खराना डीह से बूढ़ा पुष्कर


11-12 जुलाई 2023

नमक की झील के बगल के गांव खराना डीह डूंगरी में रात विश्राम के लिये सड़क किनारे की रोडवेज हॉल्ट की बेंच मिली थी। 11 जुलाई को सवेरे प्रेमसागर उठ कर आगे के लिये रवाना हुये। कुछ किलोमीटर चलने के बाद सीतारामपुरा के किशन जी ने अपने घर पर उन्हें चाय पिलाई।

सीतारामपुरा के किशन जी ने अपने घर पर उन्हें चाय पिलाई।

आगे नक्शे में देखने पर रूपन या रूपनगढ़ नदी की क्षीणकाय रेखायें दिखती हैं। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे रूपनगढ़ नदी पार करते समय देखें कि नदी का क्या हाल है। उसमें पानी है या नहीं। यह मुख्य दो नदियों में से एक है जो साम्भर झील को जल प्रदाय करती है। बरसात का मौसम है और इस साल राजस्थान में सामान्य से लगभग दुगुनी बारिश हुई है। ऐसे में भी अगर रूपनगढ़ नदी चार्ज नहीं हुई और पानी नहीं हुआ तो यह साम्भर झील के लिये अशुभ संकेत है।

एक चाय की दुकान पर लोगों ने बताया कि नदी अब नहीं रही। कई साल हो गये उसमें पानी नहीं आता। आगे जब नदी का इलाका पार किया तो फिर मैंने पूछा – नदी दिखी?

“नहीं भईया। कोई पानी कहीं नजर नहीं आया। कोई पुल भी नहीं मिला।”

रूपनगढ़ कस्बे से गुजरते हुये करीब पच्चीस किमी चल चुके थे। रूपनगढ़ का किला किशनगढ़ के महाराजा रूपसिंह ने सन 1648 में बनाया था। यह जाट बहुल स्थान है। प्रेमसागर को चलते हुये पच्चीस किमी के लगभग हो गया था। उन्होने रात्रि विश्राम के लिये धर्मशाला की तलाश की। एक धर्मशाला तो मिली पर उसको प्रबंधकों ने गोदाम में तब्दील कर दिया था। अन्य स्थान होटल जैसे थे। टूरिस्ट लोगों के लिये। उनके रेट भी ज्यादा थे। प्रेमसागर आगे बढ़ गये।

आगे उन्हें रूपनगढ़ नदी के बगल से और कहीं कहीं उससे गुजरते हुये चलना था। मैंने फिर पूछा – नदी कहीं दिखी?

सिंगला बांध। यह रूपनगढ़ नदी का पानी सिंचाई के लिये रोकने हेतु बनाया गया है। पर बारिश के इस मौसम में भी नदी में पानी तो है ही नहीं।

“नहीं भईया। कहीं पानी नजर नहीं आया। एक जगह सिंगला बांध दिखा। इस बांध से नदी का पानी रोक कर लोग सिंचाई करते थे। पर बताया कि कई साल से तो पानी इकठ्ठा हुआ ही नहीं। जब बांध पूरा भर जाता था तो पानी आगे साम्भर झील के लिये रवाना होता था। पर इस साल तो पानी था ही नहीं।”

देश में सैंकड़ों-हजारों बरसाती छोटी नदियां या तो मर गयी हैं या नालों में रूपांतरित हो गयी हैं। रूपनगढ़ नदी भी उनमें से एक होने जा रही है। प्रेमसागर के माध्यम से साम्भर झील की इस प्रमुख नदी की दशा का पता चला।

सलेमाबाद में निम्बार्काचार्य पीठ

दस इग्यारह किलोमीटर आगे सलेमाबाद में निम्बार्काचार्य पीठ मिला। कोई किला या हवेली किसी राजा ने इस पीठ को दे दिया था। बहुत सुंदर लगता है वह स्थान। यहां पर सब सुविधायें हैं। पीठ का अपना प्रिंटिंग प्रेस है। संस्कृत महाविद्यालय (विश्वविद्यालय) है। हॉस्टल, पुस्तकालय, वाचनालय, गौशाला, औषधालय आदि भी संस्थान में है। प्रेमसागर को इक्यावन शक्तिपीठ का पदयात्री जान कर वहां के प्रबंधक महोदय ने एक अटैच्ड बाथरूम वाला कमरा उन्हें दे दिया। भोजन भी मिला और पैसा भी नहीं देना पड़ा।

