मेला फिर लगेगा। अभी तड़के देखा – तिकोनिया पार्क में झूला लगने लगा है। लगाने वाले अपने तम्बू में लम्बी ताने थे। कल से गहमागहमी होगी दो दिन। सालाना की गहमागहमी।
अनरसा, गुलगुला, नानखटाई, चाट, पिपिहरी, गुब्बारा, चौका, बेलन, चाकू से ले कर सस्तौआ आरती और फिल्मी गीतों की किताबें – सब मिलेगा। मन्दिर में नई चप्पलें गायब होंगी और भीड़ की चेंचामेची में जेबें कटेंगी।
जवान लोग मौका पा छोरियों को हल्के से धकिया-कोहनिया सकेंगे। थोड़ा रिक्स रहेगा पिटने का! पर क्या!? मेला तो है ही मेल की जगह। थोड़ा रिक्स तो लेना ही होगा!

@अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी –हम त कहे रहे साहित्त से कि हमसे एक कोस दूर रह्यअ! ई कहां से चला आइ हम जैसे खर्बोटहा मनई के लग्गे!
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"जवान लोग मौका पा छोरियों को हल्के से धकिया-कोहनिया सकेंगे। "कोई लौटा दे मेरे बिते हुए दिन….:)
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@ अनरसा, गुलगुला, नानखटाई, चाट, पिपिहरी, गुब्बारा, चौका, बेलन, चाकू से ले कर सस्तौआ आरती और फिल्मी गीतों की किताबें –>> कुल मिलाकर सुन्दर मेलहा-बिम्ब बन रहा है .. !@ जवान लोग मौका पा छोरियों को हल्के से धकिया-कोहनिया सकेंगे। >> जवान-मनोबिग्गान कै सुघर तड़ाव .. ! @ ………. मेला तो है ही मेल की जगह। >> हियाँ साहित्त है ! NOTE : हम ई सब बतकहीं बिना कौनौ पूर्वाग्रह के लिखेन हैं ! अगली प्रविष्टि कै इंतिजार अहै !
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आज कुछ ज़्यादा कहने का मन नहीं है।बस यही कि ये मेले दुनिया में कम न होंगे,अफ़सोस उस में हम न होंगे!
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मेला में जाने पर सबसे पहले जो चीज दिखती है वह गोल चक्कर वाला आसमानी झूला …..कभी किसी तस्वीर में भी देखिए तो वही झूला सबसे पहले दिखता है….स्काय लाईन तक चेंज करने की हैसियत होती है इस झूले में।
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धकिया, कोहनिया कर दोस्तों में ऊंचा भी तो उठना हैप्रणाम
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लखीमपुर मेले में तो ’रामबाण का सूरमा’ भी मिलता था… लैका लोग मुफ़्त में सूरमा लगवाकर मेला घूमते थे.. और डांस पार्टियां भी आती थीं, कहीं तीन गाने तो कहीं पाँच.. फ़ोटू खीचने वाली दुकाने भी रहती थीं जहाँ सिर्फ़ बैकग्राऊन्ड चेंज करो और एफिल टॉवर के पास फोटो लो या ताजमहल के पास..
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युवा युवतियां धक्का देने और धक्का खाने के लिए ही मेले में जाती है. यार्ड में लूस शंटिंग.
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मेला का रिपोर्टिंग का इन्तजार रहेगा. :)
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लाइफ में इतना/थोडा रिक्स तो लेना ही पड़ता है :)
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