साम्भर झील के किनारे किनारे


10 जुलाई 2023

फुलेरा के पश्चिमी ओर पड़ती है साम्भर झील। लगता नहीं कि प्रेमसागर को मालुम था भारत की इस सबसे बड़ी नमकीन पानी की झील के बारे में। पानी देख कर उन्होने (लगभग) उत्तेजना से मुझे बताया – “भईया राजस्थान की पहली नदी देखी मैंने। कितना बढ़िया हो कि इसपर बांध बना कर नहरें निकाली जायेंं और सिंचाई हो सके। लोग इसमें बड़ी झील भी बताते हैं। शायद बांध बना कर बनी है। नलियासर झील बताते हैं। कुछ साम्भर झील भी बताते हैं। … लोगों ने बताया कि नहर से हनुमानगढ़ में तो पानी आ गया है। इस नदी से भी हो सके तो…”

नलियासर झील के किनारे

प्रेमसागर को पता नहीं रहा होगा कि साम्भर झील को पानी चार छोटी बरसाती नदियों से मिलता है। इसमें मुख्य दो ही हैं – मेंधा और रूपनगढ़। मेंधा उत्तर से इस झील में आती है और रूपनगढ़ दक्षिण से। पश्चिम से पूर्व की ओर लम्बाई में है यह झील। इसके पश्चिमी भाग को पूर्वी से अलग करता एक बलुआ पत्थर का बांध है। जमीन के नमक से जब पश्चिमी भाग का पानी पर्याप्त खारा हो जाता है तो बांध खोल कर पूर्वी भाग में पानी/ब्राइन भरा जाता है। फिर पूर्वी भाग में पानी वाष्पित हो कर नमक बनता है। उस नमक को ले जाने के लिये रेल लाइन भी है – अंग्रेजों के जमाने से। रेल लाइन फुलेरा जंक्शन स्टेशन से जुड़ी है।

नमक बनाने के लिये एक सरकारी कम्पनी है – साम्भर साल्ट लिमिटेड (हिंदुस्तान साल्ट लिमिटेड की सबसिडियरी)। यह कम्पनी बहुत कम उत्पादन कर पाती है। वहीं प्राइवेट कम्पनियां खूब नमक बना रही हैं। वे अवैध कुयें खोद कर नमकीन पानी निकाल नमक बनाती हैं। उनको नमक भरपूर मिल रहा है और सरकार को चूना लग रहा है।

प्रेमसागर को इन सब की पूर्व जानकारी नहीं थी। उनको नहीं मालुम था कि साम्भर झील को जल देने वाली चार नदियां बस उतनी ही जल चली हैं जिनसे झील भर जाये। वे सिंचाई के काम नहीं आ सकतीं। वे सतलुज और व्यास जैसी नहीं हैं। सतलुज-व्यास पर हरीके बांध है जिससे राजस्थान नहर (कालांतर मेंं इंदिरा नहर) पंजाब से राजस्थान आ कर दस मरुस्थलीय जिलों को सिंचित कर रही है।

झील के पास सड़क पर भेड़ों का रेवड़

प्रेमसागर की यात्रा नामी लेखकों की नदियों या भूखण्डों की यात्रा जैसी नहीं है। उन लोगों को तो अखबार या पुस्तक पब्लिशिंग कम्पनियों से अकूत फण्डिंग मिलती है। वे लोग एक टीम रख कर जगह के बारे में पर्याप्त बैकग्राउण्ड शोध भी करते हैं। उनको यह फिक्र नहीं करनी होती कि शाम को कहां डेरा मिलेगा, कहां भोजन मिलेगा।

पर प्रेमसागर की यह यात्रा एक मायने में अभूतपूर्व है – और शायद ही कोई इसे दोहरा पायेगा। बिना किसी संसाधन के, बिना पुख्ता भौगोलिक-ऐतिहासिक-सांस्कृतिक जानकारी के; अकेले प्रेमसागर दस बारह हजार किमी यात्रा कर भारत देख चुके हैं। मैं हमेशा उनसे ईर्ष्या करता हूं कि काश उनकी जगह मैं होता! पर मैं हो नहीं सकता। मुझमें कष्ट सहने की वह क्षमता ही नहीं है। मैं अगर निकला होता तो पचीस पचास किलोमीटर चल कर वापस हो लिया होता।

