नैनी से चित्रकूट #प्रेमसागर


16 जुलाई 2023

प्रेमसागर ब्राउनियन मोशन (रेण्डम, इसके लिये हिंदी में यादृच्छिक शब्द मिला – कामिल बुल्के शब्दकोश से) सा व्यवहार करने लगे हैं। उन्होने पुष्कर में गायत्री शक्तिपीठ के दर्शन किए। तेरह जुलाई को। उसके बाद रात्रि विश्राम किया पुष्कर की धर्मशाला में मुझसे पूछते रहे कि जूनागढ़ जायें या उज्जैन। मैंने उन्हीं पर निर्णय छोड़ा। यह जरूर बताया कि मध्यप्रदेश में दो अन्य स्थान हैं जहां शक्तिपीठ हैं – चित्रकूट और अमरकण्टक। पर इनके बारे में ज्यादा जाने बिना वे ट्रेन पकड़ कर चौदह जून को प्रयागराज पंहुच गये। उनके रहने का ठिकाना गुड्डू मिश्र जी के यहां था। एक दिन वहां रह कर वे सोलह जून की सुबह चित्रकूट के लिये रवाना हो गये।

प्रेमसागर के रहने का ठिकाना गुड्डू मिश्र जी के यहां था।

मेरे विचार से, मैहर के शारदा मंदिर दर्शन करने के बाद उन्हें चित्रकूट जा कर वहां के शारदा मंदिर के दर्शन करने की जरूरत नहीं है। जब कोई यात्री हजारों किलोमीटर की पदयात्रा कर रहा हो तो उसे पूरी सूक्ष्मता से यात्रा मार्ग का नियोजन करना चाहिये। एक एक कदम की बचत की जानी चाहिये। पर प्रेमसागर चलो पहले, सोचो बाद में के मूलमन्त्र पर चल रहे हैं। और वे नैनी से चित्रकूट की पदयात्रा (मेरे हिसाब से) यूं ही कर रहे हैं।

दो अलग अलग मत के लोग मैहर और चित्रकूट को शक्तिपीठ मानते हैं। यह स्कीन शॉट है गीता प्रेस की शक्तिपीठ दर्शन पुस्तक का –

उनके इस प्रकार से चलने से मुझे अब लगने लगा है कि ज्योतिर्लिंग या शक्तिपीठ दर्शन एक अवलम्ब मात्र है। मुख्य ध्येय उनका चलना है। सुबह उठना, और चल देना। शाम तक चलते जाना और चार बजे बाद रुकने और भोजन के लिये किफायती विकल्प तलाशना। यह यायावरी है। घुमक्कड़ी। शक्तिपीठ दर्शन तो निमित्त मात्र है।

पुष्कर में गायत्री शक्ति पीठ दर्शन और दो तीन अन्य मंदिरों में जाने के बारे में मेरे पास जानकारी स्केची है। चित्र हैं ढेरों। देवालयों में प्रेम सागर अगर चित्र लेने की बजाय मंदिर की ऊर्जा अपने में आत्मसात करने में ज्यादा समय लगायें तो बेहतर हो। … पता नहीं, वे करते भी हों। पदयात्रा और शक्ति पीठ दर्शन का उनकी आत्मिक उन्नति पर क्या प्रभाव पड़ा है, यह शोध का विषय हो सकता है। पर उनके खुद के कहे अनुसार उनका आत्मविश्वास और निर्भयता बहुत बढ़ी है। बारह तेरह हजार किलोमीटर की पदयात्रा से अगर आत्मविश्वास और निर्भयता का ही लाभ हुआ हो, तो भी वह बड़ी उपलब्धि में गिना जायेगा। फिर भी, मेरी अपेक्षा थी/है कि वे मातृ शक्ति की उदात्तता और उनके अनेकानेक वपुओं की गहराई जानें। माता लक्ष्मी, काली, सरस्वती, महादेवी, शांति, भ्रांति, भय, क्रोध, श्रद्धा, … जाने क्या क्या हैं। किन्ही भी तीन चार रूपोंंपर गहन चिंतन हो तो यह कार्य सार्थक हो। पता नहीं प्रेमसागर क्या सोचते हैं। या सोचते भी हैं या नहीं।

