रस्सी बनाने की मशीन – गांव की आत्मनिर्भर सर्क्युलर इकॉनॉमी का नायाब उदाहरण

मोटर साइकिल पर लदी वह गियर सिस्टम वाली रस्सी बुनने की मशीन, हैण्डल घुमाने वाला बच्चा और रस्सी बुनने वाला वयस्क – ये तीन मुख्य घटक थे। इन तीनों के योग से कितनी शानदार रस्सी बनाने की मोबाइल दुकान बन गयी थी।


मैं बाजार जा रहा था तो रेलवे फाटक के पास एक दो फिट लम्बा लकड़ी का बक्सा दिखा जिसपर लिखा था रस्सी बनाने की मशीन। मैंने अपने वाहन चालक अशोक पण्डित से पूछा – वह क्या था अशोक?

अशोक ने जवाब दिया, “ऊ लाल लाल मिठाई बनवई क मशीन अहई।”

रस्सी बनाने की मशीन – गांव की आत्मनिर्भर सर्क्युलर इकॉनॉमी का नायाब उदाहरण – पॉडकास्ट

मैंने कहा – “अच्छा बुढ़िया का काता बनाने की मशीन? जरा गाड़ी मोड़ो। देखें कि उस लकड़ी के डिब्बे से कैसे बनाता है। उसपर तो रस्सी बनाना लिखा था?”

अशोक ने वाहन मोड़ कर रेलवे फाटक पर वापस पंहुचाया। पर वहां जो दिखा वह तो आश्चर्य जनक चीज निकली। गांवदेहात की इंवेन्शन करने की एक शानदार मिसाल! मैं तो गदगद हो गया।

रस्सी बनाने की मशीन

गांव में रस्सी और मोटी रस्सी यानी गाय-गोरू बांधने का पगहा की बहुत जरूरत होती है। पहले लोग सनई की खेती करते थे। सनई यानी पटसन। वह निचली जमीन में उगता था। फिर उसके तनों को काट कर पत्थर पर पीटा जाता था। उससे जो रेशे निकलते थे उससे किसान खाली समय में चरखी चला कर रस्सी बुनते थे। कालखण्ड बदला तो पटसन या सनई का स्थान प्लास्टिक ने ले लिया। नाईलोन की रस्सियां बाजार में आ गयीं। अब तो गांवदेहात की खटिया भी नाइलोन मिश्रित रस्सी से बुनने की प्रथा चल गयी है। जूट या सन की बुनाई दुगनी तिगुनी मंहगी पड़ती है।

गांवदेहात के किफायती लोग घर में अनुपयोगी वस्तुओं का बहुत प्रयोग करते हैं। सिवाय सिंगल यूज प्लास्टिक और थर्मोकोल के, बाकी सभी चीजें किसी न किसी तरह काम में आ जाती हैं। प्लास्टिक तो कबाड़ी के हाथ चला जाता है। और गांवदेहात में कबड़ियों तथा कबाड़ की दुकानों की भरमार हो गयी है। इसके अलावा गांव के बच्चे स्कूल नहीं जाते तो दिन भर प्लास्टिक की बोतलें बीन कर उसे कबाड़ी को देते हैं और बदले में उससे पुपली या टॉफी-कम्पट लेते हैं।

गांव बहुत सशक्त रीसाइकलिंग और सर्क्युलर अर्थव्यवस्था के मॉडल पर काम करता है। ज्यादा कार्बन फुटप्रिण्ट नहीं छोड़ता।

लोगों के घरों की पुरानी धोतियां या साड़ियां; कथरी, लेवा या रस्सी बनाने के काम आती हैं। कथरी सीने वाली महिलायें तो अब कम होती जा रही हैं; पर रस्सी जरूर घर घर में बनाई जाती है। वह बहुत सुघड़ या मजबूत नहीं होती पर कामचलाऊ तो होती ही है।

साड़ी के तीन लम्बे टुकड़े मशीन के हुकों में फंसाये जाते हैं।

यहां जो मोटरसाइकिल पर लदी रस्सी बुनने की मशीन दिखी, वह बुढ़िया का काता बनाने वाली नहीं, बाकायदा रस्सी बुनने की मशीन थी। उस बक्से में तीन हुक बाहर निकले थे जो बक्से के अंदर गियर सिस्टम से घूमते थे। बक्से के दूसरी ओर खड़ा बच्चा एक हेण्डल से बक्से के अंदर एक चक्का घुमाता था और रस्सी बुनने वाला मुख्य कारीगर उन हुकों में साड़ी के तीन लम्बे टुकड़े फंसा कर उनमें एक साथ बल (घुमा) देता था।

मशीन के हेण्डल से घूर्णित कर तीन रस्सियां बुनी जाती हैं।

बड़ी तेजी से वे टुकड़े रस्सी में तब्दील हो जाते थे। फिर तीनों रस्सियों को एक लकड़ी के गुटके से नेह्वीगेट करते हुये तीनों घूमते गीयर सिस्टम से घूर्णन देकर एक मोटी रस्सी बना देता था। सब कुछ करने में दो चार मिनट से ज्यादा समय नहीं लगता था।

