>>>मेमॉयर लेखन की तलब<<<
एक पत्रिका में लेख देख रहा हूं। एक स्टीम इंजन की तस्वीर है। लेख अमेरिका के विस्कॉन्सिन प्रांत के मिलवॉकी रोड के 1936 की सर्दियों पर है। मैं नक्शे में तलाशता हूं। मिलवॉकी रोड; लेक मिशिगन के तट पर स्थित मिलवॉकी से 100किमी दूर है। यह शिकागो से 130किमी पर है। नक्शा देखते देखते विस्कॉन्सिन, मिशिगन, इलीनॉय आदि प्रांतों को टटोलने लगता हूं। शिकागो की कुछ तस्वीरों और वहां के मौसम से पहचान भी है। काहे कि, पंडित राजकुमार उपाध्याय (@creative_0077) जी से ह्वाट्सएप्प पर चैट भी होती रहती है और उनका फोन भी आता रहता है।
मैं पाता हूं कि किसी भी स्थान के बारे में पांच दस प्रतिशत किसी प्रत्यक्षदर्शी का विवरण हो और आपके पास इंटरनेट की सुविधा हो तो आप उस इलाके का वर्चुअल भ्रमण कर सकते हैं। प्रेमसागर के भारत दर्शन का विवरण ब्लॉग पर लिखने के दौरान वह अनुभव मुझे हो चुका है। प्रेमसागर जी के साथ वर्चुअल भारत यात्रा करने से सम्भवत: मैं वर्चुअल यात्रा का पायोनियर बन गया हूं।
स्टीम इंजन की तस्वीर मुझे मेरे अतीत में ले जाती है। आधी से ज्यादा जिंदगी रेल गाड़ियां “हाँकते हाँकते” बीती है। बहुत सी स्मृतियां हैं। कभी उनपर लिखने का प्रयास नहीं किया। पर अगर एक वर्चुअल यात्रा करूं तो यात्रा और मेमॉयर्स – दोनो का मिलाजुला रूप प्रस्तुत कर सकता हूं। मैं यात्रा के रूट का चुनाव भी कर लेता हूं। भोपाल से गोधरा तक। भोपाल-सिहोर-उज्जैन-रतलाम-मेघनगर-गोधरा। करीब दो दशक इस इलाके में मैने गुजारे हैं। वहां के मेमॉयर्स का कोई दस्तावेज नहीं रखा। पर जो मन में है, वह बलबला रहा है। उसे फुटकर लेखन का निमित्त बनाया जा सकता है। जो स्मृतियां धुंधली हैं, उन्हें जैसा याद आये वैसा ही लिखा जा सकता है। यह जरूर है कि वह तथ्यपरक ट्रेवलॉग नहीं होगा, पर एक गल्प – तथ्यपरक गल्प जरूर होगा।
चूंकि उसमें तथ्य जरूरी नहीं कि ‘सही’ हों, वह यात्रा ज्ञानदत्त तो नहीं कर सकता। वह कौन करेगा? मैं उस चरित्र की भी कल्पना कर लेता हूं। वह यात्रा नीलकंठ करेगा। नीलकंठ चिंतामणि! मेरी तरह वह भी रिटायर्ड है। रेल सेवा से रिटायर्ड। मेरे ही घर में ऊपर के कमरे में किरायेदार के रूप में रहता है। उस वर्चुअल चरित्र को अभी पूरी तरह गढ़ना शेष है। नीलकंठ के माध्यम से मैं अपने मेमॉयर्स भी लिख सकता हूं और दो दशक बाद उन स्थानों की ‘यात्रा’ भी कर सकता हूं – वे स्थान जो मेरी जिंदगी का अंश रहे!
यात्रा की शुरुआत के दिन की भी कल्पना करता हूं। गांव का ही गोगई भोपाल में ऑटो चलाता है। उसी के घर पंहुचता है नीलकंठ। गोगई साइकिल खरीद चुका है नीलकंठ के मन माफिक। सवेरे साइकिल ले नीलकंठ निकलता है यात्रा पर। भोपाल का ताल देखता है। यूनियन कर्बाइड की बंद कम्पनी के समीप से गुजरता है। बैरागढ़ में बन रहे भोपाल बाईपास का काम उसे एक जगह साइकिल से उतर कर साइकिल धकेलने को बाध्य करता है। निशातपुरा की तरफ से आती कोयले की मालगाड़ी को पुरानी यादों के साथ निहारता है नीलकंठ। पचांवा में एंग्लोइण्डियन कैबिनमैन नीलकंठ को अपने सिहोर के घर में रात गुजारने की पेशकश करता है! … यह सब ‘गप्प’ लिखते हुये मेरे (ज्ञानदत्त पाण्डेय के) धुंधले मेमॉयर्स नीलकंठ के माध्यम से ट्रेवलॉग में उकेरे जाते हैं।
यूं शुरू होगा मेमॉयर्स मिश्रित यात्रा विवरण। निश्चय ही, उसके लिये मुझे नक्शों का, अखबारों का, विकीपेडिया का, रेल और इतर पुस्तकों का अध्ययन करना होगा। नोट्स बनाने होंगे। वर्चुअल यात्रा बुननी होगी। ब्लॉगर की बजाय एक कथा-उपन्यास लेखक जैसा बनना होगा। यह रोचक भी है और चैलेंजिंग भी। शायद अपनी तरह का इकलौता प्रयास होगा।
उनहत्तर की उम्र चैलेंज लेने की नहीं होती! इसलिये, सम्भव है कि मेरी अनेकानेक योजनाओं में से यह भी फुस्स हो कर रह जाये। पर फिलहाल मिलवॉकी के नब्बे साल पुराने स्टीम इंजन का चित्र को देख कर कल्पना का रथ दौड़ ही पड़ा है! मुझे सन 1984 में अवंतिका एक्स्प्रेस के स्टीम इंजन का फुटप्लेट याद आ रहा है जो मैने रतलाम में नौकरी ज्वाइन करने के कुछ दिनों बाद किया था। कोयले की किरकिरी आंखों में पड़ गई थी और नागदा आते आते मैं इंजन से उतर कर प्रथम श्रेणी के कोच में चला गया था। तब अवंतिका में वातानुकूलित डिब्बा नहीं होता था। एक फर्स्ट क्लास भर था।
नीलकंठ चिंतामणि को अभी बारीकी से गढ़ना शेष है। उसके बाद ही यात्रा का पहला पैडल लगेगा भोपाल से उस वर्चुअल साइकिल पर!


Ribeiro (Bullet for Bullet: My Life as a Police Officer) और E.N.Rammohan (simply Khaki) के संस्मरण की लोकप्रियता के आधार पर मेरा मत है की एक रेलवे सेवा का संस्मरण पड़ना सुखद होगा। Speech to text शायद आपका काम कुछ आसान कर दे। शुरू कीजिये क्योंकि किसी ने कहा है कि सबसे मुश्किल काम है लिखना शुरू करना, फिर सब अपने आप आता जायेगा। ‘…..कुछ ना होगा तो तज़रूबा होगा।’
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आप ने अच्छा याद दिलाया। पहले कुछ भारतीय नौकरशाहों के मेमॉयर्स पढे जायें।
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आत्मकथात्मक उपन्यासों का चलन रहा है। आप भी लिख डालिए। रोचक रहेगा इस यात्रा को पढ़ना।
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you must write out your memories of the railways.we are sadly lacking individual histories.
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टिप्पणी के लिये धन्यवाद बंधुवर। देखते हैं, क्या बनता है! :-)
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