अरुणा का बिजली स्मार्ट मीटर

अरुणा का स्मार्टमीटर रीचार्ज

गांवदेहात डायरी

दलित बस्ती में अब लगभग हर घर में प्री-पेड स्मार्ट मीटर लग चुका है। नियम सीधा है—पैसा जमा करें और बिजली का उपयोग करें; पैसा खत्म तो मीटर खुद ही लाइन काट देगा। पर समस्या यह है कि कई घरों की बिजली कट चुकी है, और लोगों को समझ ही नहीं आ रहा कि पैसा जमा कहां और कैसे करें।

मोबाइल का रिचार्ज सबको आता है। हर नुक्कड़ पर दुकानें हैं—पैसा दीजिये, दो-पांच रुपये फीस दीजिये, और रिचार्ज तुरंत। पर बिजली के लिये ऐसी कोई व्यवस्था दिखती नहीं।

पिंटू ढाई हजार रुपये लेकर सब-स्टेशन गया। वहां से उसे औराई भेज दिया गया—“वहीं दफ्तर वाले देखेंगे।” औराई में भी काम न बना तो कहा गया कि लखनऊ जाना पड़ेगा। अजीब स्थिति है—बिजली कट जाए तो पांच सौ किलोमीटर की यात्रा करो! यहां कोई ऐसा नहीं जो ठीक से बता दे कि करना क्या है।

मेरी नौकरानी अरुणा की भी बिजली कट गई। तीन दिन से वह परेशान थी। गर्मी बढ़ने लगी है, मच्छर भी हो गये हैं—रात की नींद हराम। उसका मरसेधू कारपेट सेंटर में काम करता है और शादी-ब्याह में बाजा भी बजाता है। उसके पास इतना समय नहीं कि बिजली दफ्तरों के चक्कर लगाता फिरे। घर में इस बात पर झांवझांव हुई, पर हल कुछ नहीं निकला।

आखिरकार अरुणा ने यह समस्या मेरी पत्नीजी को बताई, और उन्होंने मुझे।

मैंने यूपीपीसीएल की वेबसाइट देखी। स्मार्ट मीटर के नियम समझने की कोशिश की। कुछ जानकारी इधर-उधर से मिली। अंततः यूपीपीसीएल का ऐप डाउनलोड किया।

अरुणा का मोबाइल नंबर डालकर देखा तो उसका बिजली खाता खुल गया। उसमें ₹1400 एक्सेस खर्च दिख रहा था—यानी उतना बकाया। उसी के कारण मीटर ने बिजली काट दी थी। अब उसे लगभग ₹1800 जमा करने थे, जिससे कनेक्शन बहाल हो सके, और साथ ही आगे के उपयोग के लिये कुछ प्री-पेड बैलेंस भी डालना था।

हमने घर बैठे ₹2600 का ऑनलाइन भुगतान कर दिया। उसमें से लगभग 25% रकम पुराने मीटर के एरियर में समायोजित हो गई, और बाकी का रिचार्ज हो गया।

करीब दस मिनट बाद अरुणा ने घर फोन कर चेक किया— बिजलिया आई गई?
घर से उसके लड़के ने बताया—“आ गई है।”

अरुणा को पूरा यकीन नहीं हुआ— पंखवऊ चला के देख, चलत बा?

फिर कुछ क्षण बाद उसके स्वर में जो राहत आई, वह साफ सुनाई दी— फुआ, कुलि चलत बा!

तीन दिन बाद उस घर में पंखा चला होगा, और शायद उसी के साथ थोड़ी शांति भी लौटी होगी।

घर बैठे स्मार्ट पेमेंट से समस्या का समाधान हो गया। अब लगता है कि आगे भी अरुणा हमारे घर को ही बिजली रिचार्ज का केंद्र मानेगी। और अगर उसकी देखा-देखी बस्ती के और लोग भी आने लगे, तो बैठे-ठाले मुझे “स्मार्ट-मीटर रिचार्ज सेंटर” खोलना पड़ेगा।

गांवदेहात में तकनीक तो पहुंच जाती है, पर उसके साथ सही जानकारी नहीं पहुंचती। बिजली विभाग ग्राहक-मित्र (customer-friendly) तो बिल्कुल नहीं दिखता। लोग भटकते रहते हैं, समाधान खोजते हुए।

और जब कहीं रास्ता नहीं मिलता, तो कई बार लोग मजबूरी में तार जोड़कर “कटिया” लगाने को विवश हो जाते हैं।

कल का यह छोटा-सा प्रकरण था। पर रात में अरुणा और उसका परिवार तीन दिन बाद पंखे के नीचे चैन से सोया होगा—यह सोच कर अच्छा लगता है।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
7 अप्रैल 2026

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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