झील किनारे एक गांव में एक किशोर प्रेमसागर को रोक कर केले खिलाये और दूध पिलाया।

झील किनारे एक गांव, सांपों की ढाणी, में एक नौजवान प्रेमसागर को रोक कर केले खिलाये और भैंस का दूध, शहद मिला कर पिलाया। पिछले दिन फुलेरा में वह मिला था जहां प्रेमसागर चाय पीने के लिये रुके थे। प्रेमसागर से कुछ बातचीत हुई थी। उसे लगा था कि प्रेमसागर उसके गांव से गुजरेंगे। एक दर्जन केले का उसने इंतजाम किया था। प्रेमसागर को सड़क पर आते देख उसने रोका और घर पर बुला कर केला और दूध सामने रखा। “एक दर्जन केला था भईया। उतना कहां खाता। छ केला उन लोगों को ही खाने को दिया। उसके साथ न न करते हुये भी करीब एक किलो दूध उन लोगों ने मुझे पिला दिया। चित्र में नौजवान खड़ा है। पास में उसके पिताजी या दादा जी हैं। दादा जी ही होंगे। उनके माथे पर उम्र की रेखायें हैं और लम्बे कानों में कुण्डल। इस प्रकार का आतिथ्य कम ही मिलता है। राजस्थान में वह अपेक्षाकृत ज्यादा मिल रहा है।

नौजवान का नाम है श्याम यादव। मानस में प्रेम और श्रद्धा को ले कर शबरी का उदाहरण है। एक उदाहरण यह प्रत्यक्ष है – सांपों की ढ़ाणी के श्याम यादव जी का! जय हो!

झील के किनारे यह गड़रिया। प्रेमसागर ने चित्र भेजा।

झील किनारे एक गड़रिया के चित्र भेजे प्रेमसागर ने। उनका साफा केसरिया रंग का है और शानदार लग रहा है। प्रेमसागर ने बताया कि यहां वृद्ध लोग सफेद साफा बांधते हैं। जवान लोग रंगीन। ये सज्जन तो अधेड़ लगते हैं। पर अभी भी अपने को जवान समझते हैं। उनके एक हाथ में लाठी और दूसरे में शायद छाता है।

सांभर झील, लूनी नदी और जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर का मरुस्थल – ये महत्वपूर्ण भौगोलिक प्रतीक हैं राजस्थान के। उनमें से एक – साम्भर झील से आज आकस्मिक परिचय हुआ प्रेमसागर का। यूं मरुस्थल का कुछ अहसास तो उन्हें हो ही गया है। पुष्कर के पास की आरावली उपत्यका से निकली लूनी नदी शायद उनके रास्ते न आये। प्रेमसागर को तो शक्तिपीठ जाना है। मेरे लिये यह साम्भर झील देखना बड़ी बात है। अपनी रेल सेवा के दौरान मैं यह आसानी से कर सकता था। पर मैं तो अपने चेम्बर से बाहर निकलता ही न था। आज भी, यात्रा प्रेमसागर कर रहे हैं। मैं तो अपने कमरे के कोने में लैपटॉप पर बैठा हूं! :lol:

झील के पास खराना डीह डूंगरी गांव के मठ के महाराज विश्रामपुरी जी। इनके आश्रम में रात बिताने की जगह मिली प्रेमसागर को।

झील के पास डीह डूंगरी गांव के विश्रामपुरी जी महाराज का एक चित्र भेजा प्रेमसागर ने। विश्रामपुरी जी झील के किनारे एक बोरी बिछा कर बैठे हैं। अपने को जूना अखाड़ा का बताते हैं। उनके पास एक कुटिया भर है। प्रेमसागर को सोने के लिये सड़क किनारे एक बैंच मिली। उसपर गमछा बिछा कर रात गुजारी। अपने बैग का तकिया बनाया। भोजन के लिये विश्रामपुरी जी ने चरखी (चावल) में थोड़ी चीनी, नमक और हल्दी मिला कर बनाया था। वही खाया। “मैने कहा भी कि महराज यह क्या बना रहे हैं। पर जो बना था, वही खाये। और क्या करते भईया?”

रात के भोजन के रूप में हल्दी-चीनी-नमक मिला चावल और सोने के लिये बेंच पर गमछा बिछा कर बैग का तकिया लगाया बिस्तर! यही सही पदयात्रा है।

सोने के लिये सड़क किनारे की ऐसी बेंच मिली प्रेमसागर को।

प्रेमसागर ने जो आंकड़ा भेजा उसके अनुसार दिन भर में वे बीस किलोमीटर चले। कुल 29 हजार कदम। यह ज्यादा नहीं है, फिर भी ठीक ही है। आगे मणिबंध शक्तिपीठ अभी पचहत्तर किमी दूर है। करीब तीन दिन की यात्रा। देखें महादेव और अन्नपूर्णा माई किसके माध्यम से कैसी सहायता करते हैं। तीन चार दिन रहने खाने को कैसे मिलता है! महादेव के ही भरोसे चल रहे हैं प्रेमसागर!