कुंचील की दुर्घटना का प्रभाव यह पड़ा है कि प्रेम सागर ने लाल वस्त्रों की बजाय सफेद धारण कर लिये हैं। पुष्कर से मंदिरों के दर्शन उन्होने सफेद कपड़ों में ही किये।

कुंचील की दुर्घटना का प्रभाव यह पड़ा है कि प्रेम सागर ने लाल वस्त्रों की बजाय सफेद धारण कर लिये हैं। पुष्कर से मंदिरों के दर्शन उन्होने सफेद कपड़ों में ही किये। सफेद वास्तव में बेहतर रंग है। शांत रंग। यह जरूर है कि सफेद कपड़ा ज्यादा जल्दी गंदा हो जाता है। एक नियम बना रखा है उन्होने कि पदयात्रा के दौरान वे साबुन का प्रयोग नहीं करते। मेरे विचार से हाईजीन की नजर से देख उन्हें इस नियम को भी तिलंजलि दे देनी चाहिये। शरीर और वस्त्रों की सफाई के लिये साबुन का प्रयोग किया जाना चाहिये। मैं तेल फुलेल, क्रीम, कंधी की बात नहीं कर रहा। सौंदर्य प्रसाधन नहीं होने चाहियें, पर साबुन तो हाईजीन/स्वच्छता से जुड़ा है। वह उतना ही जरूरी है जितना दातुन करना। अगर साधारण तरीके से रहना-चलना हो तो एक ही साबुन – लाइफब्वाय – रखा जाये। उसी का प्रयोग नहाने और कपड़ा कचारने में किया जाये। ऐसा करेंगे तो आइंस्टीन की आत्मा प्रसन्न होगी। वे कहते थे कि तरह तरह के साबुनों की क्या जरूरत है?! नहाने, हैण्डवाश, शैम्पू, कपड़े धोने के साबुन जैसे आधा दर्जन साबुनों की बजाय एक लाइफब्वाय की सस्ती वाली टिकिया; बस!


सवेरे कुछ देर से ही निकले प्रेमसागर। उन्होने यात्रा विवरण तो नहीं दिया पर उनके चित्रों से लगता है कि मार्ग में जसरा-बारां के पास प्रयागराज थर्मल पावर स्टेशन भी पड़ा। यह सम्भवत अब चालू हो गया हो। उसकी एक चिमनी से धुआं निकलता दीख रहा है। मैं जब 2013-14 में प्रयागराज में उत्तरमध्य रेलवे का माल यातायात प्रबंधक था तो इस ताप विद्युत गृह के यार्ड का डिजाइन स्वीकृत हो रहा था। अब एक दशक बाद यह काम करने लगा है। तीन यूनिट 660 मेगा वाट की। बगल में ही मेजा में एक और थर्मल पावर हाउस बन रहा था, वह भी शायद चालू हो गया हो। इलाके की अर्थव्यवस्था और जीविका के साधनों में बहुत उन्नति हुई होगी। मौके पर एक चाय की गुमटी वाला भी अच्छा कमा लेता होगा थर्मल सन्यंत्र के आसपास। काश प्रेमसागर वह सब देख बताते। पर उनकी यात्रा के ध्येय में यह देखना शामिल नहीं है। उसके लिये तो खुद यात्रा करनी होगी। :-)

यह थर्मल स्टेशन लोहगरा, बारां में है। लोहगरा में ही प्रेमसागर को रात को रुकने की जगह मिली। सम्भवत: वे भोलाजी दुबे के घर पर तलाश रहे थे कि घर के ओसारे में उन्हें रात गुजारने को जगह मिल जाये। वह स्वीकृति मिल गयी तो अपने परिचय के लिये प्रेमसागर ने ब्लॉग खोला। और उसमें से भरभरा कर सैकड़ों ज्योतिर्लिंग तथा शक्तिपीठ पदयात्रा की पोस्टें निकल पड़ीं तो प्रेमसागर का दर्जा आम साधू से बढ़ कर महात्मा का हो गया। उसके बाद उनका पर्याप्त आदर सत्कार हुआ। भोजन भी हुआ और ग्रुप फोटो भी।

भोला दुबे जी सम्पन्न कुटुम्ब के मुखिया हैं। चित्र में ढेरों लोगों की उपस्थिति वह दर्शाती है।

