मैं लेखक नहीं हूं (शायद)


win_20170211_07_58_12_proमेरी ब्लॉग पोस्टों में शायद शब्द का बहुत प्रयोग है। पुख्ता सोच का अभाव रहा है। लिखते समय, जब कभी लगा है कि भविष्य में अमुक विषय में अपनी सोच को स्पष्टता दूंगा (सोच को फ़र्म-अप करूंगा), तो शायद का प्रयोग करता रहा हूं। बतौर एक टैग के।

अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई में प्रॉबेबिल्टी और सांख्यिकी (Probability & Statistics) मेरा प्रिय विषय रहा है। समय के साथ इन्जीनियरिंग भुला दी, पर हर परिस्थिति में अपने विचार को तोल कर उसे एक प्रॉबेबिल अंक देने की प्रवृत्ति बनी है – आज भी। अत: जब यह लिख रहा हूं कि “मैं लेखक नहीं हूं” तो उसको तोल रहा हूं कि कितने प्रतिशत लेखक हूं मैं – और वह अंक 50% से कम ही बन रहा है।

रिटायरमेंट के समय मन में था कि बहुत कुछ लिखूंगा। अब सवा साल होने को है और लेखन के नाम पर लगभग शून्य है। पहले यह था कि इंटरनेट की दशा खराब थी घर में। ब्लॉग पर जो पहले लिखा था, उसका अवलोकन और सम्पादन नहीं हो पा रहा था। सो ब्लॉग से मन उचट गया। यद्यपि समय का उपयोग पढने और साइकल ले कर अपना गंवई परिवेश देखने में बहुत हुआ। वह अनुभव कम ही लोगों को होता होगा। उस दौरान सोचा भी बहुत। लगता था कि अगर वह सब लिखा जाये तो महत्वपूर्ण दस्तावेज – पुस्तक – बन सकता है। ऐसी पुस्तक जिसे शायद अच्छी खासी संख्या में पाठक मिल सकें।

पर लिखा कुछ भी नहीं।

सो, तकसंगत तरीके से कहूं तो मैं लेखक नहीं हूं। पर मैं यह भी जानता हूं कि जिन्दगी; जो कुछ भी है; तर्कसंगत जैसी कोई चीज नहीं है। जिन्दगी स्पोरेडिक, जर्की, मनमौजी और जुनूनी चीज है। कब कैसी निकलेगी; कब कौन सी राह पकड़ लेगी; कहा नहीं जा सकता। सो पोस्ट की हेडिंग में शायद शब्द का प्रयोग किया है मैने।

यह भी अहसास होता है कि जिन्दगी की दूसरी पारी में समय पहली पारी जितना नहीं है। पहली पारी से अधिक अनुभव है। पर पहली पारी की ऊर्जा नहीं है शायद। और ऊर्जा ऑवर-ग्लास से बहुत ज्यादा झर जाये, उसके पहले उसका पर्याप्त दोहन कर लेना चाहिये।

मैं ट्विटर पर अपनी पिन की हुई ट्वीट पर एक नजर फिर डालता हूं –

“अभी तो इस बाज की असली उड़ान बाकी है। अभी तो इस परिन्दे का इम्तिहान बाकी है। अभी अभी मैने लांघा है समन्दर को। अभी तो पूरा आसमान बाकी है।”

दूसरी पारी के आसमान पर बहुत कुछ लिखना है। पर कैसे लिखोगे जीडी, अगर लेखक नहीं हो? तुम्हारे शब्दकोष में मात्र कुछ हजार शब्द हैं। शायद दो हजार से कम। तुम्हारी एकाग्रता – कंसन्ट्रेशन भी गौरैय्या की तरह है। इधर उधर फुदकती है। पहले अपना व्यक्तित्व बदलो बन्धु।

यह लिख रहा हूं कि शायद इसी से व्यक्तित्व की शायदीयता खत्म हो सके। शायद विचार फुदकने की बजाय फर्म-अप होने लगें।

लिखना है। बाज को उडान भरनी है। शायद

चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के साथ


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समदर्शी डेमू को अटॆण्ड करते हुये।

लेवल क्रासिंग गेट पर मैं अक्सर निकलता हूं, बटोही (साइकल) के साथ। जब गेट बन्द रहता है तो इन्तजार करता हूं। मेरे सामने साइकल/मोटरसाइकल वाले अपने वाहन तिरछा कर पार हो लेते हैं। चार पहिया वाहन और ट्रेक्टर वाले हॉर्न बजाते रहते हैं। शुरू में गेटमैन ही कहता था कि साहब गाड़ी आने में अभी समय है। आपकी साइकल डंकवा दूं? मैं मना कर दिया करता था। नहीं चाहता था कि कोई यह कहे कि रिटयर्ड रेल का अफ़सर समपार फाटक के नियम पालन नहीं करता।
अब सब समझ गये हैं कि यह व्यक्ति जैसा है, वैसा ही रहेगा।