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

प्रेमसागर – चौमू से फुलेरा


7-9 जुलाई 2023

तीन दिन में प्रेमसागर चौमू से चल कर फुलेरा पंहुचे। इस प्रकरण में तीन जगहों पर रात्रि विश्राम किया –

  • संत दादू राम का आश्रम, राधाकिशन पुरा
  • सुप्रीम महाविद्यालय, हिंगोनिया
  • सियारामदास बाबा की गौशाला, फुलेरा

कुल मिला कर सत्तर-पचहत्तर किलोमीटर चले। औसत 25 किमी प्रति दिन। पहले दो दिन तो बीस किमी प्रतिदिन की दूरी तय की। तीसरे दिन थोड़ा ज्यादा खींचा अपने को।

प्रेमसागर ने रास्ते के बारे में जो बताया उसे मैं बिंदुवार रख रहा हूं।

  • बरसात का पानी इस्तेमाल करने के प्रयास –

बरसात का पानी जमा करने के लिये खोदे गड्ढ़े

“बारिश अच्छी हो रही है भईया। लोग पानी के बचाव के लिये जागरूक हैंं। जगह जगह साठ प्रतिशत सरकारी सहायता पर लोगों ने बीस फुट गहरा, सौ फुट लम्बा और अस्सी फुट चौड़ा गड्ढ़ा बनाया है। इसकी दीवारों और नीचे के तल पर प्लास्टिक बिछाया है जिससे पानी जमीन में न चला जाये। बरसात का पानी इन गड्ढ़ों में जमा हो रहा है। यह पानी खेती के काम आयेगा। बताया कि एक गड्ढ़े की लागत तीन लाख आती है। साठ परसेंट उसमें से तो सरकार दे देती है। कुछ लोगों ने सरकारी अनुदान का मुंह न देखते हुये अपने स्तर पर ऐसे प्राइवेट गड्ढ़े बनाये हैं। कहीं कहीं तो प्लास्टिक की तिरपाल लगाने की बजाय लोगों ने गड्ढ़े की दीवारें और फर्श सीमेण्ट के बनवा लिये हैं। लोगों ने अपने गड्ढ़े बीस फुट गहरे और साठ फुट लम्बे, चालीस फुट चौड़े भी बनवाये हैं।”

प्रेमसागर के भेजे चित्रोंं में ये गड्ढ़े पानी से लगभग भरे नजर आते हैं। राजस्थान में इस साल अच्छी बरसात हुई है। सात जुलाई तक का जो भारत का ग्राफिक है, उसके अनुसार राजस्थान में औसत से साठ प्रतिशत से ज्यादा बारिश हुई है।

राजस्थान में बारिश औसत से कहीं ज्यादा हुई है।
  • “खेतों की सिंचाई पाइप से भी होती है, ड्रिप सिस्टम से भी और स्प्रिंकलर से भी। गड्ढ़े से पानी निकालने के लिये पम्प का प्रयोग होता है। खेतों के आसपास बिजली न होने पर डीजल जेनरेटर से उन्हें चलाया जाता है।
  • अण्डर ग्राउण्ड पानी निकालने के लिये भी प्रयास हैं पर बोरिंग काफी गहराई में चली गयी है। इस इलाके में तो 1000 फुट से नीचे ही पानी मिलता है। अलवर की ओर पानी का स्तर ऊंचा था। “पानी की कमी से समझ आ रहा है भईया कि जो कहावत थी – जहां न पंहुचे गाड़ी, वहां पंहुचे मारवाड़ी – वह क्यूं कही गयी।” जैसे जैसे आगे पश्चिम की ओर बढ़ेंगे प्रेमसागर, पानी की समस्या और भी दीखेगी। पर अच्छा यह है कि यहां मानसून की वर्षा अच्छी हुई है। पश्चिमी राजस्थान में तो और भी अच्छी हुयी है औसत से। पूर्वी राजस्थान में 85 प्रतिशत ज्यादा बारिश है और पश्चिमी में 190 प्रतिशत।
  • दादू राम जी के आश्रम में –