तीन रस्सियों को लकड़ी के तीन खांचे वाले गुटके के सहारे बेल कर मोटी रस्सी बनाता अजय

लकड़ी के गुटके को मैंने ध्यान से देखा। वह हाँथ की ग्रिप में आने वाले बेलनाकार आकार का था। उसमें तीन रस्सियों को साधने के लिये तीन खांचे बने थे। इसको उसने नाम दिया था – कलियुग! मानो वह रस्सी बेलने वाला गुटका कलियुग की ही आवश्यकता हो। भारत की ग्रामीण और सर्क्युलर अर्थव्यवस्था का प्रतीक जैसा है यह कलियुग!

लकड़ी का गुटका – कलियुग

मोटर साइकिल पर लदी वह गियर सिस्टम वाली रस्सी बुनने की मशीन, हैण्डल घुमाने वाला बच्चा और रस्सी बुनने वाला वयस्क – ये तीन मुख्य घटक थे। इन तीनों के योग से कितनी शानदार रस्सी बनाने की मोबाइल दुकान बन गयी थी।

इस नये आविष्कार से आमदनी भी उसकी अच्छी होती होगी, तभी वह रस्सी बुनने वाला साइकिल की बजाय मोटरसाइकिल की हैसियत रखता था। मोटर साइकिल की सहायता से वह लम्बे इलाके में रस्सी बुनने का व्यवसाय कर सकता था।

पहले की बुनी एक मोटी रस्सी (पगहा) दिखाता अजय

उसने अपना नाम बताया – अजय। जातिसूचक नाम न उसने बताया न मैंने पूछा। महामलपुर का वह रहने वाला है। पास के मिर्जापुर जिले का एक बड़ा गांव है महामलपुर। अजय ने ग्रामीण आत्मनिर्भरता का जो जंतर बनाया है; वह गांधीजी के जमाने में होता और अजय बापू से मिला होता तो गांधीजी खूब खुश हुये होते। चरखे और खादी जैसा ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्त सिम्बल है यह रस्सी बनाने की मशीन।

अपनी रस्सी बनाने की मशीन लदी मोटरसाइकिल के साथ अजय

खैर अब गांधी का नहीं, नरेंद्र मोदी का जमाना है। पर आत्मनिर्भरता का नारा देने वाले मोदीजी को भी अजय का यह उपकरण जरूर पसंद आयेगा; ऐसा मुझे लगता है।


दांत का कीड़ा झड़वाये अशोक पण्डित

गांव में नहर की बगल में नटों के घर हैं। उनकी औरतें ये कीड़े निकालती हैं। जिस ओर के दांत में दर्द हो, उस ओर के कान में दवा डालती हैं और कान की तरफ सिर झुकाने पर दांत के कीड़े कान से निकलते हैं। कीड़े निकलने के पांच दस मिनट बाद ही आराम हो जाता है।


दांत के दर्द से परेशान हैं अशोक पण्डित। अशोक पण्डित यानी अशोक दुबे। मेरे वाहन चालक हैं। मेरे गांवदेहात की समझ को अपने दृष्टिकोण से परिपुष्ट करने में मेरे सहायक। वे गांव की हलचल बताने और उसपर अपनी सोच जाहिर करने में संकोच नहीं करते।

जब वे घर पर आते हैं तो उनसे ज्यादा बातचीत नहीं होती। पर जब कार में सारथी कर निकलते हैं; तब बात प्रारम्भ होती है – “तब असोक, फलाने क का हालचाल बा?”

फलाने के हालचाल से शुरू हुई बातचीत महुआ, मुसहर, चुनाव, पोखरी, आसपास हुये मर्डर या एक्सीडेण्ट, भूत-प्रेत … सब तक घूम आती है। निर्भर करता है कि कितनी दूर जाना है और कितना रिसेप्टिव मैं हूं। कभी कभी जब कान में पॉडकास्ट सुनने के लिये ईयरफोन ठुंसा होता है तो मौन ही चलता है। कभी जब मौसम अच्छा हुआ या कार में वातानुकूलन ठीक रहा तो ज्यादा मुद्दों पर भी चर्चा हो जाती है। … आजकल जब पॉडकास्टिंग पर मेरे अनगढ़ प्रयोग हो रहे हैं तो मन होता है कि अशोक पण्डित के साथ यह सारथी-पॉडकास्ट भी रिकार्ड किया जाये।

वह दिन भी शायद कभी आ ही जायेगा। बशर्ते कि पाठक/श्रोता यह न कह बैठें कि जीडी, ये पॉडकास्टिंग तुम्हारे बस की नहीं। … जब मैंने ब्लॉगिंग शुरू की थी, सन 2007 में, तो ज्यादातर पाठकों की राय थी कि मुझे न ढंग से हिंदी आती है और न अंगरेजी। पर अपनी (घटिया) हिंदी में भी दरेरा मार कर हिंदी ब्लॉगिंग जिंदा रखी। जिद्दी स्वभाव के कारण। शायद वही अब पॉडकास्टिंग को भी चलाये – वही जिद और जुनून।

