प्रेमसागर गुजरे बलिया पेसेंजर से

सवेरे फोन आया तो प्रेमसागर की ट्रेन बनारस सिटी में खड़ी थी। उन्होंने बताया कि वे प्रयाग जा रहे हैं, वहां से चित्रकूट जायेंगे। किसी शुभ वृक्ष का दंड वहां से लेकर आगे निकलेंगे—नर्मदा की दंड परिक्रमा के लिये।
मेरे हिसाब से यह शुद्ध हठयोग है। इससे साधक की आत्मिक उन्नति कितनी होती है, वही जाने; पर अगर समाज को यह जताने की भावना होती है—“देखो, कितनी कठिन साधना मैंने सम्पन्न की है”—तो वह अहंकार की ही पोषक होती है। प्रेमसागर में यह संभावना मुझे प्रबल लगती है। पर उससे मुझे क्या?
प्रेमसागर की इस यात्रा के माध्यम से मैं अपनी मानसिक हलचल ही दर्ज करूंगा। उसमें मेरी एक तरह की आर्मचेयर नर्मदा यात्रा होगी—जहां मैं चल नहीं रहा, पर भीतर बहुत कुछ चल रहा है। उससे प्रेमसागर का भला हो या अनभला, उसका आकलन तो वही करेंगे। … जो होगा, देखा जायेगा; लेखन में दर्ज किया जायेगा।
अगर उनकी बलिया–रामबाग पेसेंजर समय पर चलती रहती तो पौने ग्यारह बजे वे कटका स्टेशन पर होते। मैंने पत्नीजी से उनके लिये एक कैसरोल में पूरी–तरकारी बनाकर देने का अनुरोध किया। वह तैयार हो गया, पर ट्रेन लेट होती गई।
जब ट्रेन कटका स्टेशन पर आई तो बारह बज चुके थे। बहुत सालों बाद मैं स्टेशन के प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर गया—जबकि स्टेशन घर से मात्र पांच सौ कदम की दूरी पर है। प्रेमसागर का डिब्बा अंतिम था, तो पूरी लम्बाई चलकर वहां पहुंचा।
दो मिनट ही रुकी होगी गाड़ी। प्रेमसागर बाहर निकल कर दौड़ते हुए मेरे पास आये और चरण स्पर्श किया। भोजन का कैसरोल मेरे ड्राइवर अशोक ने उन्हें थमाया और ट्रेन चल दी। जाती ट्रेन के दरवाजे पर खड़े प्रेमसागर का चित्र मैंने खींचा।
सफेद कपड़ा पहने और एक पीला गमछा लटकाये प्रेमसागर में मेरे प्रति आदर भाव साफ दिख रहा था। आगे की कठिन यात्रा को लेकर कोई तनाव, कोई उहापोह—कुछ भी नहीं। लेशमात्र भी नहीं। उनके गुणसूत्र में यायावरी है। यायावरी उनका ओढ़ना-बिछौना है, उनकी सांसों में बसी हुई है यायावरी। लगता है नर्मदा की दंड परिक्रमा के लिये वे वैसे ही निकले हैं जैसे मैं साइकिल लेकर गंगा किनारे टहलने निकलता हूँ।
पर यायावरी को मैं किसी अद्भुत तपस्या से नहीं जोड़ता। मेरी राय (एक नितांत व्यक्तिगत राय) में वह कठिन जरूर है, उसमें संघर्ष है; पर अंततः वह एक साधारण मानवीय प्रवृत्ति ही है। हर आदमी कुछ न कुछ मात्रा में यायावर है—प्रेमसागर बस थोड़ा ज्यादा है।
दंड यात्रा — जिसमें आदमी खड़ा होता है, बैठ कर लेटता और आगे हाथ फैलाता है, फिर उठ कर खड़ा हो अपनी लम्बाई जितने कदम चल कर वही प्रक्रिया दोहराता है — उसे गहन शारीरिक और मानसिक अनुशासन देती होगी। वह उसे आध्यात्मिक अनुभव भी देती होगी? मैं पक्के से नहीं कह सकता। प्रेमसागर के माध्यम से वह देखने का प्रयास करूंगा।
दंड नर्मदा यात्रा का विवरण लिखने के जरिये मैं प्रेमसागर को महानता के चने के झाड़ पर नहीं चढ़ाऊंगा। वह नर्मदा को समझें तो ठीक; नर्मदा के किनारे-किनारे चलते हुए भी अगर अछूते निकल जायें, तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मेरी अपनी मानसिक यात्रा चलती रहनी चाहिये—बस।
शुभकामनाएँ प्रेमसागर को नर्मदा दंड परिक्रमा के लिये।
#NarmadaDandParikrama
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
28 मार्च 2026
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