भोला दुबे जी सम्पन्न कुटुम्ब के मुखिया हैं। चित्र में ढेरों लोगों की उपस्थिति वह दर्शाती है। चित्र में एक खुशहाल पितृसत्तत्मक परिवार दीखता है। प्रेमसागर की बगल में एक छोटी बेटी – सम्भवत: भोला जी की पोती – है। शेष लड़कियां, महिलायें अंतिम पंक्ति में हैं। एक महिला – शायद भोला जी की पत्नी पास में कुर्सी पर हैं। प्रेमसागर विशिष्ट अतिथि के रूप में बीच में बैठे हैं।

भोला जी के घर आश्रय तलाश लेना और विशिष्टता जता लेना – यह प्रेमसागर का पदयात्रा कौशल्य ईर्ष्या का विषय हो सकता है। कम से कम मुझे तो ईर्ष्या हो ही रही है!

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
*****
प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

खराना डीह से बूढ़ा पुष्कर


11-12 जुलाई 2023

नमक की झील के बगल के गांव खराना डीह डूंगरी में रात विश्राम के लिये सड़क किनारे की रोडवेज हॉल्ट की बेंच मिली थी। 11 जुलाई को सवेरे प्रेमसागर उठ कर आगे के लिये रवाना हुये। कुछ किलोमीटर चलने के बाद सीतारामपुरा के किशन जी ने अपने घर पर उन्हें चाय पिलाई।

सीतारामपुरा के किशन जी ने अपने घर पर उन्हें चाय पिलाई।

आगे नक्शे में देखने पर रूपन या रूपनगढ़ नदी की क्षीणकाय रेखायें दिखती हैं। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे रूपनगढ़ नदी पार करते समय देखें कि नदी का क्या हाल है। उसमें पानी है या नहीं। यह मुख्य दो नदियों में से एक है जो साम्भर झील को जल प्रदाय करती है। बरसात का मौसम है और इस साल राजस्थान में सामान्य से लगभग दुगुनी बारिश हुई है। ऐसे में भी अगर रूपनगढ़ नदी चार्ज नहीं हुई और पानी नहीं हुआ तो यह साम्भर झील के लिये अशुभ संकेत है।

एक चाय की दुकान पर लोगों ने बताया कि नदी अब नहीं रही। कई साल हो गये उसमें पानी नहीं आता। आगे जब नदी का इलाका पार किया तो फिर मैंने पूछा – नदी दिखी?

“नहीं भईया। कोई पानी कहीं नजर नहीं आया। कोई पुल भी नहीं मिला।”

रूपनगढ़ कस्बे से गुजरते हुये करीब पच्चीस किमी चल चुके थे। रूपनगढ़ का किला किशनगढ़ के महाराजा रूपसिंह ने सन 1648 में बनाया था। यह जाट बहुल स्थान है। प्रेमसागर को चलते हुये पच्चीस किमी के लगभग हो गया था। उन्होने रात्रि विश्राम के लिये धर्मशाला की तलाश की। एक धर्मशाला तो मिली पर उसको प्रबंधकों ने गोदाम में तब्दील कर दिया था। अन्य स्थान होटल जैसे थे। टूरिस्ट लोगों के लिये। उनके रेट भी ज्यादा थे। प्रेमसागर आगे बढ़ गये।

आगे उन्हें रूपनगढ़ नदी के बगल से और कहीं कहीं उससे गुजरते हुये चलना था। मैंने फिर पूछा – नदी कहीं दिखी?

सिंगला बांध। यह रूपनगढ़ नदी का पानी सिंचाई के लिये रोकने हेतु बनाया गया है। पर बारिश के इस मौसम में भी नदी में पानी तो है ही नहीं।

“नहीं भईया। कहीं पानी नजर नहीं आया। एक जगह सिंगला बांध दिखा। इस बांध से नदी का पानी रोक कर लोग सिंचाई करते थे। पर बताया कि कई साल से तो पानी इकठ्ठा हुआ ही नहीं। जब बांध पूरा भर जाता था तो पानी आगे साम्भर झील के लिये रवाना होता था। पर इस साल तो पानी था ही नहीं।”

