मोतलसिर से घाट पिपल्या तक – जहां हर नदी, हर मछेरा और हर महंत अपनी-अपनी परिक्रमा रचते हैं।


मोतलसिर में एक दिन और रुकने की बजाय सवेरे निकल लिये प्रेमसागर। दिन भर में करीब उन्नीस किलोमीटर चले। शाम घाट पिपल्या के एक नवलधाम आश्रम में डेरा जमाया। सवेरे मोतलसिर के पास नर्मदा घाट पर कुछ समय गुजारा। सूर्योदय के समय मन के विचार भी सिंदूरी थे। नर्मदा मां से पूछ रहे थे प्रेमसागरContinue reading “मोतलसिर से घाट पिपल्या तक – जहां हर नदी, हर मछेरा और हर महंत अपनी-अपनी परिक्रमा रचते हैं।”

सुडानिया से मोतलसिर


जून 13 उनतीसवां दिन। श्रद्धालु मिलते गये, सूरजकुंड की थाह नहीं मिली, और लू ने प्रेमसागर को रोक दिया — फिर भी यात्रा रुकी नहीं कल 13 जून को सुडानिया से चल कर भारकच्छ पंहुचे प्रेमसागर। सवेरे पांच बजे सुडानिया के आश्रम से निकले थे। सवेरे एक सज्जन देवेश पटेल जी ने चाय पिलाई। चलतेContinue reading “सुडानिया से मोतलसिर”

पीलीकरार से सुडानिया


जून 12, अठाईसवां दिन। प्रेमसागर चल रहे हैं; मैं लिखते-लिखते बह रहा हूँ। कुछ ज्यादा ही बह(क) रहा हूं! पीलीकरार से पांच बजे निकल लिये प्रेम गुरूजी। निकलते समय एक सज्जन नर्मदा प्रसाद जी ने एक गमछा और इक्यावन रुपया अर्पण कर विदाई की उनकी। कल एक गमछा पाये और आज एक और। क्या करेंगेContinue reading “पीलीकरार से सुडानिया”

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