कई बार वह गेट पर ड्यूटी करते दिखता है। यदा कदा नमस्ते भी कर देता है। थोडा स्थूल है। अधेड़। मेरी तरह उसे भी चलने में दिक्कत होती है – गठिया का मरीज लगता है। काम धीरे करने के कारण कभी कभी वाहन चालक ज्यादा हॉर्न बजाते हैं। पर सामन्यत: इस गेट पर यातायात कम है, सो कोई खास दिक्कत नहीं आती उसे काम करने में।

आस पास के गांव वाले उसके पास अड्डा जमाये रहते हैं। उसका भी मन-मनसायन होता होगा और गांव वाले तो, लगता है, रेल की नौकरी न मिल पाने के कारण यूं ही आसपास रह रेल का काम करने की अपनी साध पूरी करते नजर आते हैं। कभी कभी तो कोई गांव वाला उसकी उपस्थिति में ट्रेन से ऑलराइट सिगनल आदान-प्रदान का यत्न भी करता है।


आज जैसे ही मैं गेट पर पंहुचा, वह गेट बन्द कर रहा था। उसने नमस्ते की और कहा कि थोड़ी देर उसके पास बैठ लूं – जब तक गाड़ी निकले।

कौन सी गाड़ी है?

डेमू। 

वह मेरे लिये स्टूल ले कर आया। टूटा था। “इम्प्रेस्ट से खरीदने को कहा है बड़े बाबू को। खरीदते ही नहीं।” मैं सीमेण्ट के बने चबूतरे पर बैठ गया।

चतुर्थ श्रेणी के रेल कर्मियों के पास इस तरह बैठना विगत कई दशकों में नहीं हुआ। जब मैं जूनियर स्केल का अफ़सर था – सन् 1985-86 के आसपास, तब यार्ड में शण्टिंग कराते समय यार्ड मास्टर और प्वॉइण्ट्समैन आदि से बहुत मेल जोल रहता था। उनके साथ चाय भी पीता था और यदा कदा उनके साथ भोजन भी किया। याद आता है कि बारिश के मौसम में उन कर्मियों को बरसाती नहीं मिली थी तो यार्ड से ही मण्डल रेल प्रबन्धक को एक तल्ख मैसेज भेजने के कारण डीआरएम महोदय ने मुझे अपने चेम्बर में बुलाया था। डांटने लगे तो मैने कहा था, कि प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने के लिये डांट भले लीजिये, पर उन कर्मियों केलिये बरसाती और गम-बूट तो जल्दी दिलवा दीजिये। … पता नहीं , डीआरएम साहब ने मुझे क्या समझ पसन्द किया। वे बहुधा मुझसे बात करने लगे – सबसे सीनियर और सबसे जूनियर अधिकारी का तालमेल।

चबूतरे पर बैठ मैने इस गेट-कर्मी के बारे में पूछा। नाम है प्रेम कुमार समदर्शी। मण्डुआडीह (बनारस) से आता जाता है वह। गठिया का मरीज है – सो घर से आने जाने में दिक्कत होती है। लिहाजा आने पर लम्बे समय तक यहीं रुक जाता है। मैं आशा करता हूं कि सेफ़्टी के आला अफ़सर यह ब्लॉग नहीं पढ़ते होंगे – अन्यथा व्यर्थ की यहां वालों को काम और रेस्ट के नियमों में पेरने लगेंगे।

डेमू आ गयी थी। समदर्शी ऑलराइट दिखाने लगा। गाड़ी लूप लाइन में जा रही थी। “लूप का स्टार्टर बहुत दूर है, साहब। जब तक पार नहीं करेगी, गेट नहीं खुल सकता। पर लोग हल्ला मचाने लगते हैं।”

गेट खुला। मैं अपनी साइकल संभाल घर चला आया। लगा, कि यदा कदा रेल कर्मियों के साथ कुछ समय गुजारना चाहिये मुझे। यहां कटका के सभी प्रकार के रेल कर्मियों के साथ – सिगनल, बिजली, ट्रेफ़िक, इंजीनियरिंग… सभी के साथ।


सोलर लाइट 


गांव में सोलर लाइट लग रही हैं – स्थानीय सांसद के माध्यम से. पावरग्रिड कार्पोरेशन की कार्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहद. 

सड़क और गलियों के यातायात को देख कर लगाई जाएं तो जहां लगेंगी, वहां से रात में नशेड़ी लोग उसकी बैट्री चुरा लेने में समय नहीं लगाएंगे. लिहाजा यह समझौते के आधार पर किसी न किसी के दरवाजे पर लगाई जा रही हैं  – जिससे सड़कें भी रोशन रहें और उस व्यक्ति का परिसर भी.

ग्रामीण मुफ्त में जहर भी मिले तो उसके लिए जद्दोजहद करेगा. यह तो सोलर लाइट है. अतः अपने अपने दरवाजे पर सोलर लाइट झटकना प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है ग्रामीण लोगों ने. कोई नशेड़ियों से सोलर लाइट की मुक्ति की बात नहीं करता. वह कठिन काम जो है. 

इस मुफ्त वृत्ति से भारत का मुक्त विकास होगा. 

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