सांझ घिर आई है। पीपल पर तरह तरह की चिड़ियां अपनी अपनी आवाज में बोल रही हैं। जहां बैठती हैं तो कुछ समय बाद वह जगह पसन्द न आने पर फुदक कर इधर उधर बैठती हैं। कुछ एक पेड़ से उड़ कर दूसरे पर बैठने चली जाती हैं।
क्या बोल रहीं हैं वे?! जो न समझ पाये वह (मेरे जैसा) तो इसे अभिव्यक्ति का (वि)स्फोट ही कहेगा। बहुत कुछ इण्टरनेट जैसा। ब्लॉग – फीड रीडर – फेसबुक – ट्विटर – बज़ – साधू – महन्त – ठेलक – हेन – तेन! रात होने पर पक्षी शान्त हो जाते हैं। पर यहां तो चलती रहती है अभिव्यक्ति।
फलाने कहते हैं कि इसमें अस्सी परसेण्ट कूड़ा है। हम भी कह देते हैं अस्सी परसेण्ट कूड़ा है। पर क्या वाकई? जित्तू की दुकान पर समोसा गटकते लड़के पारिवारिक सम्बन्धों की गालियों की आत्मीयता के साथ जो कहते हैं, वह जबरदस्त स्टिंक करता कचरा भी होगा और नायाब अभिव्यक्ति भी। अभिव्यक्ति क्या सभ्य-साभ्रान्त-भद्र-एलीट की भाषाई एलिगेंस का नाम है या ठेल ठाल कर मतलब समझा देने का?
एक बात और। लोग इतना अभिव्यक्त क्यों कर रहे हैं इण्टरनेट पर। क्या यह है कि अपने परिवेश में उन्हे बोलने के अवसर नहीं मिलते? क्या अड्डा या पनघट के विकल्प शून्य हो गये हैं। आपस में मिलना, चहमेंगोईयां, प्रवचन, कुकरहाव, जूतमपैजार क्या कम हो गया है? लोग पजा गये हैं धरती पर और सब मुंह पर टेप लगाये हैं? ऐसा तो नहीं है!
मैं तो बहुत प्रसन्न होऊं, जब मेरा मोबाइल, फोन, दफ्तर की मीटिंगें और कॉन्फ्रेंस आदि बन्द हो जायें – कम से कम कुछ दिनों के लिये। यह विशफुल थिंकिंग दशकों से अनफुलफिल्ड चल रही है। वह अगर फुलफिल हो जाये और रचनात्मकता के अन्य क्षेत्र मिलें तो शायद यह ब्लॉग-स्लॉग का चार्म कम हो। शायद अपनी सफलता के क्षेत्र का सामान्य ओवर-अभिव्यक्ति का जो हाई-वे है, उससे इतर आदमी अपनी पगडण्डी बना चलना चाहता है। पर शायद ही – निश्चित नहीं कह सकता।
यह स्फोट समझ नहीं आता। पता नहीं समझशास्त्री क्या कहते हैं इस बारे में!

मेरी समझ में अभिव्यक्ति मतलब समझा देने का ही नाम है, चाहे ठेल-ठाल के ही सही।
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अपने विचारों को अभिव्यक्ति देने की बेचैनी तो होती ही है .. जहां भी जो साधन मिल जाए .. उसका फायदा उठाते ही आए हैं हम !!
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प्रस्फोट, विस्फोट और प्लेन 'स्फोट' में अंतर बताइए।
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बकधुन बात के अवसर बढ़े हैं तो लोग सरेआम उसका फायदा ले रहे हैं – इंटर्नेट ही क्यों नए भी जुड़े हैं जैसे माल । एयर कंडीशंड माहौल में फोकट की बकधुन … बकधुनें हर जगह चल रही हैं । बस कुछ जगहों पर हमने जाना छोड़ दिया है। कल ही बात हो रही थी कि ट्रेनों में अब उस तरह की गरमागरम बहसें नहीं होतीं। मैंने उनसे कहा, अमाँ तुम अपग्रेड हो कर ए सी क्लास में आ गए हो। जरा स्लीपर में जाओ – लंडूरे सानिया की शादी से लेकर बाबा रामदेव की जवान काया के राज तक पर गुत्थमगुथ्था हो रहे होंगे। .. उसने मुंह बिचका दिया, उसे 'सर्वहारा की पाद' से अब परेशानी होती है।
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चुप्पै चाप ऐसे ही बने रहिये ज्ञान जी -यद्याचरेत श्रेष्ठः तद्देवो इतरो जनः …..आपके पगडंडी पकड़ लेने से ब्लॉग गलियाँ वीरान हो जायेगीं माई बाप -ऐसा जुल्म मत धारो महराज!
