सवेरे के सपने 


धूमिल यादें प्रोस्टेट की दवाई अब अपने हिसाब से काम करने लगी है। रात में दो-तीन बार उठना होता है, कभी-कभी चार बार भी। किताबों में और यूट्यूब वाले बताते हैं कि शाम छह बजे के बाद पानी न पिया जाए, तो बेहतर रहता है। पर वह सब किताबी बातें हैं। रात तीन बजे नींदContinue reading “सवेरे के सपने “

पैदल चलती महिलायें 


धूमिल यादें मेरे घर के सामने की सड़क से भांति-भांति के लोग आते-जाते हैं। हर एक के पास अपनी कहानी होगी। सवेरे बनारस और प्रयागराज जाने वाली पैसेंजर पकड़ने वाले लोग गुजरते हैं—तेज़ चाल चलते हुए। कभी गोद में एक बच्चा लिये और दूसरे को लगभग घसीटती महिलायें दिखती हैं। कभी सिर पर बेलपत्र औरContinue reading “पैदल चलती महिलायें “

धनुषटंकार


  धूमिल यादें वह 1959-60 का समय होगा। मेरी यादें बहुत धूमिल हैं। चार-पांच साल का बच्चा, जो स्कूल भी नहीं जा रहा था, कितना याद रख सकता होगा। पर इतना याद है कि मेरा एक छोटा भाई हुआ था, जो जन्म के चौदहवें दिन ही चल बसा। मेरी अम्मा सौरी में थीं—बंद कमरे में।Continue reading “धनुषटंकार”

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