गांवदेहात डायरी

तीन दिन से हमने गैस स्टोव का प्रयोग नहीं किया। हम लाई-चना या केले पर जिंदा नहीं रहे, न ही बाजार से पका हुआ भोजन खरीदा। घर में रोटी, पराठा, सब्जी, दाल, चावल—सब कुछ बना। स्वाद भी मिला और पौष्टिकता भी बनी रही।
हमने न लकड़ी जलाई, न उपले खरीदे, न कोयले का भाव पूछा। अरुणा से मिट्टी का चूल्हा बनाने को भी नहीं कहा। काम राइस कुकर की धीमी कुकिंग और इंडक्शन पर हुआ। तीन केवीए के सोलर सिस्टम का इस्तेमाल।
घर बैठे हमने होरमुज़ की त्रासदी को जैसे अंगूठा दिखा दिया।
हमने युद्ध नहीं रोका, पर अपनी रसोई को उससे मुक्त कर लिया।
कल नरेश से बात हुई। वह बड़ौदा में हैं। वहां आसपास सबके पास पाइप्ड गैस सप्लाई है, पर वह अकेले रहते हैं—सालों से न एलपीजी सिलिंडर लिया, न पाइप गैस का उपयोग किया। उनका काम इंडक्शन से चल जाता है। बर्तन मांजने वाली नौकरानी भी बहुत पहले छोड़ दी—इंडक्शन से बर्तन कम गंदे होते हैं।
बिजली पर निर्भरता हो तो जिंदगी कुछ ज्यादा साफ-सुथरी हो जाती है।
अरुणा मेरी बात सुन रही थी। बोली—“सबसे ज्यादा गंदे बर्तन लकड़ी-उपले पर खाना बनाने में होते हैं। मांजते-मांजते दम निकल जाता है।”
मैंने उसके लिए ऑनलाइन इंडक्शन चूल्हा खरीद दिया। कीमत वह अपनी पगार से धीरे-धीरे चुका देगी। उसके यहां रसोई तक बिजली ले जाने के लिये लंबा तार नहीं था—हमने अपने घर से एक पुराना एक्सटेंशन कॉर्ड दे दिया।
गैस उसने बुक कराई है—रोज सप्लाई का इंतजार करती है। लेकिन अब इंडक्शन आ जाने से उसकी तात्कालिक व्यग्रता खत्म हो गई है।
सुबह पांच बजे बिजली आई तो कहने लगी—
“हम त उठतई मान दिन भर क खाना बनाइ लिहा इंडक्शनवा पर।”
अब उसकी रसोई बिजली के आने-जाने के साथ सिंक्रोनाइज़ होने लगी है।
युद्ध या आपदा में जिंदगी रुकती नहीं—बस उसका तरीका बदल जाता है। लोगों के व्यवहार में लंबे समय के बदलाव उतर आते हैं।
आगे क्या होगा? लोग फिर लकड़ी-उपले पर लौटेंगे? गोबर गैस का प्रसार होगा—जिससे रसोई की गैस भी मिले और रासायनिक खाद का विकल्प भी? सरकार क्या करेगी?
रोचक यह है कि गांव में हर आदमी अपने स्तर पर रसोई बचाने की जुगत कर रहा है। कोई लकड़ी ढूंढ रहा है, कोई उपले या भूसी। जिसके पास पैसा है, वह कोयला खरीदने की सोच रहा है।
हर आदमी कुछ कर रहा है—कोई सरकार या ‘परसासन’ का मुंह नहीं देख रहा।
गांव में सरकार नहीं आती—जुगाड़ पहले पहुंच जाता है।
यह व्यवहार वैसा ही है जैसा 100-200 साल पहले गांव का था। आत्मनिर्भरता की वह पुरानी प्रवृत्ति जैसे फिर लौट आई है।
मेरे घर में पेड़ों की छंटाई से जो लकड़ी बची थी, वह मेरा ड्राइवर और नौकरानी बीन ले गये। दोनों उपले भी तलाश रहे हैं—
“फूआ, उपरियौ मंहग होई गई बा…”
“पहिले एक रुपया क मिलत रहा, अब दुई रुपया क हो गइल—आ साइज भी छोट हो गइल।”
“उपरी नाहीं, चपरी बेंचत हयें सब!”
डिसरप्शन बड़ा है और व्यापक है। असर सबसे ज्यादा उन देशों पर है जो खाड़ी के तेल और गैस पर निर्भर थे। गांवदेहात अपेक्षाकृत कम प्रभावित है—पर प्रभावित तो है ही।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
26 मार्च 2026
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