जो गलती से लगी, वह दिशा बन गई नीलकंठ चिंतामणि उमादास को भूल ही गये थे। पर आज सवेरे जब फोन पर रात दो बजे की एक मिस्ड कॉल देखी, और नम्बर के आखिरी अंक 2848 पर नज़र पड़ी — तो एक धुंधली स्मृति तैर गई। “यह तो वही चित्रकूट जाने वाला यात्री लगता है,”Continue reading “एक मिस-कॉल”
