हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात हो रही है। यह एक नोबल कॉज (noble cause) है। लोग टपकाये जा रहे हैं पोस्ट। वे सोचते हैं कि अगर वे न टपकायें पोस्ट तो दंगा हो जाये। देश भरभरा कर गिर जाये। लोग बाग भी पूरे/ठोस/मौन/मुखर समर्थन में टिपेरे जा रहे हैं – गंगा-जमुनी संस्कृति (क्या है?) लहलहायमान है। इसी में शिवकुमार मिश्र भी फसल काट ले रहे हैं।
उधर सुरेश चिपलूणकर की उदग्र हिन्दुत्व वादी पोस्टों पर भी लोग समर्थन में बिछ रहे हैं। केसरिया रंग चटक है। शुद्ध हरे रंग वाली पोस्टें पढ़ी नहीं; सो उनके बारे में कॉण्ट से!
मैं यह सोच कर कि शायद रिटायरमेण्ट के बाद भाजपा में जगह मिल जाये, सांसद जी से पूछता हूं – क्या हमारे जैसे के लिये पार्टी में जगह बन सकती है। अगर वैसा हो तो भाजपाई विचारधारा सटल (subtle) तरीके से अभी से ठेलने लगें। वे कहते हैं – क्यों नहीं, आप जैसे जागरूक के समर्थन से ही तो पार्टी सत्ता में आयेगी। मायने यह कि आप बतौर वोटर ही रह सकते हैं।
हमें अपने ब्लॉग के लिये कोई दमदार कॉज ही नहीं मिल रहा।
Where is The Cause for my Blogging!
क्या करें, हिन्दी सेवा का कॉज लपक लें? पर समस्या यह है कि अबतक की आठ सौ से ज्यादा पोस्टों में अपनी लंगड़ी-लूली हिन्दी से काम चलाया है। तब अचानक हिन्दी सेवा कैसे कॉर्नर की जा सकती है? हिन्दी सेवा तो मेच्योर और समर्थ ब्लॉगरी में ही सम्भव है। नो चांस जीडी!
खैर, कई ब्लॉगों पर देखता हूं कि मेच्यौरियत दस बीस पोस्टों में ही लोग ले आ रहे हैं। जबरदस्त कॉज बेस्ड ब्लॉगिंग का नमूना पेश कर रहे हैं। इत्ती मैच्यौरियत है कि ज्यादा टाइम नहीं लग रहा बुढ़ाने में। पर हमारी कोंहड़ा-ककड़ी ब्राण्ड पोस्टों में कोई मेच्यौरियत सम्भव है?!
ज्यादा लायक न हो तो किसी कॉज बेस्ड ग्रुप को ही ज्वाइन कर लो जीडी। साम्यवादी-समाजवादी-छत्तीसगढ़ी-इलाहाबादी-जबलपुरी-ब्राह्मणवादी-ठाकुरवादी-नारीवादी-श्रृंगारवादी-कवितावादी-गज़लवादी कुछ भी। पर किसी खांचे में फिट होने की कोशिश नहीं की अब तक। बड़ी कसमसाहट है।
कभी कभी लगता है कि “मानसिक हलचल” का टीन टप्पर दरकिनार कर दें और अलग से कॉजबेस्ड ब्लॉग बनायें – “शिवकुटी का सामाजिक विकास”। पर मेरे आस पास भैंसों के तबेले भर हैं। कम्प्यूटर नहीं हैं। इण्टरनेट की बात दूर रही।
खैर, अपनी जिन्दगी के लिये भी कॉज ढूंढ़ रहा हूं और ब्लॉगरी के लिये भी। और उस प्रॉसेस में जबरदस्त मूड स्विंग हो रहे हैं!

ji, apan to pahle shiv ji ke 5 salaah pe aapki raay jan na chahenge…;)vaise praveen pandey jee ne ekdam sahi bat kahi hai..mujhe lagta hai ye Zeal namak mumbai niwasi sajjan ko mai janta hu, dekhte hain unse baat kar ke aur bhi, unki raay
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कोंहड़ा-ककड़ी में जो मेच्यौरियत ढूंढ़ ले वो ऋषि-महर्षि होता है ! ढूंढ़ते रहिये जरूर मिलेगा. :)
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आज मेरी दृष्टि में बहुत ही इर्रिटेटिंग ब्लॉगर हैं. मुझे बहुत ही इर्रिटेट करते हैं.आज शायद तीसरी बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ और हर बार बहुत ही नकारात्मक टिप्पणी की है,कारण आप की भाषा में जबदस्ती ठूंस कर भरे जाने वाले अंग्रेजी के शब्द.आज एक प्रश्न करना चाहता हूँ कि आप ऐसे क्यों हैं !!मैं तो बच्चा हूँ और सहिष्णु भी. बच्चा हूँ अतः मेरी इस टिप्पणी की बदतमीजी को क्षमा करिए. सहिष्णु हूँ पर मेरी सहिष्णुता यहाँ पर क्यों जवाब दे जाती है !!मैं आपको पसंद करूँ, इसके लिए क्या करना चाहिए !!पसंद न भी कर पाऊं तो एक कारण तो दीजिये कि मैं आपके साथ सहानुभूति भरा व्यवहार कर पाऊं.यह प्रश्न इसलिए पूछा है क्योंकि मैं सभी से प्रेम करता हूँ, चाहे वह कितना ही पतित क्यों न हो पर आप से नहीं जुड़ पाया, यह बात मुझे पीड़ा देती है.इसका उत्तर मुझे मनुष्यता की और प्रेरित करेगा, अतः अवश्य दें.धन्यवाद.
