मेरे समधी, रवींद्र कुमार पाण्डेय का कोरोना संक्रमण और उबरना

“यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”


वे कुछ अस्वस्थ थे। ऑक्सीमीटर 90 की रीडिंग दे रहा था। थोड़ी खांसी और थकान। उनके दोनो बेटों ने उनके गांव (फुसरो, बोकारो, झारखण्ड) में किसी तरह का जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया। यद्यपि उन्हें और कोई समस्या नहीं थी। कोई बुखार नहीं आया, कोई कंपकंपी नहीं हुई। पर फिर भी, इस कोरोना काल में कोई भी जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाना बेहतर लगा विकास और विवेक को।

विकास रवींद्र पांड़े के बड़े बेटे हैंं। विवेक, मेरे दामाद, मंझले। रवींद्र कुमार पाण्डेय इस समय भूतपूर्व सांसद हैं। पिछले पांच बार वे गिरिडीह संसदीय क्षेत्र का लोक सभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अपने क्षेत्र के भाजपा के सबसे सशक्त नेता हैं और अत्यंत सक्रिय भी!

सतरह अगस्त की शाम को मेरी बिटिया ने पाण्डेय जी की तबियत के बारे में बताया और उसके कुछ ही समय बाद उन्हें सड़क मार्ग से ले कर दिल्ली के लिये रवाना होने की खबर भी दी। यह भी बताया कि रास्ते में सवेरे पांच बजे के आसपास वे लोग हमारे गांव के समीप से गुजरेंगे।

मेरे घर पर श्री रवींद्र पाण्डेय

अठारह अगस्त की सुबह वे लोग एक डेढ़ घण्टे के लिये यहां हमारे घर आये। यद्यपि रवींद्र पाण्डेय जी की बीमारी के बारे में निश्चित तौर पर कुछ ज्ञात नहीं था, हम ने कोरोना संक्रमण की आशंका मानते हुये पूरी सावधानी बरती। वे लोग स्वयम भी सावधान थे। पाण्डेय जी थके हुये लग रहे थे, पर मरीज की तरह बिल्कुल झूल गये हों, वैसा भी नहीं था। अपनी कार से हमारे बराम्दे तक करीब पचास कदम खुद चल कर आये और कुर्सी पर बैठ कर बड़े सामान्य तरीके से बातचीत भी की – “भईया, आप तो बोकारो आये नहीं, हम ही चले आये हैं!” हर साल उनका नवरात्र में विंध्याचल आना होता है माँ विंध्यवासिनी के दर्शन के लिये। जब भी आते हैं तो हमारे यहां मिलते हुये ही वापस लौटते हैं। इस साल लॉकडाउन के कारण आना नहीं हो पाया था। अब अकस्मात आना हो गया।

मैंने देखा कि संक्रमण की पूरी आशंका के बावजूद उनकी पत्नीजी – श्रीमती लक्ष्मी पाण्डेय – उनका पूरा ध्यान रख रही थीं। स्नानघर में उनको तैयार करना, उनके कपड़े पानी से धो कर सूखने को डालना, उनके दवा-भोजन की फिक्र करना बड़ी बारीकी से उन्होने खुद किया। एक पूर्व-सांसद की पत्नी (और वह व्यक्ति, जो भविष्य में भी झारखण्ड की राजनीति में असीमित दमखम रखता हो) इतनी समर्पण भाव से सेवा करती हो – भारतीय नारी की श्रद्धा-मूर्ति लगीं लक्ष्मी पाण्डेय जी।

रवींद्र पाण्डेय और विवेक (दांये) हमारे यहां ब्रंच करते हुये।

पाण्डेय जी का काफिला (दो कारों में थे वे लोग) करीब डेढ़-दो घण्टे में नहा-धो कर और नाश्ता/भोजन कर मेरे यहां से रवाना हो गया। उनके जाने के बाद पूरी सतर्कता बरतते हुये हमने उनके इस्तेमाल किये परिसर को पर्याप्त सेनिटाइज कर लिया।

उनके जाने के बाद, मन में यह संतोष भाव तो था, कि हमने, आशंका के बावजूद अपने अतिथि धर्म को, अपनी क्षमता अनुसार निर्वहन करने का प्रयास किया। फिर भी, मन में यह भी था कि दूरी बना कर मिलने और पूरे समय मास्क लगाये रखने को वे कहीं अन्यथा न ले रहे हों।

