उज्जैन के रेलवे गुड्स यार्ड की यादें

उज्जैन गुड्स यार्ड, जिसे एन सी यार्ड कहा जाता था, ने मुझे रेलवे संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखाया। एन सी यार्ड का मतलब था Newly Constructed Yard. नया बना होगा, पर बहुत जल्दी रेलवे का फुटकर लदान का युग खत्म हो गया। … उज्जैन ही नहीं; पूरी रेलवे के यार्ड अपनी महत्ता खो बैठे।


सन 1985-86 का समय। रेलवे पच्चीस तीस प्रतिशत यातायात वैगन लोड में लदान करती थी और उसे पटरी पर पूरे रेक के रूप में चलाने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। गुड्स शण्टिंग यार्ड जिंदा थे। रेलवे की प्रोबेशनरी ट्रेनिंग में मैंने बहुत सा समय रेलवे गुड्स यार्डों की कार्यप्रणाली समझने में लगाया था। देश के पूर्वी भाग में अण्डाल, और धनबाद से जुडी रेल कोल लोडिंग साइडिंग्स, कोट्टवालसा – किरंदुल रेल खण्ड की यात्रा और बछेली यार्ड आदि अनुभव अभी भी दिमाग में हैं। उनका मस्तिष्क में दर्ज समय गड्डमड्ड हो सकता है। मेरे नोट्स जो काफी सालों तक मेरे सामान में रहे; तबादलों के दौरान कालांतर में कहीं इधर उधर हो गये हैं। अन्यथा बेहतर तरीके से उनके बारे में लिख सकता।

कोट्ट्वालसा – किरंदुल रेल लाइन, चित्र विकीपेडिया से

मेरा मूल रेलवे पश्चिम रेलवे है; अत: वहां कई यार्ड देखे और ट्रेनिंग में काफी घिसाई की। कोटा रेल मण्डल में ट्रेनिग करते हुये मैंने दिल्ली का तुगलकाबाद यार्ड चार-छ दिन घूम घूम कर देखा। मुझे अब भी याद है कि दिन भर ट्रेनिंग के बाद जब चीफ यार्ड मास्टर वेद प्रकाश जी (आशा है, उनका नाम ठीक से ले रहा हूं) यार्ड ऑफिस में एक कप चाय और एक बालूशाही के साथ आधे घण्टे अपने अनुभव सुनाते थे तो अपना रेलवे के साथ जुड़ाव मजबूत होते पाता था! मैंने उस मण्डल की ट्रेनिंग में आगरा ईस्ट बैंक, जमुना ब्रिज, ईदगाह, गंगापुर और सवाई माधोपुर यार्ड एक कोने से दूसरे कोने तक घूम घूम कर देखे और उनकी शंटिंग का अनुभव किया। शंटिंग इंजनों – स्टीम और छोटे डीजल शंटिंग इंजनों पर भी चढ़ा। शौकिया तौर पर बॉयलर में कोयला भी झोंका। कालांतर में जब मैं कोटा मण्डल का वरिष्ठ परिचालन प्रबंधक बना तो वह पुरानी ट्रेनिंग मेरे बहुत काम आयी।


Header Photo by Neelkamal Deka on Unsplash


पर मेरी पहली पोस्टिंग रतलाम मण्डल में सहायक परिचालन अधीक्षक के रूप में हुई थी। रहने को रतलाम स्टेशन पर एक पुराना सैलून मिला था। उसका फायदा यह था कि एक अटेण्डेण्ट मिल गया था जो (अपनी भयंकर दारू पीने की आदत के बावजूद) अच्छे से मेरे मन माफिक सादा भोजन बनाता था और जब तब तलब लगने पर चाय पिलाया करता था।

