
नर्मदा दंड परिक्रमा
रींवा के स्वामीदीन पाण्डेय की बिटिया प्रियंका, और उसके पति अंकित—मंडला में रहते हैं। स्वामीदीन जी ने उन्हें कहा कि प्रेमसागर का ध्यान रखें। बात कहने भर की थी, पर उन्होंने उसे जिम्मेदारी की तरह लिया। घर बुलाया, सत्कार किया, और अब जहां भी प्रेमसागर रात में रुकते हैं, वहां पहुंच जाते हैं।
हर रोज तीन किलोमीटर दंड-यात्रा करते हैं प्रेमसागर। शाम को अंकित-प्रियंका अपने बच्चों के साथ आ जाते हैं। कहते हैं—“10–15 किलोमीटर तक तो हम मिलते रहेंगे।”
प्रेमसागर इस बात पर अटक जाते हैं—
“भईया, मंडला पहुंचा तो बस डेढ़ घंटा लेट थी। ये लोग कोंरा में बच्चा लिये खड़े रहे मेरे इंतजार में।”
रास्ते में लोग दंड-यात्रा देखते हैं तो अपने-अपने घरों से बाहर निकल आते हैं। अजूबा लगता है उन्हें यह चलना। एक आदमी ने कहा—“बाबाजी, आप जैसे परकम्मावासी हों तो कितना अच्छा हो।”
पर इसी रास्ते में एक दूसरा दृश्य भी है। प्रेमसागर को गांव वालों ने बताया— एक यात्री ने गुस्से में एक बच्चे के पैर पर लाठी दे मारी थी।
यात्रा पर निकलना आसान है,
पर अपने राग-द्वेष, क्रोध—उन्हें छोड़ना शायद उतना आसान नहीं।
सूरजकुंड से गुरुम कुशवाहा साथ हो लिये हैं। पचास-पचपन के होंगे। तीन बेटे हैं। पत्नी ने बिना झिझक उन्हें परिक्रमा के लिए भेज दिया।
फोन पर गुरुम से मेरी बात हुई तो बोले—
एक लड़के को बिजली का करंट लग गया था। अब ठीक है, नर्मदा माई की कृपा से। वही अब अपने भाई के साथ पुट्टी लगाने के काम में जाने लगा है। यह यात्रा—माई के प्रति आभार है।
उनके दो पड़ोसी साइकिल से निकले हैं—रोज पचास किलोमीटर चलने की ठान कर। गुरुम कहते हैं—“इतना हमसे नहीं होगा। बाबाजी के साथ धीरे-धीरे चलेंगे। उनके लिए पानी ले चलेंगे। साथ में परिक्रमा हो जाएगी।”
प्रेमसागर अकेले चलने वाले आदमी हैं। अब यह साथ कैसे बनेगा—यह देखने की बात होगी। जोड़ी अगर बनेगी तो नर्मदा माई ही बनाएंगी।
दो दिन से वन विभाग के एसडीओ मौर्या साहब भी मिल रहे हैं। बोले—“जितना हो सकेगा, सहायता करेंगे।”
धीरे-धीरे लोग जुड़ते जा रहे हैं।
दंड यात्रा वैसे भी अनूठी है।
अगर कृपा बनी रही—तो यह यात्रा सिर्फ प्रेमसागर की नहीं रहेगी,
कई लोगों की साझा यात्रा बन जाएगी।
नर्मदे हर!
नर्मदे हर! #NarmadaDandParikrama
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