निम्बार्काचार्य पीठ का दृश्य

द्वैताद्वैत (भेदाभेद) मत का यह पीठ सम्प्रदाय के अनेक गुरुओं की परम्परा वाला है। वर्तमान पीठाधीश्वर श्री श्रीजी महराज और उनके उत्तराधिकारी श्री श्यामशरण देव जी नामित हैं। प्रेमसागर वहां रात होने पर पंहुचे थे। ज्यादा देखने का अवसर नहीं मिला। रात गुजारने पर सवेरे वे रवाना हो गये पुष्कर के लिये।

बारह जुलाई को लगभग इग्यारह बजे प्रेमसागर के साथ कुंचील गांव से गुजरते हुये साम्प्रदायिक दुर्घटना हो गई। उसके बारे में अलग से ब्लॉग पोस्ट लिख दी गयी है। कुंचील से रामस्वरूप गुर्जर जी उन्हें बचा कर निकाल लाये और फिर अपनी मोटरसाइकिल से दस किलोमीटर आगे छोड़ा। रामस्वरूप जी ने प्रेमसागर से कुछ आर्थिक सहायता की भी बात की, पर प्रेमसागर ने मना करते हुये उनकी सहायता के लिये दिल से धन्यवाद दिया।

शाम तक प्रेमसागर पुष्कर पंहुच गये। उन्होने बूढ़ा पुष्कर के दर्शन भी कर लिये। एक धर्मशाला में डेरा भी जमाया दो दिनों के लिये।

“बूढ़ा पुष्कर में एक छोटी झील/तालाब है भईया। उसमें मछलियां जानती हैं कि उनें कोई खतरा नहीं। वे पास तक चली आती हैं। वहीं एक मंदिर भी है। उसके भी दर्शन किये। और कुछ खास नहीं है बूढ़ा पुष्कर में। कल पुष्कर में मंदिरों के और शक्तिपीठ के दर्शन करूंगा।” – प्रेमसागर ने बताया।

बूढ़ा पुष्कर।

ये दो दिन अच्छे ही थे सिवाय कुंचील की दुर्घटना के। उस दुर्घटना ने झकझोर जरूर दिया प्रेमसागर को। पर वह भी शायद मातृशक्ति और महादेव की कोई परीक्षा हो। प्रेमसागर तो हर घटना को उसी प्रकार से लेते हैं।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
*****
प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

तुम्हारे पहनावे से हमारे बच्चों को डर लगता है!


12 जुलाई 2023

प्रेमसागर का शाक्त पहनावा अजीब तो है। लाल लबादा। बच्चे डर सकते हैं। मुझे अपना बचपन याद आता है। मुझे साधू और पुलीस के वेश से डर लगता था। घर में एक डोम आता था गांव में। वह डाक हरकारा था। खूब तेज चलता था और हाथ में एक बल्लम लिये रहता था। साधू, पुलीस, होमगार्ड या उस डोम को देख मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी। मैं अपनी अम्मा की साड़ी में छिप जाता था।

पर मेरे भय को देख कर कभी किसी घरवाले ने साधू, दरवेश, पुलीस, होमगार्ड या डोम को गलत नहीं ठहराया। उल्टे मेरी अम्मा ने मुझे ही बताने की कोशिश की कि वे लोग अपना काम करते हैं।

हरी चादर लिये वे दरवेश मेरे ननिहाल में बहुधा आया करते थे। बगल में ही जुलाहों की बस्ती थी। वहां मांगते थे तो नानी के घर से भी सीधा-पिसान पा जाते थे। दरवेशों और साधुओं – दोनों को बराबर ट्रीट किया जाता था।

