अनुराग शर्मा जी ने पहनाई गांधी टोपी!



अनुराग जी ने मेरी पिछली पोस्ट के मद्देनजर मुझे गांधी टोपी पहना दी, ई-मेल से!

भला मैं पहनने से इंकार कैसे कर सकता हूं – भले ही यह टोपी थोड़ी तिरछी लग रही है। 😆

अनुराग शर्मा जी द्वारा पिट्सबर्ग से पहनाई गांधी टोपी!

गांधी टोपी



गांधी टोपी का मेरा बनाया अनगढ़ स्केच

बहुत अर्से से यह मुझे बहुत लिज़लिजी और भद्दी चीज लगती थी। व्यक्तित्व के दुमुंहेपन का प्रतीक!

मुझे याद है कि एक बार मुझे अपने संस्थान में झण्डावन्दन और परेड का निरीक्षण करना था। एक सज्जन गांधी टोपी मुझे पहनाने लगे। मैने पूरी शालीनता से मना कर दिया और अपनी एक पुरानी गोल्फ टोपी पहनी।

पर, अब कुछ दिनों से इस टोपी के प्रति भाव बदल गये हैं। मन होता है एक टोपी खादी भण्डार से खरीद लूं, या सिलवा लूं। पहनने का मन करता है – इस लिये नहीं कि फैशन की बात है। फैशन के अनुकूल तो मैं कभी चला नहीं। बस, मन हो रहा है।

इस टोपी की पुरानी ठसक वापस आनी चाहिये। शायद आ रही हो। आप बेहतर बता सकते हैं।


टाटा स्टील का विज्ञापन


टाटा स्टील का एक विज्ञापन यदा कदा देखता हूं – उनके एथिक्स कोआर्डिनेटर (क्या है जी?) के बारे में।

टाटा स्टील का एथिक्स कोऑर्डिनेटर विषयक विज्ञापन - ज्योति पाण्डेय के चित्र के साथ

मुझे नहीं मालुम कि ज्योति पाण्डेय कौन है। विज्ञापन से लगता है कि टाटा स्टील की मध्यम स्तर की कोई अधिकारी है, जिसकी अपने विभाग में ठीकठाक इज्जत होगी और जिसे विज्ञापन में अपना आइकॉन बनाने में सहज महसूस करती होगी।

पर एथिक्स ऐसा विषय है जिसमें अपने व्यक्तित्व/चरित्र को समग्रता से न रखा जाये तो मामला गड्ड-मड्ड हो जाता है। एथिक्स कम्पार्टमेण्टमेण्ट्स में नहीं हो सकता। उदाहरण के लिये अगर आप अपने बच्चों के लिये आदर्श माता पिता नहीं हैं, अगर आप अपनी पुरानी पीढ़ी की फिक्र नहीं करते, अगर आप अपने पड़ोसियों के काम नहीं आते तो मात्र विभागीय एथिक्स को बहुत दूर तक नहीं ले जा सकते!

सो, ज्योति पाण्डेय (जो भी हों) यह समग्रता कितनी और किस प्रकार लाती हैं, जानने की उत्सुकता है।

[वैसे जब एथिक्स की बात चलती है तो चेन्ने की मकान बनाने वाली कम्पनी अलाक्रिटि [Alacrity] याद आती है। उसे कोई अमोल कारनाड़ जी ईमानदारी और नैतिकता के नियमों के आधार पर चलाते थे। नब्बे के दशक की बात है। मैने उनसे उनका कुछ लिटरेचर भी मंगाया था सन 1997 में। कालांतर में वह कम्पनी बन्द हो गयी। चोरकटई के जमाने में एथिक्स बड़ी विषम चीज है! ]


फिलहाल मैं रेलवे अस्पताल में भर्ती हूं। अगले एक दो दिन के लिये। मुझे तेज बुखार और रक्त में संक्रमण था। जिन डाक्टर साहब की छत्र छाया में हूं – डा. विनीत अग्रवाल; वे अत्यंत दक्ष और व्यवहार कुशल डाक्टर हैं। उनके हाथ में अपने को सौंप कर पूर्णत निश्चिंत हुआ जा सकता है – और वही मैं हूं। मुझे विश्वास है कि उनकी चिकित्सा के बाद मैं अस्पताल से निकलूंगा तो अपने प्रति पूर्णत आश्वस्त रहूंगा।