देश में सैंकड़ों-हजारों बरसाती छोटी नदियां या तो मर गयी हैं या नालों में रूपांतरित हो गयी हैं। रूपनगढ़ नदी भी उनमें से एक होने जा रही है। प्रेमसागर के माध्यम से साम्भर झील की इस प्रमुख नदी की दशा का पता चला।

सलेमाबाद में निम्बार्काचार्य पीठ

दस इग्यारह किलोमीटर आगे सलेमाबाद में निम्बार्काचार्य पीठ मिला। कोई किला या हवेली किसी राजा ने इस पीठ को दे दिया था। बहुत सुंदर लगता है वह स्थान। यहां पर सब सुविधायें हैं। पीठ का अपना प्रिंटिंग प्रेस है। संस्कृत महाविद्यालय (विश्वविद्यालय) है। हॉस्टल, पुस्तकालय, वाचनालय, गौशाला, औषधालय आदि भी संस्थान में है। प्रेमसागर को इक्यावन शक्तिपीठ का पदयात्री जान कर वहां के प्रबंधक महोदय ने एक अटैच्ड बाथरूम वाला कमरा उन्हें दे दिया। भोजन भी मिला और पैसा भी नहीं देना पड़ा।

निम्बार्काचार्य पीठ का दृश्य

द्वैताद्वैत (भेदाभेद) मत का यह पीठ सम्प्रदाय के अनेक गुरुओं की परम्परा वाला है। वर्तमान पीठाधीश्वर श्री श्रीजी महराज और उनके उत्तराधिकारी श्री श्यामशरण देव जी नामित हैं। प्रेमसागर वहां रात होने पर पंहुचे थे। ज्यादा देखने का अवसर नहीं मिला। रात गुजारने पर सवेरे वे रवाना हो गये पुष्कर के लिये।

बारह जुलाई को लगभग इग्यारह बजे प्रेमसागर के साथ कुंचील गांव से गुजरते हुये साम्प्रदायिक दुर्घटना हो गई। उसके बारे में अलग से ब्लॉग पोस्ट लिख दी गयी है। कुंचील से रामस्वरूप गुर्जर जी उन्हें बचा कर निकाल लाये और फिर अपनी मोटरसाइकिल से दस किलोमीटर आगे छोड़ा। रामस्वरूप जी ने प्रेमसागर से कुछ आर्थिक सहायता की भी बात की, पर प्रेमसागर ने मना करते हुये उनकी सहायता के लिये दिल से धन्यवाद दिया।

शाम तक प्रेमसागर पुष्कर पंहुच गये। उन्होने बूढ़ा पुष्कर के दर्शन भी कर लिये। एक धर्मशाला में डेरा भी जमाया दो दिनों के लिये।

“बूढ़ा पुष्कर में एक छोटी झील/तालाब है भईया। उसमें मछलियां जानती हैं कि उनें कोई खतरा नहीं। वे पास तक चली आती हैं। वहीं एक मंदिर भी है। उसके भी दर्शन किये। और कुछ खास नहीं है बूढ़ा पुष्कर में। कल पुष्कर में मंदिरों के और शक्तिपीठ के दर्शन करूंगा।” – प्रेमसागर ने बताया।

बूढ़ा पुष्कर।

ये दो दिन अच्छे ही थे सिवाय कुंचील की दुर्घटना के। उस दुर्घटना ने झकझोर जरूर दिया प्रेमसागर को। पर वह भी शायद मातृशक्ति और महादेव की कोई परीक्षा हो। प्रेमसागर तो हर घटना को उसी प्रकार से लेते हैं।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
*****
प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

तुम्हारे पहनावे से हमारे बच्चों को डर लगता है!


12 जुलाई 2023

प्रेमसागर का शाक्त पहनावा अजीब तो है। लाल लबादा। बच्चे डर सकते हैं। मुझे अपना बचपन याद आता है। मुझे साधू और पुलीस के वेश से डर लगता था। घर में एक डोम आता था गांव में। वह डाक हरकारा था। खूब तेज चलता था और हाथ में एक बल्लम लिये रहता था। साधू, पुलीस, होमगार्ड या उस डोम को देख मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी। मैं अपनी अम्मा की साड़ी में छिप जाता था।

पर मेरे भय को देख कर कभी किसी घरवाले ने साधू, दरवेश, पुलीस, होमगार्ड या डोम को गलत नहीं ठहराया। उल्टे मेरी अम्मा ने मुझे ही बताने की कोशिश की कि वे लोग अपना काम करते हैं।