“आश्रम में कमरे भी थे, पर मैंने तो तीन तरफ से घिरे बराण्डे में ही पसंद दिया। मेरा तखत वहां लगा दिया गया। भोजन में रोटी और हरा मिर्च की सब्जी मिली। यहां मिर्च बड़ी बड़ी होती है और तीखी नहीं होती। आश्रम में बाकी लोग थे, पर महंत जी – गणेश दास जी अलवर गये हुये थे। बालक नाथ जी से मिलने। बालक नाथ अलवर के सांसद हैं और भईया जोगी आदित्यनाथ जैसे हैं। बात तो यह चल रही है कि भाजपा की मेजोरिटी आने पर वही मुख्यमंत्री बनेंगे।”

दादूराम आश्रम, राधाकिशनपुरा के लोग

“आश्रम वालों ने भोजन के बाद आधा किलो-तीन पाव दूध पिला दिया। बोले – पच जायेगा। इतना चलेंगे तो शरीर में भी तो कुछ जाना चाहिये। भईया आश्रम में गायें नहीं हैं पर गांव वाले रोज पंद्रह किलो गाय का दूध दे जाते हैं श्रद्धा के साथ।”

मनोज यादव और उनकी माता जी। दोनो व्यक्तियों में कौन मनोज यादव हैं, प्रेमसागर बता नहीं पाये।

“दोपहर में एक सज्जन मनोज यादव जी मिले थे। वे बोले कि आगे पुष्कर तक वे मेरे रहने खाने की व्यवस्था कर देंगे। उनकी जानपहचान और रिश्तेदारी है आगे। उनकी बहन भोपाल में डीएम हैं। अब देखें भईया महादेव उनके जरीये सहायता करायेंगे या फिर कोई और इंतजाम करेंगे। हम तो उन्हीं के भरोसे चल रहे हैं। … ये जो परेशानी हो रही है वह शायद बीमारी में यात्रा छोड़ कर घर जाने के कारण है।”

  • सुप्रीम फार्मेसी कॉलेज, हिंगोनियाँ, डूंगरी, जयपुर में –

“आज ज्यादा नहीं चला भईया। बारिश के बाद उमस भरी गर्मी थी। भरत यादव जी ने व्यवस्था कर दी थी यहां तो यहीं रुक गया हूं। यह सुप्रीम कॉलेज है। जगह का नाम मैं कॉलेज के बोर्ड का फोटो भेजूंगा, उसमें मिल जायेगा। प्रिंसिपल साहब मिले थे। उन्होने कहा कि उनका फोटो न खींचा जाये, सो नहीं लिया। यहां कॉलेज में ही दो कमरे हैं अतिथियों के लिये। उसी में मेरा बिस्तर लगा दिया गया है।”

“भईया आप मेरी बात मानिये। आपकी तबियत बिल्कुल सही हो जायेगी। आप बकरी का दूध लीजिये कुछ दिन। यह चक्कर आने वाली तकलीफ खतम हो जायेगी। ज्यादा नहीं सौ ग्राम लीजिये। पीने में अच्छा नहीं लगेगा, इसलिये पास में नमकीन रखिये। उसके साथ सेवन करिये।” – प्रेमसागर इसी तरह की दवायें मेरी समस्याओं के लिये बताते हैं। कुछ का मैं प्रयोग करता हूं, कुछ के बारे में उन्हें “अश्वत्थामा हत:, नरो वा कुंजरो वा” स्टाइल में उत्तर देता हूं। अर्थात बकरी का दूध पिया या नहीं पिया, दोनो दशा में मेरा उत्तर तकनीकी तौर पर सही हो। :-)

“भईया यहां राजस्थान में गायें कम हैं, बकरियां ज्यादा हैं और स्वस्थ भी। एक बकरी तीन साढ़े तीन किलो तक दूध देती है। बकरी का दूध सस्ता है – पचास रुपया किलो। भैंस का तो साठ रुपया है। इसलिये लोग बकरी दूध के लिये ही पालते हैं। कसाई को नहीं देते। उत्तर प्रदेश में तो बकरी बहुत कम दूध देती है। इसलिये दूध मंहगा है। दो सौ रुपया किलो तक बिकता है।”