पचपन-छप्पन की उम्र में मधुमेह की पहचान हुई है! मैं भारत के सलेक्ट 5.1 करोड़ नागरिकों में स्थान पा चुका हूं। करेला, आंवला, येलोवेरा आदि भांति भांति के द्रव्यों/उत्पादों के विषय में देखने आने वाले सलाह ठेलने लगे हैं। अम्मा टेप बजाने लगी हैं – सब गरह हमहीं के घरे आवथ ( सब ग्रह हमारे ही घर आता है!)। अस्पताल में पोस्ट लिखना – पब्लिश करना अच्छा लग रहा है!


किताबी कीड़ा (किकी) – फॉर्ब्स इण्डिया रीडरशिप सर्वे



Forbes Lifeमैं किताबी कीड़ा (किकी) विषय को कण्टीन्यू कर रहा हूं। निशांत और कुछ अन्य पाठकों ने पिछले पोस्ट की टिप्पणियों में पुस्तकें खरीदने/पढ़ने की बात की है। हिन्दी में और हिन्दी के इतर भारत में बड़ा पाठक वर्ग है।

पाठकों की रुचि/व्यवहार पर फॉर्ब्स इडिया ने पाठक सर्वे किया था/चल रहा है। फॉर्ब्स इण्डिया लाइफ ने  उसके अंतरिम (?) परिणाम अपनी त्रैमासिक पत्रिका में छापे हैं। इस छापने तक उसमें 2150 से अधिक लोग सम्मिलित हो चुके थे। बहुत रोचक हैं उसके परिणाम।

मेरे ख्याल से हिन्दी पाठक वर्ग को फॉर्ब्स इण्डिया लाइफ के लेख की जानकारी देना बहुत बड़े कॉपीराइट उलंघन का मामला नहीं है; अत: उस सर्वे के पत्रिका में छपे परिणाम मैं प्रस्तुत कर रहा हूं –


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किकी का कथन



किरात नदी में चन्द्र मधु - कुबेरनाथ राय

सतीश पंचम ने मुझे किकी कहा है – किताबी कीड़ा। किताबें बचपन से चमत्कृत करती रही हैं मुझे। उनकी गन्ध, उनकी बाइण्डिंग, छपाई, फॉण्ट, भाषा, प्रीफेस, फुटनोट, इण्डेक्स, एपेण्डिक्स, पब्लिकेशन का सन, कॉपीराइट का प्रकार/ और अधिकार — सब कुछ।

काफी समय तक पढ़ने के लिये किताब की बाइण्डिंग क्रैक करना मुझे खराब लगता था। किताब लगभग नब्बे से एक सौ तीस अंश तक ही खोला करता था। कालांतर में स्वामी चिन्मयानन्द ने एक कक्षा में कहा कि किताब की इतनी भी इज्जत न करो कि पढ़ ही न पाओ! और तब बाइण्डिन्ग बचाने की जगह उसे पढ़ने को प्राथमिकता देने लगा।

फिर भी कई पुस्तकें अनपढ़ी रह गयी हैं और उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। इस संख्या के बढ़ने और उम्र के बढ़ने के साथ साथ एक प्रकार की हताशा होती है। साथ ही यह भी है कि अपनी दस बीस परसेण्ट किताबें ऐसी हैं जो मैं यूं ही खो देना चाहूंगा। वे मेरे किताब खरीदने की खुरक और पूअर जजमेण्ट का परिणाम हैं। वे इस बात का भी परिचायक हैं कि नामी लेखक भी रद्दी चीज उत्पादित करते हैं। या शायद यह बात हो कि मैं अभी उन पुस्तकों के लिये विकसित न हो पाया होऊं!

