पद्मजा के नये प्रयोग

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!


पद्मजा का स्कूल बंद है और खुलने की सम्भावना इस स्कूल सत्र में तो है ही नहीं। उसे घर में पढ़ाने का उपक्रम किया जा रहा है। उस विषय में मैंने पिछली एक पोस्ट में लिखा था।

उसके पास समय बहुत है। समय भी है और ऊर्जा भी अपार है। स्कूल के मित्र नहीं हैं। आसपास दलित-पासवान-बिंद बस्तियां हैं। उनके बच्चे कभी कभी घर में आ कर खेलते हैं। पद्मजा की साइकिल और घर में लगा झूला उनके लिये बड़ा आकर्षण है। यदा कदा पद्मजा को उन्हें टॉफियां देने को भी कहा जाता है।

उनके साथ पद्मजा खेलती है, पर वे स्कूल के मित्रों जैसे अंतरंग नहीं हो पाये हैं। उनके साथ थोड़ी सजगता रखनी पड़ती है। कुछ बच्चे छोटे हैं, पर उनकी भाषा में अपशब्द बहुत सहज भाव से हैं – वे उनका अर्थ नहीं जानते पर सीखे उन्होने अपने परिवेश से हैं। पद्मजा को अंततोगत्वा उनका भी परिचय पाना है; पर शायद यह वह उम्र नहीं है।

पौधा उगाने का प्रयोग करने को तैयार पद्मजा

मैजिक क्रेट में पौधा उगाने का एक एपरेटस आया है। कल पद्मजा ने उसे सेट किया। ऊपर के बर्तन में क्रेट में दी गयी मिट्टी की टिकिया रखी गयी है। नीचे के बर्तन में पानी है। पानी कैपिलरी-एक्शन से एक रस्सी के सहारे मिट्टी को गीला रखेगा। मिट्टी में सरसों के बीज डाले गये हैं। उपकरण को ऐसी जगह पर रख दिया गया है जहां दिन भर पर्याप्त सूरज की रोशनी मिले।

आज उस एपरेटस का निरीक्षण किया। नीचे के बर्तन में पानी कम हो गया है। ऊपर के बर्तन में मिट्टी और गीली हो गयी है और फूल भी गयी है। पानी रस्सी से केपिलरी-एक्शन से ऊपर के बर्तन में पंहुचा है; यह स्पष्ट हुआ है पद्मजा को। एक बर्तन में तो पूरा पानी केपिलरी एक्शन से मिट्टी में चला गया। दूसरी में, जिसमें शुरुआत में मिट्टी ज्यादा गीली थी, आधा पानी ऊपर पंहुचा।

बर्तन में केपिलरी-एक्शन का प्रयोग

पद्मजा को यह भी बताया गया कि रस्सी की तरह पौधों की जड़ें भी पानी को पौधे में ऊपर की ओर ले जाती हैं।

पद्मजा की विज्ञान की किताब में सूरज की छाया के बारे में लिखा है। सवेरे और शाम को छाया बड़ी और अलग अलग दिशा में होती है। दिन में छाया छोटी होती है। यह समझाने के लिये एक धूप घड़ी बनाने का प्रयोग किया। पद्मजा को छोटी-बड़ी छाया और उससे दिन का समय जोड़ने का कॉन्सेप्ट समझ आया। यह सब उसे कमरे में चित्र बना कर भी बताया जा सकता था। उसमें समय कम लगता पर शायद वह उसके दिमाग में ज्यादा देर नहीं टिकता। अब, धूप-घड़ी शायद वह बड़ी होने पर भी याद रखे!

धूप घड़ी का प्रयोग

धूप घड़ी वाले स्थान पर उसे एक बड़ा गोजर (शप्त-पद, सेण्टीपीड) भी दिखा। उस सेण्टीपीड के माध्यम से मैंने कीडो‌ं का भी ज्ञान देने का प्रयास किया।

कुछ भी नया बताने पर बहुत से सप्लीमेण्ट्री प्रश्नों के लिये तैयार रहना होता है। और कई बार प्रश्न नितांत अलग विषय के होते हैं। बहुधा मैं कोई किताब पढ़ रहा होता हूं या आराम कर रहा होता हूं, तब भी वह चली आती है अपनी जिज्ञासा का पिटारा ले कर।

उसकी नयी साइकिल आयी है। जन्म-दिन की भेंट यद्यपि जन्मदिन के रोज नहीं, कुछ सप्ताह बाद आयी। उस साइकिल को ले कर भी भांति भांति की कल्पनायें हो रही हैं। साइकिल का नाम उसने रखा है – पंख। पक्षी पंख से उड़ते हैं, पद्मजा साइकिल से उड़ना सीख रही है। इसी साइकिल से वह भारत घूमना चाहती है।

अपने “पंख” पर सवारी करती पद्मजा

आज बता रही थी कि वह जब साइकिल से मदुराई (मदुरै – तामिलनाडु) जायेगी तो वहां लड़कियों द्वारा बनाया जाने वाला कोलम देखेगी। उसे कोलम (स्त्रियों द्वारा बनाया जाने वाला अल्पना या रंगोली) के बारे में किसने बताया? शायद टेलीविजन ने। पर मुझे खुद भी यह नहीं मालुम था कि मदुरै की लड़कियां कोलम बनाती हैं। 😆

तमिळ महिलाओं द्वारा बनाया कोलम (चित्र सोर्स – https://bit.ly/3fnX2Sb )

गांव में बहुत बड़ा परिसर है पद्मजा के लिये। घर, पेड़, फूलों के पौधे, सब्जियां, परिसर में ही खेत और तरह तरह के जीव और पक्षी। बहुत कुछ है सीखने के लिये। और जो नहीं है वह ऑनलाइन तथा इण्टरनेट पर उपलब्ध वीडियो, पुस्तकों और कुरियर द्वारा आने वाले पैकजों के माध्यम से मिल रहा है। कुल मिला कर उसे एक शहरी बच्चे से कम संतृप्त सीखने को नहीं मिल रहा होगा।

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!