वे लोग दिल्ली/गुड़गांव मध्य रात्रि के बाद ही पंहुचे। अगले दिन सवेरे रवींद्र कुमार पाण्डेय और उनकी पत्नीजी ने मेदांता अस्पताल में अपना कोविड-19 टेस्ट कराया। पाण्डेय जी कमजोरी और अन्य लक्षणों के कारण अस्पताल में भर्ती भी हो गये। देर रात में टेस्ट रिपोर्ट में पता चला कि रवींद्र जी कोरोना पॉजिटिव हैं पर उनकी पत्नीजी संक्रमित नहीं हैं।

रवींद्र पाण्डेय जी की फेसबुक पोस्ट

पाण्डेय जी ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपने कोरोना संक्रमित होने की बात सभी को बता भी दी। पर यह भी मुझे लगा कि रवींद्र पाण्डेय खुद कोरोना पॉजिटिव होने के बावजूद, कोरोना स्प्रेडर या सुपर स्प्रेडर नहीं थे; अन्यथा उनकी पत्नीजी, जो बराबर उनके साथ उनकी सहायता को बनी रहीं, जरूर कोरोना पॉजिटिव होतीं।

वे एक सप्ताह तक अस्पताल में रहे। सत्ताईस अगस्त को वे अस्पताल से डिस्चार्ज हुये।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर श्री रवीन्द्र पाण्डेय। साथ में उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मी और बेटा विकास

अस्पताल से छुट्टी पाने के बाद करीब एक पखवाड़ा वे दिल्ली में अपने फ्लैट में रहे। कुछ दिनों पहले वे अपने झारखण्ड आवास (फुसरो, बोकारो) आ गये हैं।

आज एक महीना हो रहा है अस्वस्थता के कारण दिल्ली यात्रा किये हुये। हमारे अपने करीबी में एक वही व्यक्ति हैं, जिन्हे कोरोना की आशंका के साथ मैंने पास से देखा और जो उसके बाद कोरोना पॉजिटिव पाये गये और संक्रमण से विधिवत उबर भी गये।

मैंने रवींद्र कुमार पाण्डेय जी से महीना भर गुजरने पर फोन पर बात की। उनका कहना था – “भईया, एक आदमी तीन दिन साधारण बुखार में रहता है तो एक पखवाड़ा तक कहता रहता है कि बहुत कष्ट है। यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”

उन्होने तो नहीं कहा, पर बातचीत से लगता था कि उनका स्वास्थ्य पूर्ववत तो नहीं है। अपने मूवमेण्ट्स में कुछ तो कमी उन्हे करनी पड़ी है। राजनैतिक सक्रियता उनकी प्रकृति में है और आसन्न विधान सभा उपचुनाव के कारण अनिवार्यता भी है। अतः वे एकांतवास तो कर ही नहीं पाएंगे।

कोरोना महामारी से निपटने का हर वर्ग का तरीका और रिस्पॉन्स कुछ कुछ अलग है। आईटी वाले घर में बैठ कर काम कर रहे हैं। दुकानदार और डिजिटल बन रहे हैं। बिल्कुल देसी गांव की दुकान वाला भी फोन पे का स्कैन कोड लगा लिया है। शिक्षा अधिकाधिक ऑन लाइन हो रही है। पर रवीन्द्र पाण्डेय जी की राजनैतिक पीढ़ी (मेरे अंदाज में) अनुकूलन की तकनीकें स्वीकारने में फिसड्डी है। उन्हें अपने जन संपर्क को ज्यादा से ज्यादा डिजिटल बनाना चाहिए। यह संक्रमण से पहले भी जरूरी था और अब तो बहुत ही जरूरी हो गया है। पाण्डेय जी के पास डिजिटल दक्ष नौजवान होने चाहिएं और उनको भाव भी मिलना चाहिए।… पर मैं जानता हूँ कि वे करेंगे अपने हिसाब से ही। परिवर्तन हर एक के लिए कठिन है और राजनेता के लिए; जिसकी ईगो को पुष्ट करने के लिए कई लोग आगे पीछे घूमते हैं; तो और भी कठिन है।

एक बात और – पोस्ट कोविड समस्यायें – विशेषकर सीनियर सिटिजन के लिये; भले ही उनकी देखभाल बड़ी अच्छी तरह होती हो; एक गम्भीर वास्तविकता हैं। इसके बारे में ज्यादा कुछ पढ़ने को नहीं मिलता। वह भी कोविड-19 जानकारी का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिये।

