दिलीप से सवेरे बात होती है। वे महराजगंज में अपनी मेडिकल की दुकान पर हैं। उनका जो छोटा भाई मैडीकल दुकान चलाता है, बीमार हो गया है। अस्पताल में भर्ती है। उसका भी काम देखना होता है।
हाईवे पर ऊपरी मंजिल में उनकी साड़ी की दुकान है — वहां मिलना हुआ उनसे। मैडीकल दुकान से मुझे मिलने वे साड़ी की दुकान में आ गये। गद्दी पर बैठे मिले।
उनकी उम्र 55-56 साल की है। अपने, अपने पिताजी और अपने बाबा — जो पांच भाई थे; के बारे में बहुत कुछ जानते हैं और उनके माध्यम से जानते हैं महराजगंज का इतिहास। बाबा का जमाना 1920 का रहा। अर्थात सौ साल का इतिहास वे अच्छे से बता सकते हैं।

“आप सुनेंगे तो बहुत कहानियां हैं मेरे पास। अपने बचपन की तो हैं ही, पिताजी और बाबाजी के जमाने की भी हैं।” – दिलीप कहते हैं।
उनके बचपन में उनकी बिरादरी के 15-20 घर थे। बाबा प्रधान के घर के पास जो गली है पूरब की तरफ, उसी में बाजार था। बाबा प्रधान के घर के पास का कुआं खारे पानी का था, बाकी सब कुयें – जो दिलीप के बाबा जी और भाइयों ने खुदवाये वे मीठे पानी के थे। पर फिर भी पानी की दिक्कत हो जाती थी। गर्मी आते आते कुयें सूख जाते थे। तब साइकिल से बाल्टा लटका कर पानी सरकारी ट्यूबवेलों से लाना पड़ता था।
बिजली तो कभी कदा आती थी। आने पर इतना शोर मचता था कि अंधे को भी पता चल जाये बिजली आ गई है।… जब बिजली आती थी तो शोर मचता था, और जब नहीं होती थी—ज़िंदगी फिर भी चलती थी।
कुंये पर भी जातिगत अनुशासन था। पहले उनकी बिरादरी (चौरसिया, अग्रहरी आदि) के लोग कुंये का इस्तेमाल करते थे, चूकि कुंआ उनका खुदवाया था। उसके बाद जायसवाल लोग कुंये पर आते थे। फिर खटीक और मुसलमान लोगों की बारी आती थी।
एक जाति दूसरे के साथ कुयें की जगत पर नहीं चढ़ती थी। कभी हम लोगों को देरी हो गई और मुसलमान चढ़ गये तो हम उनके चले जाने के बाद ही कुंये पर जाते थे।
नहाने, बर्तन मांजने, कपड़े धोने के लिये दो तालाब थे। एक हुसैनीपुर में सड़क किनारे और दूसरा कंसापुर में। अब तो कंसापुर में तालाब वैसा रहा नहीं, पहले बहुत मनोरम हुआ करता था वह। आदमी लोगों का घाट अलग था और महिलाओं का अलग। महिलाओं के दो घाट थे। पूरा तालाब चारों ओर पटिया के घाटों वाला था।

सब लोग तालाब पर जाते थे। बीमार भी। उनके साथ घर का कोई और भी रहता था। कपड़े लोग दऊरी या बाल्टी में ले कर जाते आते थे।
सभ्यता और संस्कार थे लोगों में। कोई पुरुष औरतों के घाट की ओर नहीं जाता था। बच्चा भी जब 11-12 साल का होता था तो वह भी स्त्रियों के घाट की ओर नहीं जाता था।
हर आदमी तालाब को साफ रखता था। कोई साबुन लगा कर पानी गंदा नहीं करता था। अब तो वे सारे नियम टूट गये हैं।
“हम लोग खूब तैरते थे उसमें। गाय भैंस भी ले जाते थे और उसमें नहाती भैसों पर घन्टों आनंद लेते थे हम।” – दिलीप जिस तरह बता रहे थे, मानो वे अपने बचपन में खो गये हों! …तालाब में नहाती भैंसों पर बैठे बच्चे नहीं जानते थे कि वे भविष्य की स्मृतियाँ रच रहे हैं।
“सन 1968 में हमारे परिवार की मैडीकल की दुकान थी। बनारस से बैलगाड़ी से दवा आया करती थी। पूरे जिले में इस दुकान से दवा सप्लाई होती थी। जब मेरे बड़े पिताजी और पिताजी में बंटवारा हुआ तो वह दुकान बड़े पिताजी के हिस्से गई।”

“मेरे पास कोई चारा न था। हमने पढ़ाई की और फिर मैने सड़क के उस पार एक लोहे की गुमटी में दवा की दुकान खोली। मेह्नत की और ईश्वर ने बहुत साथ दिया। वह गुमटी की दुकान खूब चली। मैने काफी पैसा कमाया और उसी के बल पर आज 4-5 दुकानें हैं।”
यह इतिहास किताबों में नहीं मिलता—यह कुओं की जगत, तालाब के घाट और गुमटी की कमाई में दर्ज है।
बहुत कुछ सुनाया और बहुत कुछ सुनाने को है दिलीप के पास। उनसे फिर मिलने की बात तय कर, मैने उनसे गले मिल कर विदा ली।
फिर मिलना होगा उनसे – 100 साल का इतिहास खोलने का वायदा जो किया है उन्होने! महराजगंज का अतीत किसी राजमहल में नहीं, दिलीप चौरसिया जैसे लोगों की यादों में सुरक्षित है।
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