सुतली लगी। पर मचिया मजबूत बनी है।

रामसेवक मचिया बुनते हुये।

कल मचिया का चित्र ट्विटर पर पोस्ट किया तो सबसे पहले मेरी बिटिया वाणी ने कहा कि उसे यह चाहिये। उसे बताया गया कि यह तो रघुनाथ जी के लिये बनी है। अगली बार उसका नम्बर लगेगा।

रघुनाथ जी ने टिप्पणी की कि ऐसी ही मचिया की कल्पना उन्होने की थी – “रस्सी से बुनी हुई।” और उन्हे बेसब्री से इंतजार है मचिया का!

छतीसगढ़ से सुरभि तिवारी का कहना था – “वाव भैया मुझे ये बहुत पसंद है। आप, पास में होते तो मैं अपने लिए भी बनवाने का आग्रह करती।” भारतीय रेलवे के अधिकारी संतोष मिश्र जी ने कहा – “वाह, मजबूत और सुंदर। इस पर बैठ कर कौड़ा तापने का मजा आ जाएगा। मेरे लिए भी ऑर्डर करवा दीजिये।”

अब “ऑर्डर करवाने” का तो कोई विकल्प है ही नहीं। इसको बनाने में हम न केवल फेसिलिटेटर थे, वरन सक्रिय रूप से बनाने में जुटे भी थे। आगे भी अगर बनाना/बनवाना होगा तो मशक्कत हमें ही करनी होगी। 🙂

अभी रघुनाथ जी के लिये ये मचिए पैक कर कुरियर करना बाकी है। मौसम बहुत खराब है। कोहरा है और गलन भी। कुरियर करने में तो एक दो दिन लगेंगे। यह रघुनाथ जी को मैंने बताया। रघुनाथ जी का कहना है –

“Gyan ji you (people – my wife included) are facilitators. A very viable and trusted facilitator with offering them (the villagers) e-commerce arrangement. You are An aggregator of different craftsmen from your village who look up to you as patron. For instance, you have brought carpenter, thread seller, weaver, painter and courier together. This carpenter displayed keen interest in creating the frame in no time. The others you aggregated. If these segments get steady traffic on your trust equity, you could create earning opportunity for all of them.”

मैंने कभी इस कोण से सोचा नहीं था, जिसकी बात ऊपर रघुनाथ जी ने की है। मेरे विचार में था कि किसी भी प्रकार का बिजनेस करने या प्रोमोट करने में लोग यही सोचेंगे कि यह बंदा प्रॉफिट कमाने के लिये उद्यम कर रहा है! एक शुद्ध ब्यूरोक्रेट दिमाग में वह सोच जमती नहीं। सरकार अगर पेंशन न दे रही होती तो जरूर इस दिशा में सोच कर अब तक कुछ असफल/सफल प्रयास कर चुका होता। पर जो रघुनाथ जी कह रहे हैं; मैं गांव वालों को जीविका में कुछ वृद्धि करने की सम्भावनायें दे सकता हूं। उस दिशा में मुझे सोचना या प्रयास करना चाहिये।

फिलहाल तो मचिया देख कर आनंदित हो रहे हैं मेरी पत्नीजी और मैं। आशा है चित्र में आपको भी अच्छे लग रहे होंगे, मचिये!


मचिये के लिये मिला राजबली विश्वकर्मा से

राजबली का परिवार अलाव जला कर कोहरे में गर्माहट तलाशता बैठा था। आकर्षक मूछों वाले राजबली एक मोटे लकड़ी के टुकड़े को बसुले से छील भट्ठा पर काम करने वालों के लिये खड़ाऊँ बना रहे थे।


मेरे खींचे एक चित्र में गुड़ बनाने वाले किसान के पास ताजा बनते गुड़ के लालच में एक छोटा बच्चा मचिया पर बैठा था। जब मैंने वह चित्र खींचा या सोशल मीडिया पर डाला, तो मेरे मन में मचिया था ही नहीं। किसान एक परात में गर्म श्यान गुड़ की भेलियां बना रहा था, ध्यान उसी पर था। पर ट्विटर पर गये उस चित्र में ए.एस. रघुनाथ जी को मचिया ही नजर आयी। 🙂

मचिया (machiya) पर बैठा छोटा बच्चा

उस चित्र को देख कर रघुनाथ जी ने अपनी ट्वीट में मचिया की इच्छा व्यक्त की थी –

वह ट्वीट लगता है मन के किसी कोने में बनी रही। मेरे ड्राइवर ने सुझाव दिया कि वैसे तो लोग मचिया का प्रयोग आजकल करते नहीं हैं; पर भोला विश्वकर्मा सम्भवत: मचिया बना सकता है।

उसके सुझाव पर आठ जनवरी को मैं श्री ए.एस. रघुनाथ जी के लिये मचिया तलाशते, सपत्नीक द्वारिकापुर के खाती भोला विश्वकर्मा के यहां गया था। द्वारिकापुर का रास्ता चार पहिया वाहन के लिये सरल नहीं है। फिर भी हम रेलवे लाइन के बगल से कच्चे, गिट्टी भरे रास्ते पर वाहन किसी तरह साधते वहां पंहुचे।