9 जुलाई को हिंगोनिया से सवेरे जल्दी ही निकले प्रेमसागर। पर तीन किमी आगे उन्हें एक दम्पति ने रोक लिया चाय के लिये।
  • 9 जुलाई को हिंगोनिया से सवेरे जल्दी ही निकले प्रेमसागर। पर तीन किमी आगे उन्हें एक दम्पति ने रोक लिया चाय के लिये। “भईया वे लोग बाहर ही बैठे थे। मुझे कहा कि चाय पी कर जाईयेगा। तो वहां कुछ समय लगा। भईया यहां के लोग बहुत अच्छे हैं। ऐसे लोग हर तरफ नहीं मिले।”
सड़क सीमेण्ट की थी और आधे घण्टे में ही रोड पर दो दो फुट पानी आ गया।

दिन में कुछ दूर पहाड़ी रास्ता था, ऊंचाई वाला पर वह जल्दी ही पार हो गया। आगे समतल था। नौ तारीख को प्रेमसागर लगभग तीस – बत्तीस किमी चले। शाम के समय वे फुलेरा से तीन किमी पहले चल रहे थे कि तेज बारिश हो गयी। रुकना पड़ा। सड़क सीमेण्ट की थी और आधे घण्टे में ही रोड पर दो दो फुट पानी आ गया।

  • रात विश्राम के लिये प्रेमसागर को फुलेरा के आउटस्कर्ट्स पर सियारामदास बाबा की गौशाला में जगह मिली। उनका तख्ता और गद्दा लगा दिया गया। “भोजन में रोटी-दाल-आलू की सब्जी था। मन माफिक ही था भोजन भईया। और भईया कल कुछ पैसा आया है अकाउण्ट में। मुझे मैसेज से यह तो पता चल रहा है कि लोगों ने पैसा दिया है, पर दूसरा वाला मोबाइल चोरी जाने से यह पता नहीं चलता कि किनने दिया है।… मौसम अजीब है भईया। दिन में धूप रहती है और शाम रात बारिश हो जा रही है।”
सियारामदास बाबा की गौशाला

मौसम, कच्चा रास्ता, बारिश, ठिकाने की तलाश … उनकी बातें सुन कर लगता है कि यात्रा में उन्हें सामान्य से ज्यादा जद्दोजहद करनी पड़ रही है। पर उनके संकल्प में कमी नहीं है। मुझे अच्छी लग रही है उनके इस चरण की यात्रा। यह जरूर है कि जितनी जानकारी की अपेक्षा करता हूं, उतनी मुझे नहीं मिल रही। सियारामदास बाबा की गौशाला का ग्राफिक विवरण तो मिला ही नहीं। … पर शायद मुझे ज्यादा अपेक्षा पालनी नहीं चाहिये।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
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चौमू


6 जुलाई 2023

सन 1971 में जब मैं पिलानी गया था इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिये तो मैं देहाती था – एचएमटी – हिंदी मीडियम टाइप। मैंने हायर सेकेण्डरी नसीराबाद, अजमेर के मिशन स्कूल से की थी। पढ़ाई का माध्यम हिंदी था। मुझ जैसे कुछ और भी छात्र थे। देसी। हम मस्टर्ड थे। जो ज्यादा ही सीधा होता था, उसे चौमू कहा जाता था।

चौमू यानी लल्लू। जिसे कोई भी चला ले।

पिलानी में यह शब्द आया कहां से? कालांतर में पता चला कि चौमू जयपुर के पास कोई कस्बा है। वैसे ही जैसे पिलानी या चिड़ावा। पिलानी के दिनों से यह हसरत थी कि कभी चौमू जा कर देखा जाये। पर मैं कभी चौमू जा न पाया। कालांतर में भारत देखा पर चौमू नहीं।

अब देखता हूं तो चौमू पिलानी से मात्र 150-200 किमी दूर है। बस से पंहुचा जा सकता था। रुकने के लिये कोई धर्मशाला सस्ते में मिल सकती थी। पर तब यायावरी का मन सोचता भी न था। वह इलैक्ट्रोमैग्नैटिक्स या सिलिकॉन ट्रांसिस्टर में घूमता रहता था। … हम लोग किताबी कीड़ा भर थे! :sad:

अब भी वही हैं, शायद! :-(

चौमू के चित्रों में यह अंश काटा जिसपर जगह का नाम लिखा है।

अब चौमू के बाजार के चित्र देखे – प्रेमसागर अपनी पदयात्रा में एक रात चौमू में रहे। उस जगह के चित्र उन्होने मुझे भेजे। और उससे मुझे आज से पचास साल पहले की यादें हो आयीं।