बहरहाल, अशोक पण्डित पर लौटा जाये। करीब हफ्ते भर से अशोक पण्डित दांत के दर्द से परेशान हैं। परसों नहीं आये। कुछ खबर भी नहीं दी। वैसे फोन कर बताना या फीडबैक देना अशोक पण्डित के चरित्र में है नहीं। आपकी गरज है तो उनसे पता कर लें। और अगर अशोक पण्डित का फोन आउट ऑफ रीच है – जो अक्सर होता है – तो उनके किसी पड़ोसी को खबर करें कि वह अशोक से बात करा दे।

जब वे नहीं आये तो फोन कर उनके न आने का कारण पूछा। अशोक ने बताया कि दांत में दर्द बढ़ गया है और वे कीड़ा झड़वाने जा रहे हैं।

उसके बाद वे कल भी अवतरित नहीं हुये। आज आये। जब उनके साथ मार्केट जा रहा था तो मैंने पूछा – कीड़ा झड़वाये? किस ओझा के पास गये थे?

जब अशोक के साथ मार्केट जा रहा था तो मैंने पूछा – कीड़ा झड़वाये? किस ओझा के पास गये थे?

मेरा अंदाज यह था कि दांत के दर्द का इलाज भी भी दवा और दुआ के तालमेल से होता होगा गांव में। दवा दांत का डाक्टर देता होगा और झड़वाने का काम कोई ओझा या तांत्रिक करता होगा। पर अशोक ने जो बताया वह अलग ही चीज थी। बोले – नाहीं, कौनो ओझा नाहीं। दांते क कीड़ा झरवावई ग रहे। गंउआँ क नट हयें जे कीड़ा निकालथीं। दुई किरौना निकला। ओकरे बाद आराम बा। ( नहीं, कोई ओझा नहीं। दांत के कीड़े झड़वाने गया था। गांव के ही नट लोग निकालते हैं। दो कीड़े निकले। उसके बाद आराम है।)

अशोक ने और जोड़ा – पिछली दईंया झरवाये रहे त सात ठे निकरा रहा। (पिछली बार दांत में दर्द होने पर झड़वाया था तो सात कीड़े निकले थे।)

नट घुमन्तू जनजाति के लोग हैं तो बाजीगरी दिखा कर पेट पालते हैं। आपने नट लड़की को मटका सिर पर रखे एक हवा में तानी रस्सी पर चलते देखा होगा। अच्छा तमाशा होता है वह। पर नट लोग यह दांत से कीड़े निकालने की भी हाथ की सफाई दिखा कर दांत के दर्द को भी भुनाते हैं; यह आज ही पता चला।

अशोक ने दांत के कीड़े निकालने की विधि भी मुझे स्पष्ट की। गांव में नहर की बगल में नटों के घर हैं। उनकी औरतें ये कीड़े निकालती हैं। जिस ओर के दांत में दर्द हो, उस ओर के कान में दवा डालती हैं और कुछ मंत्र फूंकती हैं। फिर उस कान की तरफ सिर झुकाने पर दांत के कीड़े कान से निकलते हैं। कीड़े निकलने के पांच दस मिनट बाद ही आराम हो जाता है।

कितने बड़े कीड़े होते हैं?

चींटी जितने। उससे भी कुछ छोटे। कीड़े निकालने की फीस बीस रुपया लेती हैं वे औरतें।

मेरे आगे के एक दांत में काला धब्बा हो गया था। उसे डेंटिस्ट को दिखाने दांत के डाक्टर के पास भी अशोक पण्डित ही ले कर गये थे। स्टेज – 2 केविटी थी, जिसको साफ कर फिलिंग का काम एक सिटिंग में डाक्टर ने किया था। चार हजार रुपये का खर्च आया। पर अपने लिये अशोक ने नटिनी के पास जा कर कीड़े निकलवाना बेहतर उपाय समझा! जबकि अशोक की समस्या शायद ज्यादा गहरी हो – जिसमें रूट केनाल ट्रीटमेण्ट या दांत का उखड़वाना ही निदान हो। पर अशोक को तो सात या दो कीड़े निकलवा कर ही आराम हो गया है। और खर्चा भी मात्र बीस रुपये आया!

मुझे यकीन है कि अशोक पण्डित दो-तीन महीने में फिर नट के यहां कीड़ा झड़वाने जांयेगे ही। अगली बार कितने कीड़े निकलेंगे, यह जानने की मुझे उत्सुकता रहेगी। पता चला तो आपको भी खबर करूंगा।

दांत का कीड़ा झड़वाये अशोक पण्डित – पॉडकास्ट

बहरहाल, आपको भी उस नट का मोबाइल नम्बर या विजटिंग कार्ड चाहिये क्या? 😆