भोला ने चार पांच दिन में मचिया का लकड़ी का ढांचा बना कर देने का वायदा किया था। उसके बाद उस ढांचे पर हमें किसी जानकार को पकड़ कर सुतली से बिनवाना होता।

भोला विश्वकर्मा। उन्होने बहुत टालमटोल की और मचिया बनाया नहीं।

मैं भोला से बात करने के बाद बहुत आशान्वित हुआ कि सप्ताह भर में मचिया बन कर तैयार हो जायेगी।

पर उसके बाद मैंने भोला की लकड़ी की टाल-दुकान पर तीन चक्कर लगाये। अपने ड्राइवर को भी चार बार अलग से भेजा। कई बार उसे फोन भी किया। पर उसने आज नहीं कल की टरकाऊ बात ही की। कभी कहा कि वह दुकान पर नहीं है, नाई के यहां हजामत बनवा रहा है। कभी उसके लड़के ने फोन उठाया और पिता से बात कराने का वायदा किया, जो पूरा नहीं हुआ।

अंतत: दो सप्ताह बाद मुझे यकीन हो गया कि भोला बनाने वाला नहीं। शायद वह लकड़ी के फट्टे जोड़ कर तख्त या गांव के किसानों के लिये खुरपी-फावड़ा के बेंट भर बनाता है। उसके पास साधारण काम की भरमार है और उसको उसी से फुर्सत नहीं है। फुटकर कामों के लिये गांव वाले उसका तकाजा करते रहते हैं या उसके पास बैठ अपना काम निकालते हैं। उसका बिजनेस मॉडल मेरे जैसे ग्राहकों के लिये ‘ऑफ-द-लाइन’ सामान बनाने का है ही नहीं।

गांवदेहात के अलग अलग प्रकार के कारीगर इसी सिण्ड्रॉम ग्रस्त हैं। भऊकी, दऊरी या छिटवा/खांची बनाने वाले भी शहरी जरूरत के हिसाब से अपने उत्पाद के डिजाइन में परिवर्तन नहीं करते। उन्हे मैंने नये प्रकार की भऊंंकी बनाने का बयाना भी दिया पर बार बार कहने पर भी बनाया नहीं। बयाना का पैसा भी वापस नहीं मिला। वे अपने सामान्य कामों में व्यस्त रहते हैं और वही उन्हे सूझता है।

इसी तरह कुम्हार भी सामान्य दियली, कुल्हड़ के इतर कुछ भी बनाने में रुचि नहीं दिखाते। मैंने उनके साथ भी माथापच्ची की कि वे कोई वेस, कोई नायाब तरीके का गमला बनायें; पर वे नहीं कर पाये।

खाती-कारपेण्टर का हाल तो भोला विश्वकर्मा ने स्पष्ट कर दिया। जो काम वे कर रहे हैं, उन्हें बहुत ज्यादा पैसे नहीं मिलते और उनका व्यवसाय बढ़ने की सम्भावनायें भी नहीं हैं। व्यवसाय बढ़े तो उसके लिये उनके पास रिसोर्सेज या डिमाण्ड को पूरा करने की सोच भी नहीं है। वे एक दिन से दूसरे दिन तक का जीवन जीना ही अपना ध्येय मानते हैं। 😦

पर उसके बाद मैंने भोला की लकड़ी की टाल-दुकान पर तीन चक्कर लगाये। अपने ड्राइवर को भी चार बार भेजा। कई बार उसे फोन भी किया। पर उसने आज नहीं कल की टरकाऊ बात ही की। अंतत: दो सप्ताह बाद मुझे यकीन हो गया कि भोला बनाने वाला नहीं।

यही क्या, आप किसान को भी ले लीजिये। वह अपने कम्फर्ट जोन में गेंहू-धान की मोनो कल्चर में ही लिप्त है। कोई नया प्रयोग करना ही नहीं चाहता। हमने बार बार कहा अपने अधियरा को कि वह हल्दी, अदरक या सूरन, सब्जी उगाने की पहल करे। हम उसका घाटा भी हेज करने को तैयार थे; पर वह आजतक हुआ नहीं। 😦

खैर; अब मेरे पास विकल्प था बनारस की दुकानों में मचिया तलाशने का। विशुद्ध गंवई चीज शहर में तलाशने का!