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सुबह सुबह सुनने को मिलती हैं बीबी की बतियाँफिर कोई टेलीफोनघऱ से निकलते ही नुक्कड़ पर गाड़ियों का जमघटट्रेफिक में हॉर्न की आवाजेंपान की दुकान पर दो-दो बाबूलालएक पान बनातादूसरा हवा में झाँकते हुए दुनिया के शत्रुओं को कोसताफिर अदालत दिन भर कामकाम के बीच फुरसत के वक्त मेंकॉफी के साथ दुनिया भर की बातेंबीच में लड़ते, झगड़ते, समझौता करते लोगखूब सुनता हूँ खूब बोलता हूँअभिव्यक्ति मोहताज नहींकेवल इंटरनेट कीपर यहाँ का आनंद कुछ और हैकुछ काम की बातेंकुछ तसल्ली बख्शकुछ कुछ उत्तेजनापूर्णबेमतलब कुछ लोगों से आदानप्रदानबाकी दुनिया तो बहुत मतलबी है।
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अभिव्यक्ति तो कर ही रहे हैं लोग..वैसे तो हमरे हियाँ की गोरी पनघट पर मिलती नहीं, ई लोग जाड़ा में घट होतीं हैं, नज़रे नहीं आतीं और गर्मी में घाट पर होती हैं इसीलिए …ई ऑप्शन तो हइये नहीं है हमरे लिए….बाकि अभिव्यक्ति कोई भी हो माध्यम होना ही चाही…और इन्टरनेट से बेहतर कौन माध्यम है भला, हींग लगे न फिटकिरी रंग आये चोखा….जो मर्ज़ी अभिव्यक्त कीजिये और पोस्टिया दीजिये….सबसे अच्छी बात, आप खुल के पाहिले अभिव्यक्त कर देते हैं कोई टोकने वाला नहीं ….बाद में फिर किसी को बोलने का मौका मिलता है….जबकि बात-चीत में आप कहेंगे फिर दूसरा कहेगा फिर आप कहेंगे…और अगर जो सामने वाला पार्टी तगड़ा हुआ तो आप सिर्फ सुनेंगे…तो चल गयी न अभिव्यक्ति तेल लेने…हाँ नहीं तो…!!!और वो बात जो आप कभी कहीं किसी से नहीं कह पाए आप कह देते हैं, अंजाम कि चिंता किये बगैर…दूसरी बात स्कोप तो देखिये ….आपकी बात कितनी दूर तक जाती है…और instant reward …है टिप्पणी, और आप वही करते हैं जो आपको सबसे ज्यादा पसंद है…बिना किसी हील हुज्ज़त के….जरूरी नहीं कि कविता, कहानी ही होवे, खाना-पकाना, पहलवानी, कोई भी कलाकारी होवे कि करतब ..सब कुछ समाहित हो सकता है इसमें…तो काहें कोई अपन पैसा, समय और मगज कहीं और लगावेगा…देखा जाए तो सब अपनी पगडण्डी ही बना रहे हैं….बस एक जैसी पगडंडियाँ, जुडी हुई लगती हैं जो हाई वे का भ्रम देती हैं…बहुत अच्छा लगा आपको पढना…आभार..
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आपस में मिलना, चहमेंगोईयां, प्रवचन, कुकरहाव, जूतमपैजार क्या कम हो गया है? लोग पजा गये हैं धरती पर और सब मुंह पर टेप लगाये हैं? ऐसा तो नहीं है!'ऐसा ही है, कम से कम जो लोग इंटरनेट पर अभिव्यक्त कर रहे है, क्योंकि यहाँ भी वो सब कुछ उपलब्ध है.
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हमें नहीं मालूम किन्तु हमारे पास अड्डा पनघट वाला विकल्प वाकई नहीं है. घर बैठे खिड़की से बाहर ताकें या माईक्रो सॉफ्ट वाली खिड़की से अन्दर…ये अन्दर ताकना ज्यादा भाता है. जबाब आता है न!!
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मसला बड़ा कन्प्यूजिंग है…लेकिन ये तो सही है कि अगर जिंदगी (पेशेवर) मोहलत तो दे शायद हम कोई और शगल इख्तियार कर ही लेते…हां भी और शायद नीं भी…तब शायद यह एकमात्र मजबूरी नहीं रह जाती…आलोक साहिल
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