खरमोर


रतलाम; बाईस अगस्त’ 2015

सैलाना बर्ड सेंक्चुरी के सब डिवीजनल अफसर श्री भगवती पवार मेरे पास बैठे थे। मैं उनसे खरमोर देखने के उपक्रम के लिये चर्चा कर रहा था। उज्जैन सम्भाग के चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट, श्री प्रवीण चन्द्र दुबे जी ने पवार जी को सहेज दिया था कि वे मेरी सहायता कर दें। और पवार जी अत्यंत सहायक थे प्रबन्ध करने में।

उछाल लेता खरमोर पक्षी।
उछाल लेता खरमोर पक्षी।

खरमोर एक प्रवासी पक्षी है। जुलाई से सितम्बर के बीच यह सैलाना के शिकारबाड़ी क्षेत्र में आता है। यह उत्तरोत्तर दुर्लभ होता जा रहा है। पिछले साल एक दर्जन के आस्पास ये पक्षी दिखे थे सैलाना में। इस साल चार-पांच दिखे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में 23 जुलाई को छपा था कि श्री भगवती पवार ने बताया – “कल चौकीदार के माध्यम से खबर मिली कि सवेरे दस बजे खरमोर दिखा। उसके बाद मैने भी जा कर खरमोर का जोड़ा देखा।”

मानसून का समय खरमोर के प्रजनन का समय है। मादा को आकर्षित करने और प्रभावित करने के लिये खरमोर मोर की तरह नृत्य नहीं करता; वह ऊंची ऊंची छलांग भरता है। करीब 6-8 फिट ऊंची छलांग। और दिन भर में 8-10 बार नहीं; लगभग 500-600 बार। उसका छलांग लगाना दर्शनीय है। यह देखने के लिये सैलानी और ऑर्निथोलॉजिस्ट आते हैं।

पवार जी ने बताया कि सवेरे 6-8 बजे के बीच वह दिखता है। दिन में घास और झाड़ियों के बीच छिपा रहता है। शाम चार बजे के बाद दिखता है। पर देखने का उचित समय सवेरे ही है।

यह तय हुआ कि हम सवेरे छ बजे निकल लेंगे सैलाना के लिये। साथ में भगवती पवार जी के एक सहायक हमारे साथ रहेंगे।

रतलाम; 23 अगस्त’2015

श्री मनोज गौड़। खरमोर दिखाने में सहायक बने वे।
श्री मनोज गौड़। खरमोर दिखाने में सहायक बने वे।

सवेरे छ बजे पवार जी के सहायक श्री मनोज गौड़ हमारे रेस्ट हाउस आ गये। पांच मिनट में हम लोग चल पड़े। सैलाना की सड़क बहुत अच्छी थी (मुझे लगभग 15-20 साल पहले का स्मरण है जब सड़क पर बड़े गड्ढे हुआ करते थे। पर तब माननीय दिग्विजय सिंह जी का मुख्यमंत्रित्व काल हुआ करता था, शायद)। हम जल्दी ही सेंक्चुरी में पंहुच गये। वहां कुछ वाहन पहले भी खड़े थे। लोग खरमोर देखने के उपक्रम में पहले से ही सन्नध थे।

श्री भीमा और अन्य सैलाना बर्ड सेंक्चुरी के कर्मी।
श्री भीमा और अन्य सैलाना बर्ड सेंक्चुरी के कर्मी।

हमें फॉरेस्ट गार्ड भीमा और उनके साथ अन्य चार-पांच कर्मियों ने बाइनाक्यूलर्स दिये देखने को। यह भी बताया कि ‘उस’ ओर जो झोंपड़िया सी दिख रही हैं, उसके पास है खरमोर। उसे पहचान कर स्थिति साधने में कुछ समय लगा। उसके बाद कई बार खरमोर को उछलते देखा। खरमोर बगुले से बड़े और मोर से छोटे आकार का पक्षी है। उसकी चाल में ग्रेस है और उसकी लगभग ऊर्ध्वाकार छलांग तो गजब ही है। ऐसा किसी अन्य पक्षी को करते नहीं देखा।


इस वीडियो में खरमोर नर पक्षी झाड़ियों में कहीं बैठी मादा को आकर्षित करने के लिये ऊंची-ऊंची छलांगें लगा रहा है।

खरमोर - The Lesser Florican का जॉन गोल्ड (1804-1881) का पब्लिक डोमेन में उपलब्ध एक चित्र।
खरमोर – The Lesser Florican का जॉन गोल्ड (1804-1881) का पब्लिक डोमेन में उपलब्ध एक चित्र।

यह बताया गया कि जो झोंपड़ियां हैं, उसमें लोग भोर से बैठे हैं खरमोर को नजदीक से देखने की साधना करते हुये। पक्षी अवलोकन एक कष्ट-साध्य कार्य है।

लगभग 30-40 मिनट वहां व्यतीत कर हम लोग वापस लौटने लगे। वापसी में एक वाहन के पास आदित्य और नियति मिले। खरमोर के प्रेमी हैं ये दोनो। अहमदाबाद के रहने वाले। इन्दौर में काम से आते हैं। वहां से रतलाम/सैलाना आना नहीं भूलते। खरमोर की सेंक्चुरी धार में भी है, पर यहां आते हैं वे “चूंकि यहां खरमोर बेहतर दिखता है”।

नियति और आदित्य।
नियति और आदित्य।

हम लोग तो शौकिया आये – प्रवीण चन्द्र दुबे जी से परिचय की मार्फत। पर आदित्य और नियति जैसे लोग तो वास्तव में उत्साही जीव हैं, जो बर्ड-वाचिंग की हॉबी को गम्भीरता से लेते हैं और उसके लिये समय, धन और श्रम खर्च करते हैं। … ईश्वर ऐसा जुनून हमें भी दें।

(इस पोस्ट के खरमोर के चित्र और वीडियो श्री भगवती पवार के सौजन्य से)

छलांग लेता खरमौर।
छलांग लेता खरमौर।