बाढ़ू का नाम कैसे पड़ा?

बाढ़ू ने बताया कि सन 1948 की बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।


बाढ़ू मेरे मित्र हैं। सन अढ़तालीस की पैदाइश। उस हिसाब से मुझसे सात साल बड़े हुये।

मेरे घर दही ले कर आते थे, तभी से उनसे मित्रता हुई। घर में दही की जरूरत न भी होती थी, तो मैं उनसे आधा किलो या एक पाव जरूर खरीदता था। उसके साथ उनकी बातें सुनने को मिलती थीं। बीच में वे मुझे दूध भी बेचने लगे थे। पर वह सिलसिला चला नहीं।

बाढ़ू यादव।

आजकल बाढ़ू ने अपनी पाही पर भन्टा लगाया है। कुछ दिन पहले उनसे तीस रुपये का बैंगन लिया था बाटी-चोखा के भुर्ता के लिये। उस समय मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे तो आज साइकिल भ्रमण के दौरान उन्हे देने के लिये उनकी पाही पर रुका। सवेरे का समय। बाढ़ू मड़ई के बाहर रखी चौकी पर नहीं थे। पास के अपने सब्जी के खेत में थे। वहां से निकल कर सडक के किनारे मुझसे मिलने और बातचीत करने आये।

प्रगल्भ हैं बाढ़ू। बताने लग गये कि सन अढ़तालीस की बाढ़ के समय उनकी पैदाइश हुई। उस साल बाढ़ आयी थी। वैसी बाढ़ फिर कभी नहीं आयी। उस बाढ़ में उनका द्वारिकापुर का घर गिर गया था और उनका जन्म अपने घर की बजाय ठाकुर साहब के ओसारे में हुआ।

बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।

“जब मेरा जन्म हुआ था तो गांव में बहुत एका था। बहुत भाईचारा। माई बताती हैं कि उस समय हर घर से दो-चार रोटी बन कर माई के सऊरी में होने के कारण आती थीं। कुल मिला कर तीन चार बित्ता रोटियाँ हो जाती थीं। हर घर वाला बाढ़ की विपदा के बावजूद सहायता को तत्पर रहता था।”

“ये मास्टर (मेरे बड़े साले साहब – पण्डित डा. देवेंद्रनाथ दुबे, जो स्कूल मास्टर नहीं, प्रोफेसर थे) , मेरे साथ यहीं तुलसीपुर के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। आधी छुट्टी में अपने घर ले जाते थे। वहां खिचड़ी खाने को मिलती थी। खा पी कर फिर आते थे हम लोग स्कूल। घिऊ मजे क होत रहा खिचड़ी में (घी खूब होता था खिचड़ी में)।”

बाढ़ू अपने बचपन और अतीत के वर्णन में चले गये थे। मुझे घर लौटने की जल्दी थी। मैं उन्हे वापस लाया। चलते चलते उनका हाल पूछा। बताया कि “गोड़वा क चोट त ठीक होइ ग बा, पर घेटुना अब पकड़ई लाग बा। बुढ़ाई क असर बा (पैर की चोट तो अब ठीक हो गयी है पर घुटना अब जकड़ने लगा है। उम्र का असर हो रहा है)।”

मैंने कहा कि फुर्सत से उनके साथ बैठूंगा और उनकी जीवन गाथा सुनूंगा। सात साल बड़े होने के बावजूद बाढ़ू मुझसे ज्यादा स्वस्थ हैं और उनकी याददाश्त और बोलने की शक्ति में कोई कमी नहीं है। पिछले छ-सात दशकों में गांवदेहात कैसा बदला है और उसपर एक ग्रामीण क्या राय रखता है, वह बताने के लिये बाढ़ू एक उपयुक्त व्यक्ति हैं।

आप अपेक्षा कर सकते हैं कि बाढ़ू से बाद में मैं मिलता और गांवदेहात को गहनता से जानने – लिखने के लिये इनपुट्स लेता रहूंगा।


सतर्क रेल कर्मी, बसंत चाभीवाला

आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!


बसंत को मैंने कटका रेलवे स्टेशन के पास अपनी पोस्ट-रिटायरमेण्ट रिहायश बनाने के बाद सन 2016 के प्रारम्भ में पहली बार देखा था। सवेरे सवेरे वह कोहरे के मौसम में मफलर पहने चला जा रहा था अपने काम पर। इधर उधर ताकता-झांकता और ढीली पैण्डरोल क्लिप्स को अपने हथौड़े से कसता वह बढ़ रहा था। बहुत ही फोटोजीनिक दृष्य था वह। मैंने साइकिल खड़ी कर उसके कई चित्र, कई कोणों से लिये थे। उसका चित्र इतना पसंद आया था कि कई साल तक बसंत मेरे फेसबुक के कवर पर बना रहा। उसके मफलर पहने चित्र को देख कर बहुत सी टिप्पणियों में उसे अरविंद केजरीवाल कहा गया। यद्यपि बाद में लिये उसके चित्रों में वह मुझे नाना पाटेकर जैसा लगा! 😆

उस समय को बीते साढ़े चार साल हो गये। बीच में कई बार अपनी बीट में काम करता दिखा बसंत। हर बार मैंने एक दो चित्र लिये उसके। कालांतर में वह दिखना बंद हो गया। मैंने सोचा कि शायद कहीं तबादला हो गया हो उसका। पर हाल ही में वह पुन: दिखा। तेईस नम्बर रेल फाटक की गुमटी पर खड़ा था। बताया कि गेटमैन टॉयलेट में है। बाहर निकले तो उसके हस्ताक्षर अपनी डायरी में ले कर आगे बढ़े।

उसकी बीट कटका स्टेशन के पूरब में एक किलोमीटर पहले से प्रारम्भ हो कर पश्चिम में माधोसिंघ की ओर चार किलोमीटर जाती है। आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!

