पत्थर के ईंख पेरने वाले कोल्हू का समाजशास्त्र 


टुन्नू पंडित बताते जा रहे थे – “मिर्जापुर के आगे विंध्याचल की पहाड़ी से निकलता था पत्थर और वहीं बनते थे बड़े, आठ फुट के कोल्हू। इतनी बड़ी चीज जो वहां बनती थी, पूरे इलाके में – गोरखपुर देवरिया तक दिखती है। बीच में कहीं कोई पहाड़ नहीं जहां वे बन सकें।”  विंध्य की पहाड़ियोंContinue reading “पत्थर के ईंख पेरने वाले कोल्हू का समाजशास्त्र “

टुन्नू पंडित सुनाते हैं पुराने समय का हाल


कंकड़हिया सड़क – गंगा के कंकरों को जगह जगह गड्ढे भरता और धुरमुस से पीटता आदमी गांव से लालानगर तक जाता था। दिन भर के काम पर उसे चार आना मजूरी मिला करती थी। फागुन से पहले सड़क यूं रिपेयर होती थी और उसके बाद गुड़ का बैलगाड़ियों का काफिला निकला करता था तिलंगा से। Continue reading “टुन्नू पंडित सुनाते हैं पुराने समय का हाल”

गुड़ से लदी 100 बैलगाड़ी का काफिला


टुन्नू पण्डित – शैलेंद्र दुबे, मेरे साले साहब; इलाके का इतिहास खोलना शुरू किये हैं अब। सन 1940-50 में चलता था गोपीगंज के पास तिलंगा से गुड़ से लदा सौ बैलगाड़ियों का काफिला। कलकत्ता जाता था। साढ़े सात सौ किलोमीटर की यात्रा। रोड़ भी क्या रोड थी। गंगा के कंकर बिछाये जाते थे। एक आदमीContinue reading “गुड़ से लदी 100 बैलगाड़ी का काफिला”

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