“चौमू मैं रात गुजारने के लिये मंदिर या धर्मशाला तलाश रहा था। एक धर्मशाला में बताया गया कि कुल 300 रुपये लगेंगे – 200 रुपये कमरा और 100 रुपये भोजन के। “मैने कह दिया कि वह मेरी बजट में नहीं है। मेरे पास कुल जमा 274 रुपये हैं। उसमें भी 200 रुपये तो एक सज्जन ने यूपीआई से दिये थे। इस बीच किसी से पता चला कि अगरवाल धर्मशाला में जगह मिल जायेगी। मैं अगरवाल धर्मशाला गया तो वहां पचास रुपये में कमरा मिला। बीस रुपया गद्दा का लिया। दस रुपये में भोजन मिल गया। भोजन भी ठीक ही था। पांच रोटी, दाल, सब्जी और अचार। सत्तर रुपये से सस्ता तो क्या मिलता?” – प्रेमसागर ने अपनी दैनिंदिनी बताई।

चौमू का बाजार।

अगरवाल धर्मशाला वाले, भले ही चौमू वाले कहाते हों, हैं बहुत भले लोग! अब मुझे कोई चौमू कहे तो मुझे खराब नहीं लगेगा। चौमू सरल और भले का प्रतीक है; भोंदू और लण्ठ का नहीं!

रास्ते में बारिश होती रही इसलिये ज्यादा चलना नहीं हो पाया। रास्ते में एक हवेली नुमा स्थान भी दिखा जहां कोई फिल्म की शूटिंग हो रही थी। चौमू पहाड़ी इलाके की घाटी जैसा है। पुरानी हवेलियां यहां होटल और टूरिस्ट स्थल बन गये हैं। लोग यहां से निकल कर महानगरों में बस गये हैं तो और कोई उपयोग करने वाला नहीं है इन हवेलियों का।


मैं खंगालने पर पाता हूं कि चौमू का अर्थ है चार मुंह। यहां से चार तरफ रास्ते जाते हैं। यातायात के हिसाब से अच्छी कनेक्टिविटी है चौमू की। यह सामोद के ठाकुर रावल करण सिंह ने 1595 में बसाया था। सवा चार सौ साल का इतिहास तो है ही इस कस्बे का। रावल राजाओं ने इसकी सुरक्षा के लिये चारदीवारी, पानी की व्यवस्था के लिये बावड़ी और नहर बनवाई थी। प्रेमसागर को तो केवल रात गुजारनी थी, अन्यथा रुक कर हवेलियां, दरवाजे, बावड़ियां और नहर देखते। राजस्थान के कस्बे की आत्मा तो उनमें ही होगी?! फिर भी सवेरे की सुनसान बाजार की सड़क, चाय की दुकान पर पीतल के बर्तन में चाय चढ़ाये और अदरक पीसते अधेड़ की जो छवियां प्रेमसागर ने भेजीं, उनसे चार पांच दशक से चौमू देखने की साध काफी हद तक पूरी हुई।

शहर छोड़ कर गांव-कस्बे की आबो हवा में बसा मैं वास्तव में चौमू ही हूं। चौमू जैसी जगह का जीव। अब मुझे कोई चौमू कहे तो झेंप नहीं ही लगेगी!

धन्यवाद प्रेमसागर को चौमू दिखाने के लिये। विराटनगर से पुष्कर का पैदल रास्ता जरूरी नहीं था कि चौमू हो कर जाता। पर लगता है प्रेमसागर मेरे मन की बहुत नीचे दबी आवाज सुन पाये और न केवल चौमू के रास्ते चले वरन वहां रात भी गुजारी।

प्रेमसागर सवेरे मामटोरी खुर्द से चल कर करीब तीस किमी चले। आज तो कुछ ज्यादा चल पाये अन्यथा उनका औसत 22-25 किमी का है। बारिश का मौसम और बारिश रुकने पर उमस के कारण ज्यादा दूरी नहीं तय कर पा रहे। यह भी सम्भव है कि उनके पास पैसे की कमी है और रुकने के स्थान के बारे में वे ज्यादा उन्मुक्त भाव से नहीं चल पा रहे। उनका ध्यान काम से कम खर्चे में यह यात्रा पूरी करने का है। उन्हें अंशदान की जरूरत है। तीन सौ रुपये की धर्मशाला छोड़ अग्रवाल धर्मशाला तलाशना उसी कारण से हुआ, जहां अस्सी रुपये में उनका काम चल गया, भले ही वह तलाशने में रात के सवा नौ बज गये। खैर, यात्रा के कष्ट तो झेलने ही हैं उन्हें।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

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