बसंत गेटमैन के इंतजार में रुका था और मैं बसंत से बात करने के लिये। उससे पूछने पर पता चला कि वह यहीं रहता रहा है सालों से। मुझे बीच में नहीं दिखा तो वह मात्र संयोग था। अकेला रहता है कटका स्टेशन पर बने क्वाटर में। रहने वाला रांची का है। मैने बात करने के लिहाज से उसे बताया कि मेरी बिटिया वहीं बोकारो में रहती है। उसने कहा – “बहुत अच्छा है झारखण्ड! यह तो यहां के लोग हैं जो जानते नहीं वहां के बारे में। कहते हैं कि पिछड़ा इलाका है, जंगल है। कभी इन लोगों ने देखा नहीं है।”

दो दिन बाद सवेरे छ बजे यूंही मुझे लगा कि साइकिल सैर के दौरान बसंत से मिला जाये। यह सोचा कि अपनी ड्यूटी पर वह निकलने वाला होगा। या शायद निकल गया हो। मैंने साइकिल कटका स्टेशन पर खड़ी की। स्टेशन मास्टर साहब से पूछा तो उन्होने बताया कि अभी वह स्टेशन पर तो नहीं आया। स्टेशन का सफाईवाला साथ में मुझे उसका घर दिखाने ले गया।

बसंत की कॉलोनी का रास्ता। एक बार लगा कि लौट चला जाये। कुछ उपेक्षित सा है यह इलाका।

क्वाटर पर लखंदर (सफाईवाला) ने आवाज लगाई पर बसंत का कोई उत्तर नहीं मिला। उसने अंदर जा कर बसंत को जगाया। बसंत का रेस्ट था और वह सो रहा था। थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया। उसे यह अंदाज नहीं था कि कोई पुराना विभागाध्यक्ष उसे ढ़ूंढता उसके क्वार्टर पर आयेगा।

बसंत -थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया।

जब आप किसी के बारे में लिखना चाहते हैं तो अपने रुतबे या ईगो को दरकिनार कर चलते हैं। मैं वही कर रहा था। वैसे भी रिटायरमेण्ट के बाद कर्मचारी और अधिकारी पासंग में होते हैं। कोई आपको इज्जत दे या लिहाज करे तो यह आपका सौभाग्य। अन्यथा, एक ब्लॉगर को उसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये।

मैंने बसंत का मोबाइल नम्बर लिया। उसपर घण्टी दी तो पता चला कि उसकी बैटरी डिस्चार्ज्ड है। एक की-मैन के लिये मोबाइल की अहमियत ऑफ ड्यूटी और रेस्ट पर होने के दौरान कुछ खास नहीं होती।

अगले दिन सवेरे उसके पेट्रोल ड्यूटी पर निकलते समय मैं कटका स्टेशन पर ही उससे मिला। वह वर्दी पहने अपने उपकरणों से लैस था। मैंने पूछा कि पटरियों की दशा कैसी है?

“ठीक ही है। पण्डराल (पैण्डरोल क्लिप – pandrol clips) कसने पड़ते हैं। वैसे पिछले दो तीन साल में दो बार मैंने टूटी पटरी देख गाड़ी रुकवाई है।” – बसंत ने जवाब दिया। उसने बताया कि वह म्यूचुअल ट्रांसफर की कोशिश कर रहा है रांची जाने के लिये। मुझसे अनुरोध किया कि मैं एडीईएन साहब को कह दूं कि उसका अप्रूवल दे दें। मैंने उसे अपने केस के कागज की प्रति ले कर घर पर अगले दिन मिलने को कहा। पर वह आया नहीं। शायद झिझक के कारण या शायद यह समझ कर कि कुछ करा पाना मेरे प्रभाव क्षेत्र में नहीं होगा। रिटायर्ड आदमी इस तरह के बहुत से “शायद” की कल्पना कर लेता है और उन्हे बुनता रहता है! 😆

वह रेल की पटरियां देखता आगे बढ़ने लगा। एक जगह तीन चार चाभियां कसीं। एक पैण्डरोल क्लिप छिटक कर गिरी हुई थी, उसे लगा कर हथौड़े से ठोंका। वहीं से मुझे बोला – यहां जर्क लगता है। पण्डराल बहुत ढीले होते हैं यहां।

एक कुशल चाभी वाला अपने ट्रेक के चप्पे चप्पे से परिचित होता है। कहां पैकिंग लूज है, कहां गिट्टी में मिट्टी ज्यादा है। कहां रेल में नुक्स है – विजुअल परीक्षण से उसे बहुत कुछ पता रहता है। बसंत वैसा ही रेल कर्मी लगा।

वह अपने पेट्रोलिंग में काम करता आगे बढ़ता गया। मैंने अपनी साइकिल संभाली गंगा किनारे जाने के लिये। यह सोचा था कि अगले दिन वह मुझसे मिलेगा तो उसके यहां अकेले रहने और झारखण्ड में उसके परिवार के बारे में पता करूंगा। पर वह आया नहीं। वैसे भी आगामी महीनों में उसका म्यूचुअल ट्रांसफर अगर हो गया तो वह चला ही जायेगा अपने देस।

इस सर्दी के मौसम में मैं रेलवे के कर्मियों से मिल कर उनके बारे में जानना/लिखना चाहता हूं। इससे मेरी पुरानी यादें भी उभर कर आयेंगी और रेल का सम्पर्क जो पिछले तीन साल से जो लगभग शून्य है; रिवाइव हो सकेगा। पर देखता हूं कि वह सब करने के लिये अपने अतीत के रुतबे के बहुत से मानसिक अवरोध साफ करने होंगे। किसी सामान्य ग्रामीण से मिलना, बोलना बतियाना और उसकी झोंपड़ी में उसकी खाट पर बैठना सरल है; रेल के किसी अमले से वैसी आत्मीयता सहज स्थापित करना कठिन है। बसंत के मामले में, बहुत प्रयास के बावजूद मैं आधा अधूरा ही सफल हो पाया।

पर यह सफलता भी बुरी नहीं! कोशिश करते रहो, जीडी!


