गांवदेहात डायरी

एक्यूआई बताने वाले एप्प की बजाय हवा की सही गुणवत्ता बताने के तरीके गांव देहात में अलग हैं। बनारस जाने वाली पसीजर कितने बजे जाती है; वही तय करती है कि बगल के केवटान और पसियान में चूल्हे कब सुलगाये जायेंगे और कब हवा में धुआं भरेगा। पसीजर से कई मरसेधू काम पर जाते हैं। उनको विदा तो खाने का डिब्बा दे कर ही होगा न?
सवेरे सवेरे अगर जेसीबी मशीनें और उनके पीछे तीन-चार ट्रेक्टर-ट्रॉलियां गुजरें तो साफ हो जाता है कि गंगा किनारे के खेतों की मिट्टी खोदी और ले जाई जायेगी। इलाका कुछ ही देर में धूल धूल हो जायेगा।
और अगर आस-पड़ोस के किसी खेत में गेहूं की कटी बालियों की स्टैकिंग हो चुकी हो और जमीन पर प्लास्टिक की तिरपाल बिछा दी गई हो तो समझ लीजिये—कुछ ही घंटे में थ्रेशिंग मशीन आयेगी और पूरा वातावरण गेहूं के भूसे के महीन कणों से भर जायेगा। हवा में भूसे के महीन कण तैरने लगेंगे—दूर तक।
गेंहू की कटाई-थ्रेशाई का सीजन है। जहां देखो, वहीं थ्रेशिंग चल रही है। बादल भी गड़गड़ा रहे हैं। कभी भी बेमौसम बारिश हो सकती है। किसान जल्दी से खलिहान सफराना चाहता है। थ्रेशर वाले के रेट बढ़ गये हैं—यही तो उसका सीजन है कमाई का। एक जगह वह काम कर रहा होता है तो उसका मोबाइल लगातार बजता रहता है—अगले ग्राहक तकाज़ा करते रहते हैं, “कब अऊबे भाई, अबेर होत बा… तन्नी क बुंदी परी त सब चउपट होई जाये।”
कल शाम हमारे घर में जैसे आपातकाल लागू हो गया। हमारे घर के पीछे सटा खेत राजन भाई का है। अरुणा खबर लाई—“चच्चा के खेते में तिरपाल बिछि ग बा।” मतलब साफ था—रात में थ्रेशिंग होगी और हमारा घर कुछ ही देर में धूल से अँट जायेगा।
हमने जल्दी-जल्दी खाना निपटाया। सारी खिड़कियां, दरवाजे बंद कर दिये गये। उनके ऊपर पर्दे भी खींच दिये गये। हम लोग सन्न बैठे रहे—इंतजार में कि कब थ्रेशिंग शुरू होगी।
रात साढ़े नौ बजे तक थ्रेशिंग शुरू नहीं हुई थी। हमने हनुमान चालीसा पढ़ी और सोने चले गये।
रात में पत्नीजी उठी होंगी। सवेरे उन्होंने बताया कि रेलवे स्टेशन की प्लेटफार्म की लाइटें धुंधली दिख रही थीं जब उन्होंने हल्का सा खिड़की खोलकर झांका। इसका मतलब—रात में थ्रेशिंग हो चुकी थी।
सुबह जब हम उठे तो मौसम साफ था। धूल बैठ चुकी थी। सूरज चटक उग रहा था।
रात में कुछ हुआ था—थ्रेशिंग भी, और हमारी आशंकाएं भी।
अब घर में शांति थी। हम इत्मीनान से सवेरे की चाय पोर्टिको में पी सकते थे अपनी चिड़ियों और गिलहरियों की संगति में।
राजन भाई का गेहूं सफर गया था।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
3 अप्रैल 2026
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