खाड़ी जंग से बदलता गांवदेहात

गांवदेहात डायरी

खाड़ी जंग से बदलता गांवदेहात
खाड़ी जंग से बदलता गांवदेहात

साइकिल लेकर निकलता हूं तो हर जगह कुछ बदलाव नजर आता है। विक्रमपुर की हाइवे से संधि पर दोनों ओर दो गुमटियां हैं—जग्गी की आलू टिक्की और राजेश की समोसा बेचने वाली। दस दिन से दोनों बंद हैं। दोनों गैस पर चलाते थे अपनी दुकान। अब मेरे लिये यह समाजशास्त्रीय अध्ययन होगा—देखना कि कब वे कोयले की भट्टी बनाने का उपक्रम करते हैं, या अपनी दुकान हमेशा के लिये बंद कर देंगे।

वह छोटा कद का आदमी, जो हर बार हंचबैक ऑफ नॉत्रेदाम की याद दिलाता है और बाजार के कोने पर छोटे से गैस सिलिंडर से चाय बनाता है—वह अभी दुकान खोले बैठा है। मैंने उससे पूछा—मिल रही है गैस?
वह कहता है—“रतियां के फलाने के हियां तोप क लई जाये पर भरि क देत बा।”
अर्थात, रात में चोरी-छुपे सिलिंडर ले जाओ तो भर दिया जाता है।

मुझे नहीं लगता कि ज्यादा दिन चल पायेगी उसकी यह चाय की चट्टी।

गैस के डोमेस्टिक सिलिंडर से छोटे सिलिंडर भरने वालों का धंधा लगभग खत्म हो गया है। एक ऐसा ही काम करने वाला बताता है—लोगों को मना कर दिया है, पर सवेरे से फोन आते रहते हैं—“गैस मिलेगी? क्या भाव चल रहा है?”
लोग गैस की फुटकर सप्लाई तलाश भी रहे हैं और विकल्प भी खोज रहे हैं।

सुग्गी के यहां एक भैंस है। अभी एक बच्चा भी जना है। वह खुझरी (नये दूध का पनीर) भी हमें दे गई। उसे खाड़ी संकट से कोई फर्क नहीं पड़ा। उसका चूल्हा लकड़ी और उपले पर चलता है—और उसपर खाड़ी की जंग का असर नहीं।
अगली खरीफ की फसल में जब धान लगायेगी और खाद देनी होगी, तब शायद सोचे।
पर तब तक किल्लत चलेगी? जंग खत्म नहीं हो जायेगी? यूरिया मिलेगा जरूरत मुताबिक?—ये सवाल अभी उसके दिमाग में नहीं हैं।

लगन का मौसम आने वाला है। केटरिंग की सर्विस देने वाला टेढ़ई जरूर परेशान है। गैस नहीं मिलेगी तो उसका बिजनेस चौपट हो सकता है।

गांव के रसूखदार, जो बहुत प्लानिंग नहीं करते, उनके यहां भी अब क्राइसिस आ गई है। चार दिन पहले जिलाजीत ने बताया—“चच्चा मंगवायेन ह सिलिंडर अढ़ाई हजार में।”
फिर जोड़ा—“चच्चा लकड़ी का बुरादा और धान की भूसी भी जमा कर रहे हैं।”
जमींदार को भी सोचना पड़ रहा है।

मेरे जैसा रीवर्स माइग्रेटेड गांव वाला अपने सिस्टम को बदलने या पुख्ता करने की सोच रहा है। हमारे यहां इंडक्शन चूल्हा पहले से था। एक सिलिंडर गैस 40 दिन चलती थी। पर इंडक्शन बिजली न आने पर बंद हो जाता था।

जब ऊर्जा की कमी होगी और सब लोग इंडक्शन पर कूदेंगे, तब गांव में बिजली की सप्लाई कितनी आयेगी? इंडक्शन को अगर सोलर पर चलाया जाये तो कितना वाट खर्च होगा?—ये सवाल मन में उठे और मैं एआई की शरण में गया।
कई घंटे चर्चा हुई। अपना बेस लोड बताया, विकल्पों पर बिजली का हिसाब लगवाया। अंत में तय किया कि एक 400 वाट का राइस कुकर लिया जाये और स्लो कुकिंग का अनुशासन बनाया जाये।

बिजली न भी आये, तब भी रसोई चल सके—इसके लिये ल्यूमिनस के 1 केवीए के पैनल और लगवाये। चिंटू जब छत पर पैनल लगा रहा था, तब मुझे वैसी ही फीलिंग हो रही थी जैसी मेरे बब्बा को 1947 की आजादी के समय हुई होगी—खुदमुख्तारी का अहसास।

आज सुबह बिजली नहीं थी, फिर भी खाली पेट पीने के लिये गुनगुना पानी राइस कुकर में बना। चाय 1200 वाट की सेटिंग पर इंडक्शन से बनी। गैस चूल्हा उपेक्षित पड़ा रहा। मेम साहब ने दिन भर की किचन-प्लानिंग कर ली है बिना गैस चूल्हे के।

फिलहाल तो लग रहा है कि खाड़ी की जंग की आंच से मैं मुक्त हो गया।
धीरे-धीरे गांवदेहात भी अपना-अपना तरीका निकाल लेगा इस आंच से मुक्त होने का।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
24 मार्च 2026

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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