श्री वी.के. पंजियार, मरेप्र, वाराणसी रेल मण्डल

लम्बे अर्से तक रेल से दूर रहा। पिछले तीन साल से मैंने कोई पास नहीं लिया, कोई रेल यात्रा नहीं की। पर पिछले सप्ताह वाराणसी के मण्डल रेल प्रबंधक श्री वी.के. पंजियार जी से मुलाकात हुई। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे अगले छ महीने के दौरान (जब मौसम बाहर निकलने, मिलने जुलने के लिये मुफीद रहता है) मुझे 20-25 रेल कर्मियों से मिलने और उनपर ब्लॉग पोस्टें लिखने के लिये सामग्री एकत्र करने की सहायता करें। डीआरएम साहब ने उपयुक्त सहायता का आश्वासन दिया। आज एडीआरएम प्रवीण कुमार जी से भी सम्पर्क हुआ। अब लगता है रेल-कर्मियों पर नियमित ब्लॉग लिखना हो सकेगा। … रेल का सम्पर्क फिर जुड़ेगा। एक अलग प्रकार से!



राजेश की गुमटी और गांव के सामाजिक-आर्थिक बदलाव

राजेश में विनम्रता भी है। वह अदब से बात करता है। वह सफल हो सकता है। और मैं चाहता हूं कि वह सफल बने। वह गांव (सवर्णों) के जुआरी-गंजेड़ी और निकम्मे नौजवानों की भीड़ से अलग अपनी जमीन और पहचान बनाये। यह आसान नहीं है। पर यह सम्भव है।


मेरे गांव के लिये जो सड़क नेशनल हाईवे 19 की सर्विस रोड से निकलती है; उसके मुहाने पर दो गुमटियाँ लग गयी हैं। उनमें से एक गुमटी किलनी की है। दूसरी राजेश की। राजेश के बारे में बताया गया कि वह बम्बई रिटर्न्ड है। वहां मिठाई की दुकान पर कुशल कारीगर था। यहां कोरोना संक्रमण के पहले ही आ गया था; इसलिये उसके बम्बई से रीवर्स पलायन की वजह कुछ और होगी।

राजेश, अपनी गुमटी में समोसे बनाता हुआ

उस रोज राजेश अपनी गुमटी में जलेबियां निकाल चुका था। समोसे का मसाला बनाने के बाद उसे मैदे के कोन में भर कर तलने ही जा रहा था कि मैं वहां से गुजरा। मैंने पूछा -कितने में मिलेंगे कच्चे समोसे?

राजेश ने बताया कि तैयार समोसे छ रुपये जोड़ा बिकते हैं। कच्चे वह पांच रुपये जोड़ा दे देगा। मैंने एक दर्जन खरीदे।

राजेश ब्राह्मण है। राजेश दुबे।

इस गांव में ब्राह्मण विपन्नता में हैं। पर वे अपनी जातिगत ऐंंठ के कारण गुमटी लगाने, समोसा चाय बेचने जैसे काम में नहीं लगे हैं। महिलायें दरिद्रता में जीवन निभा रही हैं पर घर के बाहर और खेतों पर काम करने नहीं निकल रहीं। कथित नीची जाति की महिलायें और पुरुष, जो भी काम मिल रहा है, कर रहे हैं। उनके पास जमीनें नहीं हैं, फिर भी वे अपेक्षाकृत ठीक आर्थिक दशा में हैं।

मैं राजेश को इस बात के लिये अच्छा समझता हूं कि उसने इस छद्म सवर्ण बैरियर को तोड़ कर चाय-समोसे की दुकान तो खोली है।

उसकी गुमटी वाली दुकान के सामने मैंने अपनी साइकिल रोक कर कुछ न कुछ लेना प्रारम्भ किया है। कभी कच्चे समोसे, कभी जलेबी और कभी (अपनी पसंद से बनवाये) कम चीनी वाले पेड़े। अभी तीन किलो बूंदी के लड्डू भी खरीदे। मेरी पत्नीजी भी स्वीकार करती हैं कि राजेश के काम में हुनर है। उसके पास पूंजी होती और मौके पर दुकान तो अच्छी चल सकती थी। पर गांव में हाईवे से सटी गुमटी भी एक सही जगह बन सकती है भविष्य में। अगले पांच साल में, अगर विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध नहीं हुई तो यह गांव एक क्वासी-अर्बन सेटिंग हो जायेगा। तब राजेश की यह गुमटी एक ठीकठाक मिठाई की दुकान या रेस्तरॉ का रूप ले सकती है। अगले पांच साल का अवलोकन करना रोचक होगा…

राजेश नियमित नहीं था अपनी गुमटी खोलने में। एक दिन पूछा कि गुमटी रोज क्यों नहीं खुलती? बताया कि बच्चे को फोड़ा हो गया था, उसके साथ बुखार। सो डाक्टर के पास ले जाने के कारण दुकान बंद रही।

राजेश की बिक्री कम होने का एक कारण यह भी है कि यदा कदा उसकी गुमटी बंद रहती है। दुकान नियमित न होने से ग्राहक छिटक जाते हैं।

मैं जानता हूं कि उसका बताया यह कारण न सही है और न पर्याप्त। पर उसको “मोटीवेट” करने के लिये उसकी दुकान पर रुकने और उससे सामान लेने का जो उपक्रम मैंने किया है – उसके बाद देख रहा हूं कि दुकान नियमित खुल रही है।

उसका बेटा, आदर्श भी साथ में बैठता है दुकान पर। छठवीं क्लास में पढ़ता है। आजकल स्कूल नहीं चल रहे। वह सामान तोलता है और गल्ले से पैसे का लेन देन भी जानता है। मेरे घर सामान देने भी वही आया था। मॉपेड चला लेता है।

राजेश की गुमटी। गल्ले पर बैठा उसका लड़का आदर्श। राजेश समोसे के लिये मैदा गूंथ रहा है।

