बनारसी आलू पापड़ – जब बनारस की गलियों ने एक ब्रांड गढ़ा


एक अख़बार में लिपटे पापड़ से शुरू हुई खोज मुझे बाबूसराय की दुकान से बनारस के कबीर चौरा की गलियों तक ले गई। कुछ दिन पहले अमेज़न पर बनारसी आलू पापड़ खोज रहा था। कई ब्रांड सामने आ गए। भारत में भी बिक रहे हैं और विदेशों में भी। अमेरिका में रहने वाला कोई भारतीयContinue reading “बनारसी आलू पापड़ – जब बनारस की गलियों ने एक ब्रांड गढ़ा”

बेहन, बारिश और एक बंद छाता


कुछ परिस्थितियाँ बदली नहीं जातीं। उनमें अपने मन को बदला जाता है। एक औरत धान की नर्सरी से पौधे उखाड़कर उनके छोटे-छोटे गट्ठर बना रही थी। इधर उसे बेहन कहते हैं। दो छोटे बच्चे भी उसके साथ थे। वे पौधे समेटते, गट्ठर पकड़ाते और बीच-बीच में पानी में छपाछप भी कर लेते। नर्सरी में इतनाContinue reading “बेहन, बारिश और एक बंद छाता”

बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक


सवेरे के पौने नौ बजे थे। द्वारिकापुर गंगा-घाट से लौटते समय धूप कुछ उनींदी-सी थी। जनवरी की सुबहें वैसी ही होती हैं—आधी जागी, आधी सपनीली। बिजली की साइकिल पर चलते हुए मुझे हमेशा लगता है कि खेतों की हवा खुद रास्ता बनाती है, और हम बस उसके साथ बहते हैं। मकर-संक्रांति की गंवई भीड़, गंगाContinue reading “बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक”

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