अब पता नहीं क्या हो गया है। प्रेमसागर कुंचील की मियां बस्ती से गुजर रहे थे। दो औरतें उन्हें कहने लगीं कि यहां से क्यों जा रहे हो? हमारे बच्चे डर रहे हैं। औरतों के कहने के साथ लोगों की भीड़ भी जुटने लगी। बाद में प्रेमसागर ने बताया – “पचीस तीस लोग जमा हो गये। और भी बढ़ते। वह तो, भला हो, दो लोग जो पहले मुझे जाते देखे थे, आ कर मुझे वहां से निकाल कर ले गये। भईया, बहुत खराब बोल रहे थे वे भीड़ वाले लोग। बोले ये सड़क तुम्हारा है क्या जो चले आ रहे हो? सड़क मोदी या मोदी के बाप का है क्या? हम तो भईया कोई जवाब नहीं दिये। जवाब देते तो बात बढ़ता ही। हमने तो बस यही कहा कि हम पदयात्री हैं और पुष्कर जा रहे हैं।”

रामेश्वर गुर्जर जी

“वो दोने सहायता करने वाले लोग हमें वहां से निकाल कर अपने इलाके में एक जगह बिठाये। फिर वहां से मैं रवाना हुआ आगे के लिये। करीब चार किमी चला था कि पीछे से उन दोनों में से एक सज्जन – रामस्वरूप गुर्जर – मोटर साइकिल से आये और मुझे बिठा कर करीब दस किलोमीटर आगे छोड़ दिये। वो बोले कि “बाबा यहां से आगे चले जाइये, यहां से सब सेफ है। हमारे गांव कुंचील में पचास घर गुर्जरों के हैं बाकी 2000 घर मिंया बस्ती है। पर हम पचास ही उनपर भारी हैं। आज हम वापस जा कर फैसला करते हैं। ज्यादा करेंगे तो काट डालेंगे हम। उनकी धौंस नहीं चलती हम लोगों पर।””

साम्भर झील के बगल से प्रेमसागर 11 जुलाई को निकले थे। रूपनगढ़ पार कर सलेमाबाद में निम्बार्काचाय के मठ में 11-12 जुलाई की रात गुजारी। वहां से आज निकल कर कुंचील से गुजर रहे थे कि यह काण्ड हो गया। वह यात्रा विवरण अलग से लिखूंगा। निम्बार्काचार्य का मठ बहुत सुंदर है। उसके बारे में कुछ जानकारी जुटानी है। वह पोस्ट एक दो दिन में होगी।

फिलहाल तो यह बखेड़ा लिखना था।

प्रेमसागर सुरक्षित और स्वस्थ हैं। शाम को बूढ़ा पुष्कर घूम लिये।

प्रेमसागर को गूगल नक्शे के रास्ते ने गलत जगह घुसा दिया उनको। गूगल यह भेद नहीं करता कि कहां हिंदू हैं और कहां मुसलमान। कहां लोग उदग्र हैं और कहां शान्तिप्रिय। इस आशय का फीडबैक भी गूगल मैप को लेना चाहिये और उस हिसाब से रास्ता सुझाना चाहिये।

बहरहाल, प्रेमसागर सुरक्षित और स्वस्थ हैं। शाम को वे बूढ़ा पुष्कर घूम लिये। कल 13 जुलाई को मणिबंध शक्तिपीठ और पुष्कर के आसपास के अन्य मंदिरों के दर्शन करेंगे।

यही आशा की जाती है कि आगे कोई विधर्मी बच्चे प्रेमसागर से न डरें और डरें भी तो उनके माई-बाप उसे ले कर धार्मिक वैमनस्य न बोयें। इस देश में सब भय से मुक्त रहें और निर्बाध आ जा सकें। सड़क किसी के बाप की न हो!

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

साम्भर झील के किनारे किनारे


10 जुलाई 2023

फुलेरा के पश्चिमी ओर पड़ती है साम्भर झील। लगता नहीं कि प्रेमसागर को मालुम था भारत की इस सबसे बड़ी नमकीन पानी की झील के बारे में। पानी देख कर उन्होने (लगभग) उत्तेजना से मुझे बताया – “भईया राजस्थान की पहली नदी देखी मैंने। कितना बढ़िया हो कि इसपर बांध बना कर नहरें निकाली जायेंं और सिंचाई हो सके। लोग इसमें बड़ी झील भी बताते हैं। शायद बांध बना कर बनी है। नलियासर झील बताते हैं। कुछ साम्भर झील भी बताते हैं। … लोगों ने बताया कि नहर से हनुमानगढ़ में तो पानी आ गया है। इस नदी से भी हो सके तो…”