दो पीढी में बहुत बदला है गांव। राजेश के बाबा या उसके पहले के लोग (छोटी जमीन की होल्डिंग के ही सही) किसान होते रहे होंगे। उसके बाद लोग महानगरों को पलायन किये। अधिकांश ड्राइवर बने – उनके पास पूरे देश में घूमने और ट्रक चलाने की कथायें हैं। ड्राइवर बनने के साथ उन्होने देश तो देखा, पर ट्रक चालक के दुर्गुण भी गांव-समाज में वे लाये। राजेश मुम्बई में मिठाई की दुकान पर रहा तो उसके पास एक वैकल्पिक काम का हुनर है। बिजनेस करने का शऊर भी है। महानगरों के कुछ ऐब भी हैं। उसके कारण जो कमाया वह गंवा चुका है। पर अब एक नयी शुरुआत की सम्भावना बन रही है। अगर वह मेहनत से काम करे, तो अगले दशक में बदलती गांव की तस्वीर का एक प्रमुख पात्र बन सकता है।

राजेश में विनम्रता भी है। वह अदब से बात करता है। वह सफल हो सकता है। और मैं चाहता हूं कि वह सफल बने। वह गांव (सवर्णों) के जुआरी-गंजेड़ी और निकम्मे नौजवानों की भीड़ से अलग अपनी जमीन और पहचान बनाये। यह आसान नहीं है। पर यह सम्भव है। सवर्णता की वर्जनाओं का सलीब ढोते इन नौजवानों के पास कुछ खोने को नहीं है; सिवाय अपनी दकियानूसी वर्जनाओं के। उन्हें अपने खोल से निकल कर, छोटे पैमाने से ही सही, एक नयी पहल करनी चाहिये।

मेरे लिये राजेश उस आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन का सिपाही है। देखना है कि वह अपनी और अपने परिवेश की गलत आदतों और वर्जनाओं में फंस कर रह जाता है या परिवर्तन के नये आयाम तलाशता-बनाता है। एक पहल तो उसने की है।

उसकी सफलता की कामना करता हूं मैं।


स्कूल बंद हैं तो घर में ही खोला एक बच्चे के लिये स्कूल

सात साल की पद्मजा का अध्यापक बनना मुझे कठिन काम लगा। बहुत ही कठिन। एक बच्चे की मेधा और उसकी सीखने के स्तर पर उतर कर सोचना आसान काम नहीं है। केल्कुलस पढ़ाना साधारण जोड़, घटाना पढ़ाने की अपेक्षा आसान है।


सात महीने हो गये। स्कूल बंद हैं। पहली से दूसरी में बिना परीक्षा लिये पंहुच गयी है पद्मजा (मेरी पोती)। कुछ समय ह्वाट्सएप्प पर स्कूल वालों ने होमवर्क देने और नोटबुक पर किये कार्य के उसी चैट में भेजे चित्र को जांचने का यत्न किया। पर वह सब ठीक से चल नहीं पाया। गांव में माता पिता बच्चों को पढ़ाने के लिये स्कूल का पर्याय नहीं बन पाये। उनके पास समय और काबलियत दोनो की कमी रही। अत: स्कूल बंद ही माने जा सकते हैं – उचित टेक्नॉलॉजी और संसाधनों के अभाव में।

पद्मजा के स्कूल की तुलना में सरकारी स्कूल तो और भी दयनीय दशा में हैं। गांव के सरकारी स्कूलों के बच्चे, तो छुट्टा घूम ही रहे हैं। आपस में आसपड़ोस के बच्चों में हेलमेल तो हो ही रहा है। वे अभी भी कोई कोरोना अनुशासन का पालन नहीं कर रहे और स्कूल अगर खुले तो भी स्थिति वैसी ही रहेगी।

मेरी पत्नीजी और मेरी पोती पद्मजा। लगता है किसी चिड़िया या किसी गिलहरी/गिरगिट का अवलोकन हो रहा है।

मैंने पद्मजा के स्कूल के मालिक कैलाश जी से बात की। उन्होने बताया कि इस महीने के अंत तक वे पीटीए मीटिंग बुला कर अभिभावकों से सलाह करने के बाद ही स्कूल खोलने के बारे में कुछ तय कर पायेंगे। वे अपनी ओर से तो पूरा प्रबंधन कर सकते हैं। सेनीटाइजर, मास्क, हैण्डवाश आदि की सुविधा उपलब्ध करा सकते हैं। पर बच्चे तो बच्चे ही हैं। आपस में मिलेंगे ही। एक दूसरे का पानी पी जाते हैं। एक दूसरे का भोजन भी शेयर करते हैं। वह सब कैसे देखा जा सकता है?

महीने भर में; बड़ी कक्षाओं के स्कूल खुलने और अन्य गतिविधियों पर पंद्रह अक्तूबर से ढील दिये जाने के कारण संक्रमण कैसा चलता है और अभिभावक कितना आश्वस्त महसूस करते हैं; उसी आधार पर छोटे बच्चों का स्कूल खोलने का निर्णय हो पायेगा।

मुझे यह पक्के तौर पर लग रहा है की पद्मजा का इस स्कूल सत्र का मामला खटाई में पड़ गया है। अत: मैंने तय किया कि इस साल की सभी विषयों की पूरी पढ़ाई घर पर ही कराई जाये। अभी साल/सत्र के छ महीने बचे हैं। उसको इस साल का पूरा सेलेबस घर पर पढ़ाया-पूरा किया जा सकता है।

इस निर्णय के साथ मैं, एक रिटायर्ड व्यक्ति से एक बच्चे का पूर्णकालिक अध्यापक बन गया। जब मैं, चार दशक पहले, बिट्स, पिलानी में छात्र था, तो मुझे विभागाध्यक्ष महोदय ने मेरी अभिरुचि और योग्यता को ध्यान में रखते हुये मुझे लेक्चररशिप का ऑफर दिया था। तब दिमाग भी उर्वर था और कुछ ही समय में मैं परा-स्नातक और और पीएचडी कर लेता। पर उस समय पारिवारिक दबाव और खुद की चाहत से लगा कि सरकारी अफसरी कहीं बेहतर रहेगी। अगर मैं अपने विभागाध्यक्ष जी का ऑफर स्वीकार कर लेता तो मेरी व्यवसायिक दिशा कुछ और ही होती।