कोरोना संक्रमण अब दूर की खबर नहीं रही। अपने आसपास, अपने सम्बंधियों में भी सुनने को आ रहा है। इस विषाणु के साथ लगभग साल भर और गुजारना है। यह समय सकुशल गुजर जाये, इसकी तैयारी रहे और सावधानी भी – इसी की कामना की जाती है।


करें मास्टरी दुइ जन खाइँ, लरिका होइँ, ननियउरे जाइँ

गुन्नीलाल जी का मत है कि हमें 50-30-20 के नियम का पालन करना चाहिये। “जितनी आमदनी हो, उसके पचास प्रतिशत में घर का खर्च चलना चाहिये। तीस प्रतिशत को रचनात्मक खर्च या निर्माण के लिये नियत कर देना चाहिये। बचे बीस प्रतिशत की बचत करनी चाहिये।


आपको इस पोस्ट का शीर्षक अजीब सा लग सकता है। यह स्कूल मास्टर की आर्थिक दशा पर अवधी/भोजपुरी में कही एक कहावत है जो गुन्नीलाल पाण्डेय जी ने उद्धृत की। अभिप्राय यह कि, उनके युग में, (अनियंत्रित आदतों के कारण) स्कूल मास्टर दो का ही खर्च संभालने लायक होता था, बच्चे ननिहाल की कृपा से पलते थे। … आज भी कमोबेश वही हालत होगी, बावजूद इसके कि वेतन पहले की अपेक्षा बहुत सुधर गये हैं। बहुत बड़ी आबादी अपने खर्चे अपनी आय की सीमा में समेटने की आदतों को नहीं अपनाती… और यह इस प्रांत/देश की बात नहीं है – वैश्विक समस्या है। उपभोक्तावाद ने उत्तरोत्तर उसे और विकट बना दिया है।

श्री गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नी लाल पाण्डेय मेरी जीवन की दूसरी पारी के प्रिय मित्र हैं। वे स्कूल मास्टर के पद से रिटायर हुये हैं। पहली पारी में उनसे मुलाकात तो सम्भव नहीं ही होती। दूसरी पारी में भी अगर मैं अगर एक कॉन्ट्रेरियन जिंदगी जीने की (विकट) इच्छा वाला व्यक्ति न होता और मेरी पत्नीजी मेरी इस खब्ती चाहत में साथ न देतीं तो गुन्नीलाल जी से मुलाकात न होती। उनसे मैत्री में बहुत और भी ‘अगर’ हैं, पर उनसे मैत्री शायद हाथ की रेखाओं में लिखी थी, तो हुई।

Continue reading “करें मास्टरी दुइ जन खाइँ, लरिका होइँ, ननियउरे जाइँ”

राजधर – साइकिल पर सब्जी

दो महीना पहले तमिलनाडु से गांव लौटे थे राजधर। वहां कोयम्बटूर में किसी धागा बनाने वाली कम्पनी में कारीगर थे। अभी वापस जाने की नहीं सोची है। “कम से कम चार-पांच महीने तो यहीं रहना है।”


दो किलोमीटर दूर गांव है राजधर का। करहर। साइकिल पर सब्जी ले कर निकलते हैं और करहर, भगवानपुर, विक्रमपुर, मेदिनीपुर, कोलाहलपुर और द्वारिकापुर होते हुये करहर वापस लौटते हैं। करीव 8-10 किलोमीटर की साइकिल-फेरी लगाते हैं। आज शाम चार बजे उन्हें मैंने पहली बार देखा। नौजवान आदमी। शायद साल दो साल पहले लड़का ही रहा हो।

“रोज आता था, कोई बाहर मिलता नहीं था तो चला जाता था।”; उन्होने कहा।

दो महीना पहले तमिलनाडु से गांव लौटे थे राजधर। वहां कोयम्बटूर में किसी धागा बनाने वाली कम्पनी में कारीगर थे। अभी वापस जाने की नहीं सोची है। “कम से कम चार-पांच महीने तो यहीं रहना है।”

