पैदल चलती महिलायें 

धूमिल यादें

तब और अब का समय 

मेरे घर के सामने की सड़क से भांति-भांति के लोग आते-जाते हैं। हर एक के पास अपनी कहानी होगी। सवेरे बनारस और प्रयागराज जाने वाली पैसेंजर पकड़ने वाले लोग गुजरते हैं—तेज़ चाल चलते हुए। कभी गोद में एक बच्चा लिये और दूसरे को लगभग घसीटती महिलायें दिखती हैं। कभी सिर पर बेलपत्र और दूब के गीले गट्ठर लिये औरतें।

सुबह के समय हंसिया और झोला/कपड़ा लिये महिलायें खेत की निराई-कटाई या ताल से चारा काटने के ध्येय से जाती दिखती हैं। लौटते समय सबके सिर पर घास के गट्ठर होते हैं। शाम को मेला-बाजार से लौटती महिलायें होती हैं—हाथ में सब्ज़ी की पन्नियां लटकाये।

आज दो औरतें हमारे घर के सामने रुक कर देर तक बातें करती रहीं। फिर दोनों अलग-अलग दिशाओं में चली गईं। उन्हें देख कर पत्नीजी की अपने बचपन की धुंधली स्मृतियां उभर आईं।

उनका ननिहाल गंगापुर में है—बनारस से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर। उनकी नानी उन्हें और उनके छोटे भाई को रिक्शे से अक्सर बनारस ले जाया करती थीं। गंगापुर की चमरऊटी में कुछ रिक्शेवाले थे; एक दिन पहले ही तय हो जाता कि अगले सवेरे बनारस जाना है।

ऐसे ही एक बार वे बनारस जा रहे थे कि रास्ते में एक पेड़ की छाया में बैठी एक महिला दिखी। कुछ पहचानी-सी लगी। नानी ने रिक्शेवाले से कहा—“तनी रोकु, अमोला लगत बा।”

अमोला गर्भवती थी—छः-सात महीने का गर्भ। गंगापुर की ही थी। पैदल ही बनारस के लिए निकल पड़ी थी। थकी तो रास्ते में आराम करने रुक गई।

गर्भवती स्त्री और पंद्रह किलोमीटर की पैदल यात्रा—तब यह असंभव नहीं था। आज तो ऐसा दृश्य अजूबा लगे।

नानी ने स्नेह भरी गाली देकर अमोला को बुलाया, अपने पास रिक्शे पर बिठाया और नीचे बैठे दो छोटे बच्चे—मेरी पत्नी और उनका भाई।

यह आज से साठ-पैंसठ साल पहले का समय था। तब गरीबी भी थी और साधनों की कमी भी। लोग उस कमी को अपने श्रम और इरादों से पूरा करते थे।

अमोला के यहां तो गरीबी कोई घटक नहीं हो सकता था। उसके पति रेलवे में काम करते थे। उसके साथ तो आदत का ही मामला रहा होगा — लोग, यहां तक कि गर्भवती महिलायें भी पांच-आठ कोस चलना सहज मानते रहे होंगे।

पर आज की अपनी मजबूरियाँ भी हैं। दूरी वही है, पर समय सिमट गया है। काम के घंटे बँधे हैं, जिम्मेदारियाँ फैली हुई हैं, और शरीर पर भी उतना भरोसा नहीं रहा जितना पहले था। सुरक्षा, सुविधा और जल्दबाज़ी—तीनों मिलकर हमें पैदल चलने से दूर ले आये हैं।

अब तो दो किलोमीटर चलने के लिए भी ऑटो खोजा जाता है।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
11 अप्रेल 2026

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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