नलियासर झील के किनारे

प्रेमसागर को पता नहीं रहा होगा कि साम्भर झील को पानी चार छोटी बरसाती नदियों से मिलता है। इसमें मुख्य दो ही हैं – मेंधा और रूपनगढ़। मेंधा उत्तर से इस झील में आती है और रूपनगढ़ दक्षिण से। पश्चिम से पूर्व की ओर लम्बाई में है यह झील। इसके पश्चिमी भाग को पूर्वी से अलग करता एक बलुआ पत्थर का बांध है। जमीन के नमक से जब पश्चिमी भाग का पानी पर्याप्त खारा हो जाता है तो बांध खोल कर पूर्वी भाग में पानी/ब्राइन भरा जाता है। फिर पूर्वी भाग में पानी वाष्पित हो कर नमक बनता है। उस नमक को ले जाने के लिये रेल लाइन भी है – अंग्रेजों के जमाने से। रेल लाइन फुलेरा जंक्शन स्टेशन से जुड़ी है।

नमक बनाने के लिये एक सरकारी कम्पनी है – साम्भर साल्ट लिमिटेड (हिंदुस्तान साल्ट लिमिटेड की सबसिडियरी)। यह कम्पनी बहुत कम उत्पादन कर पाती है। वहीं प्राइवेट कम्पनियां खूब नमक बना रही हैं। वे अवैध कुयें खोद कर नमकीन पानी निकाल नमक बनाती हैं। उनको नमक भरपूर मिल रहा है और सरकार को चूना लग रहा है।

प्रेमसागर को इन सब की पूर्व जानकारी नहीं थी। उनको नहीं मालुम था कि साम्भर झील को जल देने वाली चार नदियां बस उतनी ही जल चली हैं जिनसे झील भर जाये। वे सिंचाई के काम नहीं आ सकतीं। वे सतलुज और व्यास जैसी नहीं हैं। सतलुज-व्यास पर हरीके बांध है जिससे राजस्थान नहर (कालांतर मेंं इंदिरा नहर) पंजाब से राजस्थान आ कर दस मरुस्थलीय जिलों को सिंचित कर रही है।

झील के पास सड़क पर भेड़ों का रेवड़

प्रेमसागर की यात्रा नामी लेखकों की नदियों या भूखण्डों की यात्रा जैसी नहीं है। उन लोगों को तो अखबार या पुस्तक पब्लिशिंग कम्पनियों से अकूत फण्डिंग मिलती है। वे लोग एक टीम रख कर जगह के बारे में पर्याप्त बैकग्राउण्ड शोध भी करते हैं। उनको यह फिक्र नहीं करनी होती कि शाम को कहां डेरा मिलेगा, कहां भोजन मिलेगा।

पर प्रेमसागर की यह यात्रा एक मायने में अभूतपूर्व है – और शायद ही कोई इसे दोहरा पायेगा। बिना किसी संसाधन के, बिना पुख्ता भौगोलिक-ऐतिहासिक-सांस्कृतिक जानकारी के; अकेले प्रेमसागर दस बारह हजार किमी यात्रा कर भारत देख चुके हैं। मैं हमेशा उनसे ईर्ष्या करता हूं कि काश उनकी जगह मैं होता! पर मैं हो नहीं सकता। मुझमें कष्ट सहने की वह क्षमता ही नहीं है। मैं अगर निकला होता तो पचीस पचास किलोमीटर चल कर वापस हो लिया होता।

झील किनारे एक गांव में एक किशोर प्रेमसागर को रोक कर केले खिलाये और दूध पिलाया।

झील किनारे एक गांव, सांपों की ढाणी, में एक नौजवान प्रेमसागर को रोक कर केले खिलाये और भैंस का दूध, शहद मिला कर पिलाया। पिछले दिन फुलेरा में वह मिला था जहां प्रेमसागर चाय पीने के लिये रुके थे। प्रेमसागर से कुछ बातचीत हुई थी। उसे लगा था कि प्रेमसागर उसके गांव से गुजरेंगे। एक दर्जन केले का उसने इंतजाम किया था। प्रेमसागर को सड़क पर आते देख उसने रोका और घर पर बुला कर केला और दूध सामने रखा। “एक दर्जन केला था भईया। उतना कहां खाता। छ केला उन लोगों को ही खाने को दिया। उसके साथ न न करते हुये भी करीब एक किलो दूध उन लोगों ने मुझे पिला दिया। चित्र में नौजवान खड़ा है। पास में उसके पिताजी या दादा जी हैं। दादा जी ही होंगे। उनके माथे पर उम्र की रेखायें हैं और लम्बे कानों में कुण्डल। इस प्रकार का आतिथ्य कम ही मिलता है। राजस्थान में वह अपेक्षाकृत ज्यादा मिल रहा है।