अब परिस्थितियाँ मुझे पहली/दूसरी कक्षा का अध्यापक बना रही हैं। 😆

सात साल की पद्मजा का अध्यापक बनना मुझे कठिन काम लगा। बहुत ही कठिन। एक बच्चे की मेधा और उसकी सीखने के स्तर पर उतर कर सोचना आसान काम नहीं है। केल्कुलस पढ़ाना साधारण जोड़, घटाना पढ़ाने की अपेक्षा आसान है। अपनी पत्नीजी को मैंने अपनी आशंकायें बतायीं, पर मेरी सुनी नहीं गयी। मैं “द कर्स ऑफ नॉलेज” से अभिशप्त था। मुझे पद्मजा के स्तर पर उतर कर सोचने और समझाने की क्षमता विकसित करनी थी।

डिज्नी-बायजू पैकेज

बाजयू की अर्ली लर्न पेकेज वाली कक्षा में पद्मजा

यह मेरा सौभाग्य था कि कुछ महीने पहले डिज्नी-बायजू का अर्ली लर्नर्स का पैकेज पद्मजा के लिये ले लिया था। अभी वह बायजू के टैब से, अपने हिसाब से जो मन आ रहा था, वह कर रही थी। बायजू का यह पैकेज लेने के बाद मुझे लग रहा था कि यह भारतीय (और मेरे संदर्भ में गंवई) परिवेश के लिये फिट नहीं बैठता था। इस कारण से मैंने उसके प्रयोग पर बहुत ध्यान नहीं दिया था।

पर अब मैंने पाया कि भाषा कीं समस्या के बावजूद पद्मजा मेरी अपेक्षा उन डिज्नी चरित्रों से बेहतर तालमेल से पढ़ाये गये विषय समझ रही थी। उसके वीडियो और गेम्स में आने वाले चरित्र – डीटी, जेन और जेक्सन उसे कहीं आसानी से गणित और अंग्रेजी सिखा रहे थे। मैंने उसी पैकेज से अपना टीचिंग प्रारम्भ करने की सोची।

बायजू की फेसिलिटेटर महोदया से बातचीत कर यह तय किया कि पद्मजा का अब तक का पढ़ा प्लान व्यवस्थित तरीके से एक बार पुन: रिवाइज कर लिया जाये और जो कुछ उसने नहीं पढ़ा; उसे पूरा कराया जाये। लगभग एक महीने में मैंने छ महीने के लर्निंग प्लान का बैकलॉग निपटा कर व्यवस्थित कर लिया। इस प्रक्रिया में पद्मजा को कुल चौबीस बैजेज में से बीस प्राप्त हो गये। उसकी विभिन्न स्किल्स में भी अति उत्तम (Excellent) कोटि प्राप्त हो गयी, जो पहले सामान्य स्तर की थी।

महीने भर बाद बायजू की पद्मजा के लिये नियत अधीक्षिका स्वाति प्रिया जी से चर्चा हुई तो उन्होने न केवल पद्मजा की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया वरन यह भी कहा कि प्रगति अभूतपूर्व है।

डिज्नी/बायजू का यह टैबलेट सहित आने वाला अर्ली लर्निंग पैकेज अच्छा है; पर फिर भी मैं यह कहना चाहूंगा कि यह इण्डिया के लिये है, भारत के लिये नहीं। आवश्यकता है कि यह हिंदी या हिंगलिश में डब किया जाये और उसमें भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ भी लिये जायें। और मुझे यह यकीन है कि बायजू की टीम में पर्याप्त इनहाउस टैलेण्ट होगी।

इस पढ़ाने की प्रक्रिया में बायजू/डिज्नी पैकेज के अलावा मैंने भी अपने इनपुट्स दिये। पद्मजा को यह अहसास कराया कि क्लास में किस प्रकार से अपनी बात को समझाया, बताया जाता है। किस प्रकार से अपने परिवेश को देखा जाता है। किस शब्द का कैसे उच्चारण किया जाता है। कैसे दुनिया को समझा जाता है। मैंने उसके लिये एक ग्लोब मंगाया और उसे विश्व के अनेक स्थानों और भूत काल में की गयी प्रमुख यात्राओं के बारे में भी जानकारी दी। पद्मजा को अब कोलम्बस, वास्कोडिगामा और झेंग हे (Zheng He) जैसे नाविकों के बारे में पता है। यह भी ज्ञात है कि उन्होने कहां से कहां तक यात्रायें की थीं।

मैंने उसे विज्ञान और हिंदी पढ़ाने की रूपरेखा भी बनाई।  

ज्वाइण्ट डायरी

मैंने एक ज्वाइण्ट डायरी बनाई, जिसमें मैंने अपने विचार लिखे और उसमें पद्मजा को भी लिखने, या चित्र बना कर बताने को कहा। मैंने लिखा कि किस तरह पद्मजा ने एक अच्छे सम्प्रेषक की तरह अपना प्रेजेण्टेशन दिया था। वह रात में सभी लाइट बुझा कर बोर्ड पर टॉर्च से फोकस कर एक डॉक्यूमेण्ट्री फिल्म की तरह समझा रही थी। सात साल की बच्ची के लिये यह कर पाना अभूतपूर्व था! कुल मिला कर “द कर्स ऑफ नॉलेज” से मैंने पार पाने की विधा तलाश ली थी और पद्मजा जो शुरुआत में मुझसे डरी सहमी रहती थी, अब मित्र बन चुकी थी। ज्वाइण्ट डायरी में उसने लिखा तो बहुत नहीं, पर उससे उसके व्यक्तित्व में परिवर्तन बहुत हुआ।

पद्मजा अपने ह्वाइट बोर्ड पर तरह तरह के कार्टून बनाती और मुझे उनपर व्याख्यान देती है!