मैंने पूछा नहींं कि वहां फैटरी चालू हुई या नहीं। शायद वहां काम में अभी भी अवरोध हो; या शायद कोरोना संक्रमण का मामला हो। कोयम्बटूर की बजाय करहर में हालात कोरोना संक्रमण के हिसाब से ज्यादा सुरक्षित तो है ही।

राजधर, सब्जीवाले

पर मुझे नहीं लगता कि संक्रमण का कोण है राजधर के निर्णय में। तीन थैले आगे और एक बास्केट पीछे रख साइकिल पर घर घर घूमते राजधर ने कोई मास्क नहीं लगा रखा। कोविड-19 संक्रमण से बचाव उनके लिये प्रमुख मुद्दा हो, ऐसा लगता नहीं। जीविकोपार्जन ज्यादा महत्व रखता होगा।

राजधर को जल्दी थी। आज सब्जी ले कर निकलने में देर हो गयी। बोले – “अब तक तो द्वारिकापुर पंहुचता था। लगता है देर होने के कारण आज पूरी सब्जी बिक नहीं पायेगी।”

संक्रमण बहुत तेजी से बढ़ रहा है। पूर्वांचल में उसके बढ़ने की रफ्तार पहले पूरे उत्तर प्रदेश से कम हुआ करती थी, अब ज्यादा हो गयी है। उत्तर प्रदेश पहले भारत के औसत से बढ़त में नीचे रहता था, अब उसमें देश से ज्यादा तेजी से नये मामले बढ़ रहे हैं। और खराब बात यह है कि ठीक होने की दर, बढ़ने की दर से कम हो गयी है। लोग ज्यादा बीमार हैं। पहले कुल मामलों के 25% लोग ही कोरोना पॉजिटिव हुआ करते थे; अब पूर्वांचल में कुल पाये गये मामलों के 40+% पॉजिटिव हैं।

संक्रमण की विकट दशा में राजधर जैसे व्यक्ति का सब्जी घर घर पंहुचाना बड़े महत्व का काम है, समाज के लिये। पता नहीं, वे इसको समझते हैं या नहीं। उनसे किसी ने इसके बारे में बोला भी है या नहीं।

फिलहाल, राजधर को जाने की जल्दी थी; मैंने उनसे रोज आने को कहा। शायद वे कल आयें।


राम सेवक के बागवानी टिप्स

उनके आते ही घर के परिसर की सूरत बदलनी शुरू हो गयी है। हेज की एक राउण्ड कटिंग हो गयी है। मयूरपंखी का पौधा अब तिकोने पेण्डेण्ट के आकार में आ गया है। एक दूसरे से भिड़ रहे पेड़ अब अनुशासित कर दिये गये हैं।



राम सेवक मेरे पड़ोस में रहते हैं। गांव से बनारस जाते आते हैं। आजकल ट्रेनें नहीं चल रही हैं। बस का किराया ज्यादा है और शहर में आस पास जाने आने के लिये वाहन चाहिये, इस कारण से साइकिल से ही बनारस जाना हो रहा है। पचास किलोमीटर एक तरफ का साइकिल चला कर जाना और शाम को वापस पचास किलोमीटर चला कर गांव आना सम्भव नहीं, इसलिये शहर में एक कमरा किराये पर ले रखा है रुकने के लिये और सप्ताहांत में ही गांव वापस आते हैं।

राम सेवक

राम सेवक; जिनका कहना है कि माता-पिता ने उनका नाम ही सेवा करने के लिये रखा है; बनारस में माली का काम करते हैं। कई बंगलों में समय बांध रखा है। समय के अनुसार लोग पेमेण्ट करते हैं। कहीं हजार, कहीं दो हजार, कहीं चार हजार।

Continue reading “राम सेवक के बागवानी टिप्स”

चीनी पाण्डेय ने बनाई चिड़िया की कहानी

“उस बाग में ढेरों चिड़ियाँ रहती थीं। वहीं एक पेड़ पर बुलबुल भी रहती थी। वह सुनहरे रंग की थी। दिन में वह अकेली रहती थी। उसके माता पिता दूर कहीं काम पर जाते थे …”


आज मैं कॉपी कलम ले कर लिखने की कोशिश कर रही थी कि मेरी पोती चीनी ने आ कर कहा – दादी, आप एक चिड़िया की कहानी लिखिये।

