आपको भाषाई छद्म देखने हैं तो सब से आसान जगह है – आप ब्लॉगर्स के प्रोफाइल देखें। एक से बढ़ कर एक गोलमोल लेखन। उनकी बजाय अज़दक को समझना आसान है।
हम बेनामी हों या न हों, जो हम दिखना चाहते हैं और जो हैं, दो अलग अलग चीजें हैं। इनका अंतर जितना कम होता जायेगा। जितनी ट्रांसपेरेंसी बढ़ती जायेगी, उतनी कम होगी जरूरत आचार संहिता की। इस की प्रक्रिया में हम जो हैं की ओर नहीं जायेंगे। सामान्यत, सयास, हम जो हैं, उसे जो दिखना चाहते हैं के समीप ले जायेंगे।
दूसरे, अगर हमारा धैय ब्लॉगरी के माध्यम से अपना नाम चमकाने की बजाय अपने गुणों का विकास है। अगर हम क्विक फिक्स कर यहां ट्वन्टी-ट्वन्टी वाला गेम खेलने नहीं आये हैं, अगर हम चरित्रनिष्ठ हैं, तो व्यक्तित्वनिष्ठ आचारसंहिता की क्या जरूरत है?
खैर, यह बड़ी बात है। अन्यथा, आचारसंहिता बनाने की बात चलती रहेगी, और उसका विरोध दो प्रकार के लोग करते रहेंगे – एक वे जो पर्याप्त आत्मसंयमी हैं, अपनी पोस्ट और टिप्पणियों के पब्लिश होने के निहितार्थ जानते हैं और अपने को सतत सुधारने में रत हैं; और दूसरे वे जो उच्छृंखल हैं, मात्र हीही-फीफी में विश्वास करते हैं। यहां मात्र और मात्र अपने उद्दीपन और दूसरों के मखौल में अपनी वाहावाही समझते हैं। [1]
आप कहां हैं जी?
(हम तो यहीं हैं, बहुत समय से भैंसों के तबेले और गंगा तट के समीप!)
[1] शायद तीसरी तरह के लोग भी हों, जो किसी (आचारसंहिता बनाने वालों) की चौधराहट नहीं स्वीकारते।

हम मस्त राम हे जी, यह आचारसंहिता का तो पता नही लेकिन हमे सब अपने ही लगते हे,भेंस वाले तबेले वाले, रेहडी वाले, इन से रोनक लगी रहती हे, हमारे यहां सिर्फ़ आचारसंहिता ही हे , इसी लिये चारो ओर विरान लगता हे, सडके सुनसान…
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हम तो अपने आपको तीसरी जगह पाते है -जो किसी (आचारसंहिता बनाने वालों) की चौधराहट नहीं स्वीकारते।
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ब्लॉग्गिंग में आचार संहिता की बात करना बेकार है. ना ऐसा हो सकता है और ना कोई ज़रूरत है ऐसा करने की.हाँ, आपने पूछा कि कहाँ हैं आप, तो मैं तो ब्लॉग्गिंग के माध्यम से खुद को समझने की कोशिश कर रही हूँ.एक ब्लॉग के माध्यम से खुद से जुड़ी चीज़ों और लोगों को समझने की कोशिश… क्योंकि बहुत सी बातें उस समय समझ में नहीं आतीं और बाद में पता चलता है कि माता-पिता या किसी अन्य प्रियजन ने ऐसा क्यों कहा था या किया था.दूसरे ब्लॉग से कुछ सिद्धांतों की चीरफाड़ और समाज के प्रति अपने सरोकारों को अभिव्यक्त करने की कोशिश.और तीसरे ब्लॉग से औरत होने की अनुभूतियों को बाँटने की कोशिश.
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दैर-ओ-हरम में मिलता गर चैन क्यों जाते मयखाने लोग,जो भी आये हैं समझाने कितने हैं बेगाने लोग ।कम लिखा ज्यादा समझना :)
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हम इस दुनियादारी के चक्कर में नहीं पड़ते, अपनी कहने आये हैं, जो लिख देते हैं. दूसरों के लेख पढ़ते हैं, कोशिश करते हैं कि टिप्पणी अवश्य दें. बाकी किसी चीज में विश्वास नहीं. इसके बाद तो फिर यही है कि जाकी रही भावना जैसी…
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आचारसंहिता = code of conduct very simple to make but needs guts and patience to get it implemented on the public platform people have to be told time and again that they are wrong and time again the one who tells is crucified truth does prevail in the end and also the strength to get the truth enforced
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सबकुछ अगर ट्रांस्परेंट होगा तो शायद आचार संहिता की ज़रूरत ना पड़े, पर यह आचार संहिता बनाएगा कौन, क्या कोई सरकारी एजेंसी या फिर कोई संगठन. जहाँ तक मैं समझता हूँ ब्लोगिंग अभी अपने बाल्य काल मैं हैं और अभी बहुत कुछ शेष है. मनोज खत्री
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`आप कहां हैं जी'मात्र हीही-फीफी में :)
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द्वेत और अद्वेत के सदृश
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चचा ग़ालिब को जानते है आप …..उन्होंने कहा था …..हमको मालूम है जन्नत की हकीक़त लेकिन दिल के बहलाने को ये ख्याल अच्छा है ….
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