किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार और मधुकर उपाध्याय



बहुत पहले जब बीबीसी सुना करता था, मधुकर उपाध्याय अत्यंत प्रिय आवाज हुआ करती थी. फिर उनकी किताब किस्सा पांडे सीताराम सूबेदार की समीक्षा वर्ष २००० मे रतलाम में पढी। समीक्षा इतनी रोचक लगी कि वह पुस्तक दिल्ली से फ्रंटियर मेल के कंडक्टर से मंगवाई।

मधुकर उपाध्याय द्वारा लिखी किस्सा पांड़े सीताराम सूबेदार,सारांश प्रकाशन द्वारा सन 1999 में प्रकाशित।

पहले बात मधुकर जी की कर ली जाये। मधुकर जी से मैं व्यक्तिगत रुप से जान-पहचान नहीं रखता हूँ। उनको बीबीसी पर सुनता था,वही परिचय है। उनकी आवाज अत्यन्त मधुर है। बीबीसी सुनना बंद हो गया तो उनसे भी कट गया। उनके बीबीसी पर भारतीय स्वातंत्र्य के १५० वर्ष होने पर धारावाहिक शृंखला में बोलने और उनकी दांडी यात्रा पुन: करने के विषय में काफी सामग्री मैंने अखबार से काट कर रखी थी, जो अब इधर- उधर हो गयी है।

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निजी सम्पत्ति – नन्दीग्राम – साम्यवाद – कार्पोरेट कल्चर


टाइटल में चार समूहों में शब्द हैं। ये चारों एक दूसरे से जुडे हैं। नन्दीग्राम का बवाल निजी सम्पत्ति को सरकार द्वारा कब्जा कर लेने के यत्न से उपजी किसानों की कुंठा का हिंसात्मक प्रदर्शन है। साम्यवाद निजी सम्पत्ति को अहमियत नहीं देता है। यह अलग बात है की चीन की संसद ने पिछले महीने यह तय किया है कि निजी सम्पत्ति को वैधानिक दर्जा दिया जाये और निजी सम्पत्ति सार्वजनिक सम्पत्ति के समतुल्य मानी जाये। यह कानून अक्तूबर से लागू होगा। इससे साम्यवादी अवधारणा, वस्तुत:, ध्वस्त हो जाती है। निजी सम्पत्ति का विचार ‘वेल्थ क्रियेशन’ की मूल अवधारणा है। अगर साम्यवादी सरकार बंगाल में किसानो और उद्योगपतियों को आपस में सौदा कराने देती और केवल फेसिलिटेटर का रोल अदा करती तो बवाल नहीं होता।

कई लोग साम्यवाद/समाजवाद बनाम कारपोरेट कल्चर की बहस छेड़े बैठे हैं। ये लोग बहुत पढे-लिखे है और बौद्धिकता के प्रसंग मे बहुत नेम-ड्रापिन्ग करते हैं। पर विद्वानों के नाम और कोटेशन भर से कुछ सिद्ध नहीं होता। वाहवाही भले मिल जाती हो। बावजूद इसके कि भारत में गरीबी हटाने के नारों पर कई चुनाव जीते गए है; उन नारों से समृद्धि नहीं बढ़ी। नारा देने वाले जरुर सम्पन्न हो गए। एक नुकसान यह हुआ की गरीब-किसान को सब्सिडी की बैसाखी थमा देने से वह पंगु हो गया। किसान को कर्ज दते समय; कर्ज वापस करना है – की अनिवार्यता नहीं समझाई जाती। जब कर्जा पटाने की बारी आती है तो आत्म हत्या के विकल्प के अलावा तैयारी नहीं होती। हो सकता है मेरा यह तर्क अति सरलीकृत हो – पर यह अंशत: सच तो है ही। उद्यम करने से से नहीं, समृद्धि के बंटवारे से खुशहाली आएगी – यह समाजवादी सोच अपनी मौत स्वयं बुलाने का उपक्रम है। कार्पोरेट कल्चर समृद्धि बढ़ाने को प्रतिबद्ध होती है। वह यह भी मान कर चलती है की समृद्धि बढने की संभावनाएं अनंत हैं।

मैं यह भी महसूस करता हूँ की कार्पोरेट कल्चर में भारत की परिस्थितियों के अनुसार नए प्रयोग होने चाहियें। हमारी संस्कृति की रिचनेस को देखते हुये बहुत संभावनाएं है। भारत में पारिवारिक कार्पोरेशन बहुत हैं। इनके लाभ भी है व नुकसान भी। इसपर बहस होनी चाहिये। कार्पोरेट कल्चर इस तरह की हो की मध्य वर्ग को बेहतर पनपने का मौका मिले और दलित मध्य वर्ग को (आरक्षण व सरकार की बैसाखी से नहीं, वरन एक सकारात्मक सोच से) नया जोश मिल पाये। मजदूरों की मध्य वर्ग में वर्टिकल एंट्री और तेज हो। पारदर्शिता के नए आयाम खुल पायें। भगवद्गीता और अन्य भारतीय ग्रंथों में प्रबंधन के अनेक तरीके हैं जो हमारी संस्कृति के ज्यादा अनुकूल हैं। उनपर कर्पोरेशनों में और प्रबंधन के संस्थानों मे नयी दृष्टि पड़नी चाहिये.

आगे होगा यही – लोग कार्पोरेट कल्चर से समृद्धि पाएंगे और बौद्धिक मनोविनोद के लिए (या अपने को बुद्धिजीवी प्रमाणित करने के लिए) गरीबी/साम्यवाद/समाजवाद से सम्बद्ध मुद्दों पर भागीदारी करेंगे। ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं है। बहुत लोग समग्र रुप से यह आज कर भी रहे हैं।

गंगा एक्शन प्लान के कर्मी



मैं आपका परिचय गंगा एक्शन प्लान के कर्मियों से कराता हूँ। कृपया चित्र देखें। ये चित्र शिव कुटी, इलाहबाद के हैं और गंगा नदी से आधा मील की दूरी पर लिए गए हैं। इस चित्र में जो सूअर हैं वे पास के मकान से नाली में गिराने वाले मैले की प्रतीक्षा करते हैं। जैसे ही पानी का रेला आता है ये टूट पड़ते हैं और आनन फानन में टट्टी खा कर शेष पानी जाने देते हैं। पानी उसके बाद सीधे गंगा नदी में जाता है।
ये सूअर गंगा एक्शन प्लान के कर्मी हैं। गंगा एक्शन प्लान ने इन कर्मियों को कोई तनख्वाह नहीं दी है। फिर भी ये अपना काम मुस्तैदी से करते हैं।
शिव कुटी में सीवेज डिस्पोजल सिस्टम नहीं है। नगर पालिका कुछ कारवाई नहीं करती।
मकान एक के ऊपर एक बने हैं कि सेप्टिक टेंक बनाने की जगहें ही नही हैं लोगों के पास।
जय गंगे भागीरथी पाप ना आवे एकौ रत्ती.

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