नौजवान का नाम है श्याम यादव। मानस में प्रेम और श्रद्धा को ले कर शबरी का उदाहरण है। एक उदाहरण यह प्रत्यक्ष है – सांपों की ढ़ाणी के श्याम यादव जी का! जय हो!

झील के किनारे यह गड़रिया। प्रेमसागर ने चित्र भेजा।

झील किनारे एक गड़रिया के चित्र भेजे प्रेमसागर ने। उनका साफा केसरिया रंग का है और शानदार लग रहा है। प्रेमसागर ने बताया कि यहां वृद्ध लोग सफेद साफा बांधते हैं। जवान लोग रंगीन। ये सज्जन तो अधेड़ लगते हैं। पर अभी भी अपने को जवान समझते हैं। उनके एक हाथ में लाठी और दूसरे में शायद छाता है।

सांभर झील, लूनी नदी और जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर का मरुस्थल – ये महत्वपूर्ण भौगोलिक प्रतीक हैं राजस्थान के। उनमें से एक – साम्भर झील से आज आकस्मिक परिचय हुआ प्रेमसागर का। यूं मरुस्थल का कुछ अहसास तो उन्हें हो ही गया है। पुष्कर के पास की आरावली उपत्यका से निकली लूनी नदी शायद उनके रास्ते न आये। प्रेमसागर को तो शक्तिपीठ जाना है। मेरे लिये यह साम्भर झील देखना बड़ी बात है। अपनी रेल सेवा के दौरान मैं यह आसानी से कर सकता था। पर मैं तो अपने चेम्बर से बाहर निकलता ही न था। आज भी, यात्रा प्रेमसागर कर रहे हैं। मैं तो अपने कमरे के कोने में लैपटॉप पर बैठा हूं! :lol:

झील के पास खराना डीह डूंगरी गांव के मठ के महाराज विश्रामपुरी जी। इनके आश्रम में रात बिताने की जगह मिली प्रेमसागर को।

झील के पास डीह डूंगरी गांव के विश्रामपुरी जी महाराज का एक चित्र भेजा प्रेमसागर ने। विश्रामपुरी जी झील के किनारे एक बोरी बिछा कर बैठे हैं। अपने को जूना अखाड़ा का बताते हैं। उनके पास एक कुटिया भर है। प्रेमसागर को सोने के लिये सड़क किनारे एक बैंच मिली। उसपर गमछा बिछा कर रात गुजारी। अपने बैग का तकिया बनाया। भोजन के लिये विश्रामपुरी जी ने चरखी (चावल) में थोड़ी चीनी, नमक और हल्दी मिला कर बनाया था। वही खाया। “मैने कहा भी कि महराज यह क्या बना रहे हैं। पर जो बना था, वही खाये। और क्या करते भईया?”

रात के भोजन के रूप में हल्दी-चीनी-नमक मिला चावल और सोने के लिये बेंच पर गमछा बिछा कर बैग का तकिया लगाया बिस्तर! यही सही पदयात्रा है।

सोने के लिये सड़क किनारे की ऐसी बेंच मिली प्रेमसागर को।

प्रेमसागर ने जो आंकड़ा भेजा उसके अनुसार दिन भर में वे बीस किलोमीटर चले। कुल 29 हजार कदम। यह ज्यादा नहीं है, फिर भी ठीक ही है। आगे मणिबंध शक्तिपीठ अभी पचहत्तर किमी दूर है। करीब तीन दिन की यात्रा। देखें महादेव और अन्नपूर्णा माई किसके माध्यम से कैसी सहायता करते हैं। तीन चार दिन रहने खाने को कैसे मिलता है! महादेव के ही भरोसे चल रहे हैं प्रेमसागर!

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
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