घर का बना स्कूल

मैंने पद्मजा की स्टडी टेबल को नाम दिया बीडीबी (बाबा-दादी-बबिता) स्कूल। यह नाम उसके स्कूल – बीएलबी पब्लिक स्कूल की तर्ज पर रखा गया। अपने कमरे के बाहर यह नाम एक पन्ने पर प्रिण्ट कर बायजू के स्टिकर के साथ लगा दिया। स्कूल का समय भी नियत कर दिया। सवेरे साढ़े नौ बजे और दोपहर साढ़े तीन बजे।

प्रति दिन तीन से चार घंटे के बीच अध्ययन अध्यापन का कार्यक्रम रहता है। अभी तो पुराना बैकलॉग होने के कारण सप्ताह में सातों दिन चला स्कूल पर अब सप्ताह में एक दिन छुट्टी रहने का तय किया है हमने।

घर में मेरे बेडरूम में चलता पद्मजा का स्कूल

पद्मजा समय पर उठने लगी; समय पर क्लास के लिये उपस्थित होने लगी। अपने टैबलेट को विधिवत चार्ज करने लगी। किताबें और एक्सरसाइज बुक्स सम्भाल कर रखने लगी।

पिछले डेढ़ महीनों में घर में बहुत परिवर्तन हुये हैं। मेरा और मेरी पोती के समीकरण में व्यापक परिवर्तन हुआ है। पद्मजा में जो बदलाव है, वह तो अपनी जगह; मुझमें भी परिवर्तन हुये हैं। मुझे भी एक काम मिल गया है।

इस परिवर्तन में कीली की भूमिका डिज्नी/बायजू के अर्ली लर्नर प्रोग्राम ने निभाई है। उसने मुझे छोटे बच्चे को पढ़ाने/समझाने का एक नया नजरिया दिया है। स्वाति प्रिया जी ने भी बहुत सकारात्मक तरीके से मुझे सुना और अपने सुझाव/निर्देश दिये हैं।

फिलहाल मैं बच्चों की मानसिकता की बेहतर समझ के लिये डा. हईम सी गिनॉट (Haim C Ginott) की क्लासिक पुस्तक Between Parent and Child पढ़ रहा हूं। यही सब चलता रहा और स्वाति प्रिया जैसों के उत्साहवर्धक इनपुट्स मिले; तो शायद मेरे ब्लॉग का चरित्र बदल जाये। गंगा किनारे साइकिल पर भ्रमण करने वाले व्यक्ति की बजाय बच्चों पर सोच रखने वाले की पोस्टें आने लगें “मानसिक हलचल” पर। देखें, आगे क्या होता है!

अभी तो पद्मजा विषयक कुछ ही पोस्टें ब्लॉग पर हैं।

पद्मजा पाण्डेय मेज पर बैठ कर कार्टून बनाती और उसकी कथा मुझे सुनाती हुई।

मेरे समधी, रवींद्र कुमार पाण्डेय का कोरोना संक्रमण और उबरना

“यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”


वे कुछ अस्वस्थ थे। ऑक्सीमीटर 90 की रीडिंग दे रहा था। थोड़ी खांसी और थकान। उनके दोनो बेटों ने उनके गांव (फुसरो, बोकारो, झारखण्ड) में किसी तरह का जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया। यद्यपि उन्हें और कोई समस्या नहीं थी। कोई बुखार नहीं आया, कोई कंपकंपी नहीं हुई। पर फिर भी, इस कोरोना काल में कोई भी जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाना बेहतर लगा विकास और विवेक को।

विकास रवींद्र पांड़े के बड़े बेटे हैंं। विवेक, मेरे दामाद, मंझले। रवींद्र कुमार पाण्डेय इस समय भूतपूर्व सांसद हैं। पिछले पांच बार वे गिरिडीह संसदीय क्षेत्र का लोक सभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अपने क्षेत्र के भाजपा के सबसे सशक्त नेता हैं और अत्यंत सक्रिय भी!

सतरह अगस्त की शाम को मेरी बिटिया ने पाण्डेय जी की तबियत के बारे में बताया और उसके कुछ ही समय बाद उन्हें सड़क मार्ग से ले कर दिल्ली के लिये रवाना होने की खबर भी दी। यह भी बताया कि रास्ते में सवेरे पांच बजे के आसपास वे लोग हमारे गांव के समीप से गुजरेंगे।

मेरे घर पर श्री रवींद्र पाण्डेय

अठारह अगस्त की सुबह वे लोग एक डेढ़ घण्टे के लिये यहां हमारे घर आये। यद्यपि रवींद्र पाण्डेय जी की बीमारी के बारे में निश्चित तौर पर कुछ ज्ञात नहीं था, हम ने कोरोना संक्रमण की आशंका मानते हुये पूरी सावधानी बरती। वे लोग स्वयम भी सावधान थे। पाण्डेय जी थके हुये लग रहे थे, पर मरीज की तरह बिल्कुल झूल गये हों, वैसा भी नहीं था। अपनी कार से हमारे बराम्दे तक करीब पचास कदम खुद चल कर आये और कुर्सी पर बैठ कर बड़े सामान्य तरीके से बातचीत भी की – “भईया, आप तो बोकारो आये नहीं, हम ही चले आये हैं!” हर साल उनका नवरात्र में विंध्याचल आना होता है माँ विंध्यवासिनी के दर्शन के लिये। जब भी आते हैं तो हमारे यहां मिलते हुये ही वापस लौटते हैं। इस साल लॉकडाउन के कारण आना नहीं हो पाया था। अब अकस्मात आना हो गया।

मैंने देखा कि संक्रमण की पूरी आशंका के बावजूद उनकी पत्नीजी – श्रीमती लक्ष्मी पाण्डेय – उनका पूरा ध्यान रख रही थीं। स्नानघर में उनको तैयार करना, उनके कपड़े पानी से धो कर सूखने को डालना, उनके दवा-भोजन की फिक्र करना बड़ी बारीकी से उन्होने खुद किया। एक पूर्व-सांसद की पत्नी (और वह व्यक्ति, जो भविष्य में भी झारखण्ड की राजनीति में असीमित दमखम रखता हो) इतनी समर्पण भाव से सेवा करती हो – भारतीय नारी की श्रद्धा-मूर्ति लगीं लक्ष्मी पाण्डेय जी।

