कितना आसान है कविता लिखना?


ठेलेवाला कितने सारे लोग कविता ठेलते हैं।

ब्लॉग के सफे पर  सरका देते हैं

असम्बद्ध पंक्तियां।

मेरा भी मन होता है;

जमा दूं पंक्तियां – वैसे ही

जैसे जमाती हैं मेरी पत्नी दही।

जामन के रूप में ले कर प्रियंकर जी के ब्लॉग से कुछ शब्द

और अपने कुछ असंबद्ध शब्द/वाक्य का दूध।

क्या ऐसे ही लिखते हैं लोग कविता?

और कहते हैं यह रिक्शेवाले के लिये नहीं लिखी हैं।

मेरा लिखा भी रिक्शा-ठेलावाला नहीं पढ़ता;

पर रिक्शे-ठेले वाला पढ़ कर तारीफ में कुछ कह दे

तो खुशी होगी बेइन्तहा।

काश कोई मित्र ही बना लें;

रिक्शेवाले की आईडी

और कर दें एक टिप्पणी!


इस पोस्ट के लिये फोटो तलाशने गोवेन्दपुरी तिराहे पर गया तो स्ट्रीट लाइट चली गयी। किसी रिक्शे वाले की फोटो न आ पायी मोबाइल कैमरे में। यह ठेले वाला अपनी पंचलैट जलाये था – सो आ गया कैमरे में। पास ही एक रिक्शे वाला तन्मयता से सुन रहा था –

"मैं रात भर न सोई रे/खम्भा पकड़ के रोई/बेइमान बालमा; अरे नादान बालमा…&quot

मुझे लगा कि इतना मधुर गीत काश मैं लिख पाता!


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

34 thoughts on “कितना आसान है कविता लिखना?

  1. बढ़िया पोस्ट ज्ञानदा…इससे ज्यादा कहने को नहीं :)सबने सब कहा , हमने आनंद लिया। महेन की टिप्पणी में अपनी बात नज़र आती है और सतीश पंचम की टिप्पणी अच्छी लगी।

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  2. कवि आप हो ही लिये हैं। क्या कहें। यही कह सकते हैं कि कवि होकर भी जमाये रहें।

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  3. कविता तो नहीं बनी, पर उस के लिए अभ्यास उत्तम है। यह कविता नहीं उस के आने की भूमिका है। यूं समझ लें, जैसे पुंसवन संस्कार। मुझे तो लगा कि आप के गद्य में कविता अधिक होती है। इस रचना में गद्य भरपूर है। आप को बधाई। कविता लिखने के लिए कविता न लिखें। अपनी बात कहने को कविता लिखें। बस कविता जानदार होने लगेगी।

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  4. आपकी कविता मे दर्द है, यथार्थ है, मेहनत है, पुरुषार्थ है।दर्द जो हमे रिक्शा चलाने मे होता है।यथार्थ ऐसा जो रिक्शे के पहियों जितना सच है।मेहनत, जो पसीना बहाने मे होती है।पुरुषार्थ इस तरह, किसी महिला को रिक्शा चलाते देखा है कभी?अब पुरस्कार स्वरुप टिप्पणी भी झेली जाए।एक रिक्शेवाला ही आपकी कविता को सही तरह से समझ सकता है।-कानपुरी रिक्शेवाला(भैया, कविता करते करते, हमारे किराए के पैसे देना मत भूल जाना। इत्ता वजनी शरीर हम चार किलोमीटर ढो कर लाए है।)

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  5. परिवार एवं मित्रों सहित आपको जन्माष्टमी पर्व की बधाई एवं शुभकामनाएं ! कन्हैया इस साल में आपकीसमस्त मनोकामनाएं पूर्ण करे ! आज की यही प्रार्थनाकृष्ण-कन्हैया से है !आज कविता लिखने का अच्छा आइडिया मिला !हम भी सोच ही रहे थे पर आज समझ आगया !बहुत जल्दी हम भी कविता लिखना शुरू कर रहे हैं !दही का जिक्र .. कन्हैया का मन पसंद व्यंजन ..!पुन: बहुत बहुत बधाईयाँ जन्माष्टमी पर्व की

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  6. जिसे कविता समझ नहीं आएगीवो भी अपनी नादानी छिपायेगाबतलायेगा सब समझ गया हूंकविता की यही खासियत हैकविता में यही रूमानियत हैथोड़ी तुक मिला दो फिरउसमें विचार और कल्‍पनायेंसंजो दो और कविता केभरपूर मजे लो, मजे दो

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  7. कवियों ने आपको कलकत्ता में ऐसा कर दिया,वर्ना ब्लागर आप भी थे बड़े काम के। शिवकुटी से गोविन्दनगर फोटू खींचने जाने का काम किया है, यह है एक ब्लागर का समर्पण!

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