छलकना गुस्ताख़ी है ज़नाब


हिमांशु मोहन जी ने पंकज उपाध्याय जी को एक चेतावनी दी थी।

“आप अपने बर्तनों को भरना जारी रखें, महानता का जल जैसे ही ख़तरे का निशान पार करेगा, लोग आ जाएँगे बताने, शायद हम भी।”

यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। प्रवीण बेंगळुरू रेल मण्डल के वरिष्ठ मण्डल वाणिज्य प्रबन्धक हैं।

हिमांशु जी का यह अवलोकन बहुत गहरे तक भेद कर बैठा है भारतीय सामाजिक मानसिकता को।

पर यह बताईये कि अच्छे गुणों से डर कैसा? यदि है तो किसको?

बात आपकी विद्वता की हो, भावों की हो, सेवा की हो या सौन्दर्य की क्यों न हो………..छलकना मना है।

आप असभ्य या अमर्यादित समझे जायेंगे, यदि छलकेंगे।

छलकना गुस्ताख़ी है ज़नाब

अपनी हदों में रहो,

पानी भरा लोटा मन में जो है, सम्हाल कर कहो,

जब बुलायें लब, तुम्हें ईशारों से,

तभी बहना अपने किनारों से,

क्या हो, क्यों इतराते हो,

बहकता जीवन, क्यों बिताते हो,

सुनो बस, किसने हैं माँगे जबाब,

छलकना गुस्ताखी है ज़नाब।

सह लो, दुख गहरा है,

यहाँ संवाद पर पहरा है,

भावों को तरल करोगे,

आँखों से ही निकलोगे,

अस्तित्व को बचाना सीखो,

दुखों को पचाना सीखो,

आँखों का काजल न होगा खराब,

छलकना गुस्ताखी है ज़नाब।

सौन्दर्य, किसका,

तुम्हारा या आत्मा का,

किसके लिये रचा है,

अब आप से कौन बचा है,

अपने पास ही रखिये,

सुकून से दर्पण में तकिये,

हवा में जलन है, छिपा हो शबाब

छलकना गुस्ताखी है ज़नाब।

आपको किसी का जुनून है,

रगों में उबलता खून है,

गरीबों के लिये होगा,

भूख का या टूटते घरों का,

उनका जीवन, आपको क्या पड़ी,

यहाँ पर सियासत की चालें खड़ीं,

आस्था भी अब तो माँगे हिसाब,

छलकना गुस्ताखी है ज़नाब।


कल कुश वैष्णव ने यह कहा कि एक ही पोस्ट को ब्लॉगर और वर्डप्रेस पर प्रस्तुत करना गूगल की नियमावली में सही नहीं है। लिहाजा मैं मेरी हलचल पर भी पोस्ट करने का अपना प्रयोग बन्द कर रहा हूं।

पत्नीजी कहती हैं कि मेरी हलचल पर कुछ और पोस्ट करो। पर उस ब्लॉग की एक अलग पर्सनालिटी कैसे बनाऊं। समय भी नहीं है और क्षमता भी! smile_sad