मेरे ब्लॉग पाठकों में कई हैं – या लगभग सभी हैं, जिनकी पुस्तकों के बारे में राय को मैं बहुत गम्भीरता से लेता हूं। उन्हे भी शायद इस का आभास है। अभी पिछली पूर्वोत्तर विषयक पोस्ट पर मुझे राहुल सिंह जी ने कुबेरनाथ राय की ‘किरात नदी में चन्‍द्रमधु’ और सुमंत मिश्र जी ने सांवरमल सांगानेरिया की भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित पुस्तक ‘ब्रह्मपुत्र के किनारे किनारे’ सुझाई हैं। बिना देर किये ये दोनो पुस्तकें मैने खरीद ली हैं।

इस समय पढ़ने के लिये सांगानेरिया जी की पुस्तक मेरी पत्नीजी ने झटक ली है और कुबेरनाथ राय जी की पुस्तक मेरे हिस्से आई है। कुबेरनाथ राय जी कि पुस्तक में असम विषयक ललित निबन्ध हैं। पढ़ते समय लेखक के प्रति अहोभाव आता है मन में और कुछ हद तक अपनी भाषा/ज्ञान/मेधा की तंगी का अहसास भी होता रहता है।


किकी परसाद पांड़े

खैर, वैसे जब बात किताबों और पढ़ने की कर रहा हूं तो मुझे अपनी पुरानी पोस्ट “ज्यादा पढ़ने के खतरे(?)!” याद आ रही है। यह ढ़ाई साल पहले लिखी पोस्ट है, विशुद्ध चुहुल के लिये। तब मुझे अहसास हुआ था कि हिन्दी ब्लॉगजगत बहुत टेंस (tense) सी जगह है। आप अगर बहुत भदेस तरीके की चुहुल करें तो चल जाती है, अन्यथा उसके अपने खतरे हैं! लेकिन उसके बाद, पुस्तकीय पारायण का टेक लिये बिना, गंगामाई की कृपा से कुकुर-बिलार-नेनुआ-ककड़ी की संगत में लगभग हजार पोस्टें ठेल दी हैं तो उसे मैं चमत्कार ही मानता हूं – या फिर वह बैकग्राउण्ड में किकी होने का कमाल है? कह नहीं सकता।

उस समय का लिखा यह पैराग्राफ पुन: उद्धरण योग्य मानता हूं –

भइया, मनई कभौं त जमीनिया पर चले! कि नाहीं? (भैया, आदमी कभी तो जमीन पर चलेगा, या नहीं!)। या इन हाई फाई किताबों और सिद्धांतों के सलीबों पर ही टें बोलेगा? मुझे तो लगता है कि बड़े बड़े लेखकों या भारी भरकम हस्ताक्षरों की बजाय भरतलाल दुनिया का सबसे बढ़िया अनुभव वाला और सबसे सशक्त भाषा वाला जीव है। आपके पास फलानी-ढ़िमाकी-तिमाकी किताब, रूसी/जापानी/स्वाहिली भाषा की कलात्मक फिल्म का अवलोकन और ट्रेलर हो; पर अपने पास तो भरत लाल (उस समय का  मेरा बंगला पीयून) है!

कुल मिला कर अपने किकीत्व की बैलेस-शीट कभी नहीं बनाई, पर यह जरूर लगता है कि किकीत्व के चलते व्यक्तित्व के कई आयाम अविकसित रह गये। जो स्मार्टनेस इस युग में नेनेसरी और सफीशियेण्ट कण्डीशन है सफलता की, वह विकसित ही न हो सकी। यह भी नहीं लगता कि अब उस दिशा में कुछ हो पायेगा! किकीत्व ब्रैगिंग (bragging) की चीज नहीं, किताब में दबा कीड़ा पीतवर्णी होता है। वह किताब के बाहर जी नहीं सकता। किसी घर/समाज/संस्थान को नेतृत्व प्रदान कर सके – नो चांस! कत्तई नहीं!

आप क्या हैं जी? किकी या अन्य कुछ?!

प्रभुजी, अगले जनम मोहे किकिया न कीजौ!