गांवदेहात डायरी

करीब साल भर बाद लसमणा और बनवारीपुर की संधि से गुजर रहा था। दांई ओर एक भव्य मंदिर बनता दिखा तो मेरी साइकिल अपने आप रुक गई।
मंदिर के पास एक आदमी अपने तीन जर्मन शेफर्ड कुत्तों के साथ टहल रहे थे। बनियान और लुंगी में। तीनों कुत्ते बिना लीश के। मैंने सोचा, साइकिल धीरे से निकाल लेता हूँ।
पर उन सज्जन—बाद में नाम बताया कृष्ण दुबे—ने आवाज लगाई,
“आ जाओ चच्चा! मंदिर देख जाइये।”
वे पास आ कर मेरी साइकिल थाम मंदिर तक ले गये। साथ-साथ बताते भी गये—
“आप इनकी फिक्र न करें। कुछ नहीं करेंगे। पर कोई आदमी मुझ पर हाथ भी उठाये तो उस पर झपट पड़ेंगे।”
कृष्ण दुबे, उर्फ डब्बू, ने मंदिर का निर्माण दिखाया। गर्भगृह में राम-जानकी और हनुमान की स्थापना होगी। सामने पूर्व दिशा में शिवजी की पिंडी और नंदी होंगे। यानी वैष्णव और शैव—दोनों परम्पराओं का एक तरह से समन्वय।
मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा करने का रास्ता भी बनाया गया है। फिनिशिंग टच छोड़ दें तो मंदिर का ढाँचा लगभग तैयार है।
डब्बू ने बताया कि मंदिर बनवाने का विचार उनके पिताजी का है। चौरा माई के थान पर उनके मन में यह बात आई। फिर उससे पहले कि विचार उहापोह में पड़े, मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया गया।
“आपके पिताजी कितनी उम्र के होंगे?” मैंने पूछा।
डब्बू ने बताया—“चौरासी साल के हैं। घर पर ही हैं।”
चौरासी साल का आदमी, जो संकल्प लेकर मंदिर बनवा रहा हो और जिसकी सभी इन्द्रियाँ समर्थ हों—वह मेरे लिये इलाके की ओरल हिस्ट्री का बड़ा स्रोत हो सकता है। मेरे मन में उनसे मिलने की इच्छा जगी।
डब्बू मुझे अपने घर ले गये और अपने पिताजी रमाशंकर दुबे जी से मिलवाया।
घर बड़ा था। गांव के हिसाब से अच्छा-खासा अहाता। दालान में रमाशंकर जी बैठे थे। मैंने उनके चरण छुए। उनके छोटे चचेरे भाई धनंजय जी भी आ गये। उनकी उम्र 81 वर्ष है। उम्र के लिहाज से वे भी बड़े हैं। उनके भी मैंने पैर छुए।
बभनौट में पैर छूना आत्मीय बनने की दिशा में बड़ा कदम है—वह मैंने उठाया।
बातचीत ज्यादा नहीं हुई। मैंने उनसे इलाके का अतीत जानने की इच्छा जताई। यह भी बताया कि उस जानकारी के आधार पर लिखने का विचार है।
धनंजय जी को लेखन का विचार कुछ अटपटा लगा। शायद इस तरह जान-बूझ कर गांव के लोगों से इतिहास सुनने वाला जीव उनसे पहले नहीं टकराया होगा।
रमाशंकर जी ने शुरुआत की। बताया कि इसी गांव से बैलगाड़ी ही नहीं, कमाने के लिये लोग कलकत्ता भी पैदल गये थे। उन्होंने किन्हीं पारसनाथ तिवारी जी का नाम लिया। उनके साथ और लोग भी थे।
धनंजय जी ने पुराने गांव की दशा पर बात की—कुटुम्ब का एक साथ रहना, खेती-किसानी के तरीके, पुरवट से सिंचाई जैसी बातें।
समय काफी हो गया था। मैं वहाँ से यह कह कर चला आया कि फिर आऊँगा—और इस बार थोड़ी तैयारी के साथ। अपनी नोटबुक और रिकॉर्ड करने का साधन लेकर, जिससे उनकी बातों को बाद में लिखित आकार दे सकूँ।
मुझे नहीं लगता कि मेरा ध्येय उन्हें बहुत स्पष्ट लगा होगा। पर एक-दो और चक्कर लगाने पर सम्भव है दुबे बंधुओं के रूप में मुझे ओरल हिस्ट्री का एक जखीरा हाथ लगे—और उन्हें अभिव्यक्ति का एक रोचक जरिया।
आज मंदिर निर्माण पर ठिठकने के बहाने एक शुरुआत हुई है। देखें, यह मानसिक यात्रा आगे किस ओर जाती है।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
17 मार्च 2026
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