कल हम बनारस जा कर यह तलाश करने वाले थे, ‘नयी सड़क’ की गलियों में। इसी बीच मैंने ग्रामीण विकल्प टटोलने के लिये अपने यहां जेनरेटर ठीक करने वाले शिवकुमार विश्वकर्मा से फोन पर बात की। शिवकुमार के घर में बाकी लोग बनारस में खाती-लुहार का काम भी करते हैं। रोज आते जाते हैं।

शिवकुमार ने कहा कि बेहतर है मैं सवेरे उनके यहां आ कर उनके पिताजी से बात कर लूं। वे यह सब काम करते हैं।

मैं सवेरे गया उनके पिता जी से मिलने। कोहरा घना था, पर फिर भी घर से निकल कर गया। और वहां शिवकुमार के पिताजी से मिल कर लगा कि सही जगह पंहुच गया मैं। पूरा परिवार अलाव जला कर कोहरे में गर्माहट तलाशता बैठा था। आकर्षक मूछों वाले शिवकुमार के पिताजी एक मोटे लकड़ी के टुकड़े को बसुले से छील रहे थे। उनके रोबदार व्यक्तित्व, काम करने के सिद्धहस्त अंदाज और बोलने के तरीके से प्रभावित हुआ मैं। शिवकुमार ने बताया कि भट्ठा पर धधकते कोयले की गर्मी से बचने के लिये वहां काम करने वाले मोटी खड़ाऊं पहनते हैं। उसके पिताजी वही बना रहे हैं।

शिवकुमार के पिता राजबली विश्वकर्मा बसुले से खड़ाऊँ का बेस बनाते हुये।

शिवकुमार के पिताजी ने अपना नाम बताया राजबली विश्वकर्मा। मुझे बैठने के लिये एक कुर्सी मंगाई। सादर बिठा कर मुझसे उन्होने आने का प्रयोजन पूछा।

“आपके पास आने के पहले मैं द्वारिकापुर के भोला विश्वकर्मा के पास गया था। उन्होने मचिया बनाने के लिये चार दिन का समय मांगा और टालमटोल करते दो हफ्ते गुजार दिये। तब मुझे लगा कि शिवकुमार से बात की जाये। उन्होने सुझाया कि आपसे मिल लूं।”

राजबली जी ने मेरी बात सुन कर अपने पोते से मचिया के गोड़े (पाये) घर के अंदर से मंगवाये। पूछा कि क्या ऐसे ही चाहियें? उनपायों की बनावट और लकड़ी – दोनो ही अच्छे लगे।

राजबली जी के यहां के मचिया के गोड़े (पाये)।

उन्होने पाटी के लिये लकड़ी और बांस, दोनो का विकल्प बताया। यह भी कहा कि लकड़ी की पाटी मंहगी पड़ेगी और बांस की पाटी सस्ता होने के बावजूद ज्यादा मजबूत होगी। मैंने उन्हे दोनो प्रकार के एक एक नमूने बनाने को कहा। मचिया के गोड़े वे सामान्य के हिसाब से 12 इंच के रखना चाहते थे। मैंने कहा कि दो इंच बढ़ा कर रखें। शहरी आदमी बहुधा घुटने के दर्द के मरीज होते हैं। उनके लिये मचिया थोड़ी ऊची हो तो बेहतर होगी। और अगर बाद में लगे कि पाये बड़े हैं तो काट कर छोटे तो किये जा सकते हैं। राजबली मेरी बात से सहमत दिखे।

नाप और डिजाइन तय होने पर राजबली ने कहा – “मेरा काम (भोला की तरह) टालमटोल का नहीं है। बनने में जितना समय लग सकता है, उतने की ही बात करूंगा मैं और समय पर देने का पूरी कोशिश करूंगा। आप सोमवार को तैयार हुआ मान कर चलिये। बनते ही शिवकुमार आप को फोन पर बता देगा।”

“बहुत अच्छा! आपकी बात से लगता है कि मचिया बन जायेगा और अच्छा ही बनेगा!”

राजबली जी से तो पहली बार मिला था मैं। पर उनके लड़के और पोतों – ईश्वरचंद्र और विद्यासागर – से मेरा कई बार काम कराना हो चुका है। वे सभी बहुत सज्जन और नैतिकता से ओतप्रोत हैं। ज्यादा दाम मांगने या समय पर उपस्थित न होने की बात उनके साथ नहीं हुई। राजबली का व्यक्तित्व भी प्रभावशाली लगा। पहले पता होता कि राजबली कारपेण्टर का काम करते हैं, तो भोला की बजाय उनसे ही सम्पर्क करता।

बहरहाल मुझे दो – तीन दिन बाद अच्छी गुणवत्ता का मचिया मिलने की उम्मीद हो गयी है। हमने बनारस की गलियों को तलाशने का विकल्प फिलहाल ताक पर रख दिया है। रघुनाथ जी की ट्वीट को एक महीना हो गया है। अब तक गांव में मचिया बन नहीं सकी। लोगों ने यह भी कहा कि काहे मचिया की सोच रहे हैं आप। इससे बढ़िया तो प्लास्टिक का काफी ऊंचा वाला अच्छा पीढ़ा हो सकता है।

पर लोग क्या जानें एक मचिया की तलब को। बहुत कुछ वैसी ही होती है, जैसे राजबली जी को खड़ाऊँ बनाते देख मैंने उनसे कहा कि मेरे लिये भी एक जोड़ा खड़ाऊँ बना दें।

खैर, खड़ाऊं तो बनना, पहनना बाद में; फिलहाल मचिया बने। अब दाव अब राजबली जी की साख पर है! 😀

सोम (या मंगलवार तक इंतजार) करता हूं।

राजबली द्वारा बनता मोटे तल्ले का खड़ाऊँ