मेला फिर!

मेला फिर लगेगा। अभी तड़के देखा – तिकोनिया पार्क में झूला लगने लगा है। लगाने वाले अपने तम्बू में लम्बी ताने थे। कल से गहमागहमी होगी दो दिन। सालाना की गहमागहमी।

अनरसा, गुलगुला, नानखटाई, चाट, पिपिहरी, गुब्बारा, चौका, बेलन, चाकू से ले कर सस्तौआ आरती और फिल्मी गीतों की किताबें – सब मिलेगा। मन्दिर में नई चप्पलें गायब होंगी और भीड़ की चेंचामेची में जेबें कटेंगी।

जवान लोग मौका पा छोरियों को हल्के से धकिया-कोहनिया सकेंगे। थोड़ा रिक्स रहेगा पिटने का! पर क्या!? मेला तो है ही मेल की जगह। थोड़ा रिक्स तो लेना ही होगा!

Mela2 झूले की तैयारी

Mela1 झूले की तैयारी

Mela3 सजता कोटेश्वर महादेव मन्दिर


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

26 thoughts on “मेला फिर!

  1. मेला के पहले आपके शब्द चित्र ने उसे सजीव कर दिया ….मेला न जाने कितनी भूली बिसरी यादों को कुरेद डालता है ..बिसारती की दूकान ,चोटहिया जलेबी चाटती महिलायें(खायें हैं कभी आप या भाभी जी ?) , गोदना गुदवाती अंकवार भर भेट्तीं रोतीं महिलायें (अब शायद यह दृश्य न दिखे ..भला हो .आवागमन की सुविधाओं का ) ,फिफिहरी /पिपहरी /गुब्बारे /लट्टू /चरखी एक लम्बी फेहरिस्त …और मैंने अपना गोदना इसी मेले में १९८२ में गुदवाया था -दाहिने हाथ में -एक जगह संध्या दूजे ॐ ….(शिनाख्त सनद रहे )इस बार आप भी गुदवायिये न -सिर्फ दो हर्फ़ "रीता "अक्लमंद को इशारा काफी …..

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  2. @ मेला है तो मेल की जगह …थोडा रिस्क तो लेना होगा …:):):):)आजकल के समझदार बच्चे मेले में नहीं जाते …बाकी हम लोंग तो खूब मेला घूमे हैं …बिना रिस्क लिए …!

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  3. जहाँ पर हल्के से धकिया लेने भर में वीरता, बुद्धि कौशल व पुरुषत्व के सारे मुहल्लायी कीर्तिमान स्थापित हो जायें तो फिर कलमाडीवत कॉमन वेल्थ खेलों का आयोजन किसलिये?

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  4. एक जमाना पहले हमारे घर में बृज के लोकगीतों की एक कैसेट हुआ करती थी। उसमें एक गीत था कि एक स्त्री अपने पति से मेला ले जाने की जिद कर रही है। शर्म आ रही है कि पांच मिनट तक दिमाग पर जोर डालने के बाद १ पंक्ति भी याद नहीं आयी।चाट के तो क्या कहने, वाह वाह…एक अरसा हुआ अच्छी चाट खाये।

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