चीनी (पद्मजा पाण्डेय), सवेरे बगीचे में घूमते हुये।

मैंने कहा – आप बताओ, तो लिख देती हूं। तो चीनी ने एक कहानी सुनाई।

एक बहुत सुंदर बाग था। उसमें बहुत सुंदर सुंदर फूल लगे थे। कई फलों के पेड़ भी थे। आम, अनार, अमरूद और सेव। और भी बहुत सारे। उस बाग में ढेरों चिड़ियाँ रहती थीं। वहीं एक पेड़ पर बुलबुल भी रहती थी। वह सुनहरे रंग की थी। दिन में वह अकेली रहती थी। उसके माता पिता दूर कहीं काम पर जाते थे और शाम के समय उसके लिये ढेर सारा खाना ले कर आते थे।

एक शाम उसके माता पिता नहीं लौटे। सुनहरी बुलबुल बहुत परेशान थी। उसे बहुत दुख हो रहा था। अंधेरा होने पर भी उसके माता पिता नहीं लौटे। सारे पक्षी सुनहरी बुलबुल के पास बैठे थे। सारे पेड़ भी सुनहरी बुलबुल को समझा रहे थे कि शायद किसी काम में फंस गये होंगे माता पिता।

सुनहरी बुलबुल रोने लगी और रोते रोते सो गयी।

सुबह उसने देखा कि उसके मम्मी-पापा जल्दी जल्दी आ रहे हैं। उन्होने बताया कि बेटा हम तो शाम के समय घर आ रहे थे तो हम पर एक लड़के ने पत्थर मार दिया। तुम्हारी मम्मी के पंख में चोट लग गयी। इस लिये हम रात एक जामुन के पेड़ पर बैठ गये। सुबह तक चोट थोड़ी थोड़ी ठीक होने पर जल्दी जल्दी तुम्हारे पास लौटे हैं।

घर में घोंसला बनाये ग्रेट इण्डियन रॉबिन। अपने चूजों के लिये भोजन ले कर आती हुई।

कहानी सुनाने के बाद चीनी ने कहा – दादी, पक्षियों को नहीं मारना चाहिये, न?

यह कह कर वह अपने खेल मेंं लग गयी। मैने उसकी कही कहानी को कागज पर हूबहू उतार दिया। चीनी (पद्मजा पाण्डेय) छ साल की है। आजकल कोरोना काल में छुट्टियां हैं। वह घर में और पेड़-पौधों के बीच अकेली घूमती है। घूमते चिड़ियों को देखती है। कई जोड़ा बुलबुल भी हैं घर की चिड़ियों में। घर में एक इण्डियन रॉबिन दम्पति ने घोंसला बनाया है चीनी के लटकाये चिड़िया “घर” में।

चिड़िया का घोंसला, जिसे चीनी बार बार निहारती है।

यह सब देखती-घूमती वह कहानी भी बुन लेती है। कहानी कुछ कल्पना और कुछ परिवेश को देखने परखने से उपजती है।


नई पौध के लिये नर्सरी तो जाना ही है! #गांवकाचिठ्ठा

नर्सरी जा कर कुछ मोगरे के पौधे तो लाने ही हैं। यूं, कोरोना काल में बाहर निकलने का खतरा तो है। … पर सावधानी से डर को किनारे करते चलना है।


बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं। विषय की कमी हो, ऐसा तो कतई नहीं है। समय की कमी का तो प्रश्न ही नहीं है। बस, तारतम्य नहीं बना। पिछली पोस्ट 14 मई को लिखी थी, आज डेढ़ महीने बाद लिख रही हूं। इस बीच मेरे पति की पोस्टें (लगभग) आती रही हैं।

कोरोना संक्रमण गांव में चारों ओर से घेरने लगा है। आरोग्य सेतु पर पांच किलोमीटर के इलाके में तो कोरोना का कोई मरीज नहीं दिखता, पर पांच से दस किलोमीटर की परिधि में 4-5 मामले नजर में आते हैं। जो समस्या अभी बड़े शहरों में थी, और हम कहते थे कि यह बड़े जगहों की बीमारी है, वह अब गांव की तरफ न केवल आ रही है बल्कि तेजी से फैल रही है। इसके साथ साथ दिनचर्या भी, पहले की ही तरह सामान्य करने की कवायद भी चल रही है। बार बार, बहुत से लोग कह रहे हैं कि हमें इसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिये।

गांव में घर
Continue reading “नई पौध के लिये नर्सरी तो जाना ही है! #गांवकाचिठ्ठा”