रवींद्र पाण्डेय और विवेक (दांये) हमारे यहां ब्रंच करते हुये।

पाण्डेय जी का काफिला (दो कारों में थे वे लोग) करीब डेढ़-दो घण्टे में नहा-धो कर और नाश्ता/भोजन कर मेरे यहां से रवाना हो गया। उनके जाने के बाद पूरी सतर्कता बरतते हुये हमने उनके इस्तेमाल किये परिसर को पर्याप्त सेनिटाइज कर लिया।

उनके जाने के बाद, मन में यह संतोष भाव तो था, कि हमने, आशंका के बावजूद अपने अतिथि धर्म को, अपनी क्षमता अनुसार निर्वहन करने का प्रयास किया। फिर भी, मन में यह भी था कि दूरी बना कर मिलने और पूरे समय मास्क लगाये रखने को वे कहीं अन्यथा न ले रहे हों।

वे लोग दिल्ली/गुड़गांव मध्य रात्रि के बाद ही पंहुचे। अगले दिन सवेरे रवींद्र कुमार पाण्डेय और उनकी पत्नीजी ने मेदांता अस्पताल में अपना कोविड-19 टेस्ट कराया। पाण्डेय जी कमजोरी और अन्य लक्षणों के कारण अस्पताल में भर्ती भी हो गये। देर रात में टेस्ट रिपोर्ट में पता चला कि रवींद्र जी कोरोना पॉजिटिव हैं पर उनकी पत्नीजी संक्रमित नहीं हैं।

रवींद्र पाण्डेय जी की फेसबुक पोस्ट

पाण्डेय जी ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपने कोरोना संक्रमित होने की बात सभी को बता भी दी। पर यह भी मुझे लगा कि रवींद्र पाण्डेय खुद कोरोना पॉजिटिव होने के बावजूद, कोरोना स्प्रेडर या सुपर स्प्रेडर नहीं थे; अन्यथा उनकी पत्नीजी, जो बराबर उनके साथ उनकी सहायता को बनी रहीं, जरूर कोरोना पॉजिटिव होतीं।

वे एक सप्ताह तक अस्पताल में रहे। सत्ताईस अगस्त को वे अस्पताल से डिस्चार्ज हुये।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर श्री रवीन्द्र पाण्डेय। साथ में उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मी और बेटा विकास

अस्पताल से छुट्टी पाने के बाद करीब एक पखवाड़ा वे दिल्ली में अपने फ्लैट में रहे। कुछ दिनों पहले वे अपने झारखण्ड आवास (फुसरो, बोकारो) आ गये हैं।

आज एक महीना हो रहा है अस्वस्थता के कारण दिल्ली यात्रा किये हुये। हमारे अपने करीबी में एक वही व्यक्ति हैं, जिन्हे कोरोना की आशंका के साथ मैंने पास से देखा और जो उसके बाद कोरोना पॉजिटिव पाये गये और संक्रमण से विधिवत उबर भी गये।

मैंने रवींद्र कुमार पाण्डेय जी से महीना भर गुजरने पर फोन पर बात की। उनका कहना था – “भईया, एक आदमी तीन दिन साधारण बुखार में रहता है तो एक पखवाड़ा तक कहता रहता है कि बहुत कष्ट है। यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”

उन्होने तो नहीं कहा, पर बातचीत से लगता था कि उनका स्वास्थ्य पूर्ववत तो नहीं है। अपने मूवमेण्ट्स में कुछ तो कमी उन्हे करनी पड़ी है। राजनैतिक सक्रियता उनकी प्रकृति में है और आसन्न विधान सभा उपचुनाव के कारण अनिवार्यता भी है। अतः वे एकांतवास तो कर ही नहीं पाएंगे।

कोरोना महामारी से निपटने का हर वर्ग का तरीका और रिस्पॉन्स कुछ कुछ अलग है। आईटी वाले घर में बैठ कर काम कर रहे हैं। दुकानदार और डिजिटल बन रहे हैं। बिल्कुल देसी गांव की दुकान वाला भी फोन पे का स्कैन कोड लगा लिया है। शिक्षा अधिकाधिक ऑन लाइन हो रही है। पर रवीन्द्र पाण्डेय जी की राजनैतिक पीढ़ी (मेरे अंदाज में) अनुकूलन की तकनीकें स्वीकारने में फिसड्डी है। उन्हें अपने जन संपर्क को ज्यादा से ज्यादा डिजिटल बनाना चाहिए। यह संक्रमण से पहले भी जरूरी था और अब तो बहुत ही जरूरी हो गया है। पाण्डेय जी के पास डिजिटल दक्ष नौजवान होने चाहिएं और उनको भाव भी मिलना चाहिए।… पर मैं जानता हूँ कि वे करेंगे अपने हिसाब से ही। परिवर्तन हर एक के लिए कठिन है और राजनेता के लिए; जिसकी ईगो को पुष्ट करने के लिए कई लोग आगे पीछे घूमते हैं; तो और भी कठिन है।

एक बात और – पोस्ट कोविड समस्यायें – विशेषकर सीनियर सिटिजन के लिये; भले ही उनकी देखभाल बड़ी अच्छी तरह होती हो; एक गम्भीर वास्तविकता हैं। इसके बारे में ज्यादा कुछ पढ़ने को नहीं मिलता। वह भी कोविड-19 जानकारी का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिये।

कोरोना संक्रमण अब दूर की खबर नहीं रही। अपने आसपास, अपने सम्बंधियों में भी सुनने को आ रहा है। इस विषाणु के साथ लगभग साल भर और गुजारना है। यह समय सकुशल गुजर जाये, इसकी तैयारी रहे और सावधानी भी – इसी की कामना की जाती है।