हरी चादर लिये वे दरवेश मेरे ननिहाल में बहुधा आया करते थे। बगल में ही जुलाहों की बस्ती थी। वहां मांगते थे तो नानी के घर से भी सीधा-पिसान पा जाते थे। दरवेशों और साधुओं – दोनों को बराबर ट्रीट किया जाता था।

अब पता नहीं क्या हो गया है। प्रेमसागर कुंचील की मियां बस्ती से गुजर रहे थे। दो औरतें उन्हें कहने लगीं कि यहां से क्यों जा रहे हो? हमारे बच्चे डर रहे हैं। औरतों के कहने के साथ लोगों की भीड़ भी जुटने लगी। बाद में प्रेमसागर ने बताया – “पचीस तीस लोग जमा हो गये। और भी बढ़ते। वह तो, भला हो, दो लोग जो पहले मुझे जाते देखे थे, आ कर मुझे वहां से निकाल कर ले गये। भईया, बहुत खराब बोल रहे थे वे भीड़ वाले लोग। बोले ये सड़क तुम्हारा है क्या जो चले आ रहे हो? सड़क मोदी या मोदी के बाप का है क्या? हम तो भईया कोई जवाब नहीं दिये। जवाब देते तो बात बढ़ता ही। हमने तो बस यही कहा कि हम पदयात्री हैं और पुष्कर जा रहे हैं।”

रामेश्वर गुर्जर जी

“वो दोने सहायता करने वाले लोग हमें वहां से निकाल कर अपने इलाके में एक जगह बिठाये। फिर वहां से मैं रवाना हुआ आगे के लिये। करीब चार किमी चला था कि पीछे से उन दोनों में से एक सज्जन – रामस्वरूप गुर्जर – मोटर साइकिल से आये और मुझे बिठा कर करीब दस किलोमीटर आगे छोड़ दिये। वो बोले कि “बाबा यहां से आगे चले जाइये, यहां से सब सेफ है। हमारे गांव कुंचील में पचास घर गुर्जरों के हैं बाकी 2000 घर मिंया बस्ती है। पर हम पचास ही उनपर भारी हैं। आज हम वापस जा कर फैसला करते हैं। ज्यादा करेंगे तो काट डालेंगे हम। उनकी धौंस नहीं चलती हम लोगों पर।””

साम्भर झील के बगल से प्रेमसागर 11 जुलाई को निकले थे। रूपनगढ़ पार कर सलेमाबाद में निम्बार्काचाय के मठ में 11-12 जुलाई की रात गुजारी। वहां से आज निकल कर कुंचील से गुजर रहे थे कि यह काण्ड हो गया। वह यात्रा विवरण अलग से लिखूंगा। निम्बार्काचार्य का मठ बहुत सुंदर है। उसके बारे में कुछ जानकारी जुटानी है। वह पोस्ट एक दो दिन में होगी।

फिलहाल तो यह बखेड़ा लिखना था।

प्रेमसागर सुरक्षित और स्वस्थ हैं। शाम को बूढ़ा पुष्कर घूम लिये।

प्रेमसागर को गूगल नक्शे के रास्ते ने गलत जगह घुसा दिया उनको। गूगल यह भेद नहीं करता कि कहां हिंदू हैं और कहां मुसलमान। कहां लोग उदग्र हैं और कहां शान्तिप्रिय। इस आशय का फीडबैक भी गूगल मैप को लेना चाहिये और उस हिसाब से रास्ता सुझाना चाहिये।

बहरहाल, प्रेमसागर सुरक्षित और स्वस्थ हैं। शाम को वे बूढ़ा पुष्कर घूम लिये। कल 13 जुलाई को मणिबंध शक्तिपीठ और पुष्कर के आसपास के अन्य मंदिरों के दर्शन करेंगे।

यही आशा की जाती है कि आगे कोई विधर्मी बच्चे प्रेमसागर से न डरें और डरें भी तो उनके माई-बाप उसे ले कर धार्मिक वैमनस्य न बोयें। इस देश में सब भय से मुक्त रहें और निर्बाध आ जा सकें। सड़क किसी के बाप की न हो!

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
*****
प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

Design a site like this with WordPress.com
Get started