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@ अनूप और सतीश पंचम – मूड कोई डोरी से सस्पेण्डेड बण्टा नहीं है। वह होता तो डोरी निकाल बण्टा जेब में धर लेते! ज्ञानजी आप शायद यह विश्वास न करें लेकिन आपको सच्ची बतायें कि आपकी इस बात पर एक बहुत मजाकिया टिप्पणी करने का मन हुआ लेकिन फ़िर अपना वायदा याद आ गया कि ब्लॉगजगत के बड़े-बुजुर्गों से मौज नहीं लेनी चाहिये। यह याद आते ही मैं फ़ट से विनम्रता च श्रद्धा के मोड में आ गया और फ़ुल आदर के साथ निवेदित करना चाहता हूं कि:१. आपकी पोस्ट बांचते ही मुझे तड़ से हाईस्कूल के पहले का विज्ञान याद गया। सरल लोलक की परिभाषा भी। मुझे लगा कि आपने साक्षात किसी लोलक का मानवीकरण करते अपनी पोस्ट में सटा दिया और सटासट स्विंग को मूर्तिमान करके दिखा दिया। आप माने या न माने लेकिन आपके ब्लॉग पर यह स्विंग लीला मैं घणे दिनों से देख रहा हूं। इसमें लोलक की लम्बाई आपकी आठ-दस पोस्टों की संख्या के बराबर हैं, लोलक (बोले तो बंटा) आपकी नो चांस जीडी है। आठ-दस पोस्टों की लम्बाई के बाद यह नो चांस जीडी या फ़िर ट्यूब खाली हुई जीडी का लोलक अपनी मूल स्थिति के आपपास टहलने लगता है।२.शिवकुमार मिश्र के सुझावों पर अपने विचार बताइयेगा न! आखिर वे आपके साथ एक ब्लॉग साझा रखते हैं। कई बार आपके लिये ब्लॉगपोस्ट/टिप्पणी लाठी भांजकर अकेले चोट खा चुके हैं? इतना तो अधिकार उनका बनता ही है उनका।३. प्रवीण पाण्डेयजी आपके ब्लॉग पर काफ़ी दिन से लिखते हैं। लेकिन ये बतायें कि इनको आपने इंट्रोड्यूस कब किया? बताया तक नहीं! उपरोक्त बातें केवल निवेदित करना चाहता हूं! यह सोच नहीं पा रहा हूं कि जो चाहता हूं वह करूं कि मटिया दूं! बताइये!
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आपका मतलब है बाकी सब ब्लॉगर कॉज बेस्ड ब्लॉगिंग कर रहे हैं? सबकी 'कॉजलेसनेस' उजागर करने का यह जीडीपीयन स्टाइल है?
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मैं तो कुछ सोच ही नहीं पा रहा हूँ की क्या प्रतिक्रिया करूँ,प्रतिक्रिया करूँ भी की नहीं करू,करूँ भी तो भला क्यूँ करूँ,प्रतिक्रिया दर्ज करनें से -आखिरे मुझे क्या हासिल होगा…तो चलो प्रतिक्रिया ही नहीं करते है…~~~~~~~~~~~~जिन ढूँढा तिन पाइयॉं,गहरे पानी पैठ।मैं बपुरा बूडन डरा,रहा किनारे बैठ।।
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बेकॉज ब्लॉगिंग बेहतर है। मिसलेनियस माल मिलता है आपके यहाँ। फुटकर, कोहड़ा, ककड़ी, गंगा, बकरी, हल्का, भारी सब मौजूद है। आखिरी ब्लॉगिंग खुदई एक काज है।
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सबकुछ तो ठीक चल रहा है !!!
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पहले सोचा छोटी सी टिप्पणी करूँशो मस्ट गो ऑनफिर ध्यान आया कि शीर्षक में कॉज़ हैऐसा लगा कि कहीं मामला शो-कॉज़ का तो नहीं :-D
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@ Zeal > After all 'Ishwar' ko jawaab dena hai…."bachpan mein royee nahi, Jawani mein soyee nahi……I was busy writing comments .————-Oh dear, are you Sameer Lal is disguise?! :-)
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