शब्दों का टोटा


संकल्प: हम भी पटखनी खाने को तैयार हैं!

संकल्पीय शर्त: बशर्ते हजार पांच सौ नये नकोर, ब्लॉग पर प्रयोग योग्य, देशज/संस्कृताइज्ड शब्दों का भण्डार मिल सके।

असल में शब्दों का पड़ रहा है टोटा।1 दफ्तर में पढ़ते हैं फाइलों की सड़ल्ली नोटिंग या घसीटे हुये माई-डियरीय डेमी ऑफीशियल पत्र/सर्कुलर। हिन्दी में कुछ पढ़ने में नहीं आता सिवाय ब्लॉग के। नये शब्दों का वातायन ही नहीं खुलता। wierd मन हो रहा है चार छ महीने की छुट्टी ले पटखनी खाये पड़ जायें और मोटे-मोटे ग्रन्थ पढ़ कर विद्वतापूर्ण ठेलें। बिना मुखारी किये दिन में चार पोस्ट। शेविंग न करें और दस दिन बाद दाढ़ी बड़ी फोटो चफना दें ब्लॉग पर।

शब्दों का भी टोटा है और जिन्दगी भी ढूंढ रही है फुरसत। मालगाड़ी का इन्जन नम्बर नोट करते करते लाख टके की जिन्दगी बरबाद हो रही है। जीनत अम्मान तो क्या, फिल्म की एक्स्ट्रा भी देखने का टाइम नहीं निकल पा रहा।

मिठास है गुम। ब्लॉग की सक्रियता की सैकरीन के लिये शुगर-फ्री की लपेटी पोस्टें लिखे जा रहे हैं।

हम शर्त लगा सकते हैं- अस्सी परसेण्ट ब्लॉगर इसी मनस्थिति में आते हैं। पर कोई हुंकारी थोड़े ही भरेगा! अपनी पोल खोलने के लिये दम चाहिये जी!

पत्नीजी की त्वरित टिप्पणी: बहुत दम है! हुंह! चार महीने की छुट्टी ले कर बैठ जाओगे तो तुम्हें झेलेगा कौन। और चार दिन बाद ही ऊब जाओगे एकान्त से!

1. शब्दों का टोटा यूं है कि पहले उसे अंग्रेजी के शब्दों से पूरा किया जाता था, अब उत्तरोत्तर अवधी के देशज शब्दों से पूरा किया जा रहा है – "लस्तवा भुलाइ गवा" छाप!


Night

और कविता कोश से लिया एक फिल्मी गीत:

मुझ को इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो/शमीम जयपुरी

मुझ को इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो

जिसकी आवाज़ रुला दे मुझे वो साज़ न दो

आवाज़ न दो…

मैंने अब तुम से न मिलने की कसम खाई है

क्या खबर तुमको मेरी जान पे बन आई है

मैं बहक जाऊँ कसम खाके तुम ऐसा न करो

आवाज़ न दो…

दिल मेरा डूब गया आस मेरी टूट गई

मेरे हाथों ही से पतवार मेरी छूट गई

अब मैं तूफ़ान में हूँ साहिल से इशारा न करो

आवाज़ न दो…


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

31 thoughts on “शब्दों का टोटा

  1. जीनत अम्मान तो क्या, फिल्म की एक्स्ट्रा भी देखने का टाइम नहीं निकल पा रहा। क्या बात है हमारी जेनेरिक पोस्ट का इतना असर ;)छुट्टी लेकर बैठने की कामना करना ही अच्छा लगता है उसे इंपलीमेंट करने की जुर्रत करने से बड़ी शायद ही कोई गलती होती है

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  2. हम जैसे भाषा के अल्पज्ञानियों के लिए तो शब्दों के होलसेल सप्लायर आपलोग ही हैं, ज्ञानदत चचा. आपके यहाँ अकाल पड़ गया तो हम तो भूखे मर जाएंगे

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  3. क्या ये केवल शब्दों के लिए ? शब्दों से ज्यादा तो मुझे जिंदगी के फुरसत ढूंढने वाली बात लग रही है. और उसे तो ब्लॉग से भी फुर्सत देनी चाहिए कभी-कभी. कभी अपनी जगह और मोबाइल/इन्टरनेट से दूर १०-१५ दिन रह कर देखिये. सुन के सम्भव नहीं लगता पर २-३ दिन तो सम्भव है ही. रूटीन जिंदगी से अलग बड़ा मजा आता है… मुझे तो अपनी मोनोटोनस जिंदगी झेली नहीं जाती इसलिए १५ दिन से कम की छुट्टी नहीं लेता. इसलिए आपकी गंगायात्रा वाली बात बहुत भली लगी थी. वैसे आप दाढ़ी बढाकर एक फोटो तो लगा ही दीजिये ! और अगर छुट्टी पर जाएँ भी तो कुछ पोस्ट शेड्यूल करके :-)

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  4. शव्दो का टोटा, अरे वाह, भारत मै अब शव्दो का भी टोटा, अजी बिन शव्दो के ही लेख लिख दिया करो..:) धन्यवाद

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  5. आलोक पुराणिक के बताये कोर्स के आगे का कोर्स है चप्पल चटकाऊ कोर्स। नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे यायावरी करिये भाषा टिच्चन हो जायेगी और शब्दों के टोटे को लग जायेंगे सोंटे!

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  6. ब्‍लाग जगत में मैं तो अभी ‘दुध मुंहा’ हूं, दो साल भी नहीं हुए हैं मुझे। किन्‍तु देख रहा हूं कि यहां अगम्‍भीरता अधिक पसरी हुई है और यथास्थिति में अधिक विश्‍वास किया जाता है। मेरा सुदृढ विश्‍वास है कि ब्‍लाग के जरिए वे सब परिवर्त‍न लाए जा सकते हैं जिनके लिए इस देश के असंख्‍य असंगठित लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं। ‘ब्‍लाग विधा’ एक धारदार और परिणामदायी प्रभावी औजार का काम कर सकती है।ऐसे में आपको यदि शब्‍दों का टोटा अनुभव हो रहा हो तो यह तो ‘मामूली से भी अधिक मामूली’ बात है।किन्‍तु मेरी इन बातों को मेरी निराशा न समझा जाए। ब्‍लाग विधा तो खुद अभी ‘दुध मुंही’ है। अभी तो यह पालने में ही किलकारियां मार रही है। इसे ‘समझ’ आने पर यह चुप नहीं बैठेगी।

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  7. अगर आपके पास शब्दो का टोटा है तो फ़िर हमारे पास तो अकाल है,कंगाली है।वैसे आलोक जी आईडिया न जमे तो रेलवे प्लेटफ़ार्म भी बढिया सोर्स है,गर बुरा न लगे तो ट्राई करियेगा।

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  8. सच कहूँ…ऐसी पोस्ट पढ़कर तो हम भी कसम खा के बहक सकते हैं.शब्दों का टोटा…और उस पर इतने सधे हुए शब्द !===========================कमाल से कुछ अधिक है यह साहब. हम तो मुरीद हो गए हैंआपके इस अंदाज़ के…सच !=======================आभारडॉ.चन्द्रकुमार जैन

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