नौकरी ज्वाइन करने के बाद दूसरे या तीसरे दिन मुझे उज्जैन यार्ड जाने को कहा गया। 111 नम्बर सवारी गाड़ी में मेरा चार पहिये का सैलून लगा। जो चार पहिये और पुरानी तरह की स्प्रिंग के कारण बहुत हिलता था। उसमें यात्रा करना एक सजा की तरह होता था। रात की यात्रा में सैलून में हिलते डुलते मैं उज्जैन पंहुचा। नींद अच्छे से आयी नहीं थी।

नयी नौकरी में अपने आप को “प्रमाणित” करने का जोश इतना था कि मैं बहुत जल्दी ही गुड्स यार्ड में पंहुच गया। उज्जैन स्टेशन के पूर्वी किनारे पर बना वह यार्ड पच्चीस लाइनों का था, और वैगनों से भरा था। मुश्किल से दो चार रेल लाइनें खाली थीं। इंजन को एक ओर से दूसरी ओर ले जाने के लिये भी एक ही लाइन खाली थी!

यार्ड का मुख्य काम भोपाल की ओर से आने वाली तीस बॉक्स वैगन की कोयले की ट्रेनों को यार्ड में ले कर चालीस वैगनों की ट्रेन बना कर रवाना करना था। इसके अलावा दिन भर में पांच छ मिक्स्ड लोड (फुटकर लदान के वैगनों से बनी ट्रेनें) यार्ड में आते थे, जिनकी छ्न्टाई कर अलग अलग दिशाओं की ट्रेनें बनानी पड़ती थीं। मुझे जल्दी ही समझ आ गया कि अच्छे (और मेहनती) यार्ड मास्टर, मूवमेण्ट इंस्पेक्टर आदि की टीम के बावजूद यार्ड बहुत अच्छी तरह काम नहीं कर रहा था। शण्टिंग की अधिकता, वैगनों के कैरिज-वैगन परीक्षण में लगने वाला समय और उसमें वैगनों का ‘सिक’ किया जाना, अन्य विभागों से तालमेल और मण्डल के परिचालन की समस्याओं के प्रभाव यार्ड की वर्किंग पर थे। महीने में एक या दो बार ऐसा अवसर आता था कि यार्ड वैगनों-ट्रेनों से ‘पैक’ हो जाता था और उसकी सहायता के लिये माल गाड़ियां यार्ड में लेने की बजाय बाई-पास करनी होती थीं।

दो मूवमेण्ट इंस्पेक्टर/चीफ यार्ड मास्टर मुझे अब भी परिवार के अंग की तरह याद हैं। आर एस सोढ़ी सिक्ख थे और अय्यर दक्षिण भारतीय होने के बावजूद बहुत अच्छी हिंदी बोलते थे। इन दोनो से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। महीने में पांच छ दिन तो मैं वहां पंहुचा ही रहता था। मैं अपने को यार्ड का अंग सा मानने लगा था।

यार्ड में बहुत समय व्यतीत करने के कारण मैं उज्जैन यार्ड का ‘एक्सपर्ट’ जैसा हो गया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि ई. श्रीधरन (कोंकण और मैट्रो रेलवे ख्याति वाले) बतौर पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक उज्जैन यार्ड आये थे और यार्ड ऑफिस की दीवार पर बहुत ऊंचे टंगे यार्ड डायग्राम के आधार पर यार्ड कार्यप्रणाली समझाने के लिये मैंने एक लम्बी लकड़ी हाथ में प्वाइण्टर की तरह ली थी। श्रीधरन बहुत बारीकी से किसी भी विषय को समझा करते थे। उस प्वाइण्टर से यार्ड की पच्चीस लाइनों को अपने कद (पांच फुट साढ़े तीन इंच) और डायग्राम की ऊंचाई के कारण मैं अलग अलग चिन्हित नहीं कर पा रहा था। लिहाजा मैंने बिना झिझक जूते उतारे और यार्ड ऑफिस की टेबल पर खड़े हो कर दस पंद्रह मिनट का प्रेजेण्टेशन यार्ड वर्किंग के बारे में महाप्रबंधक महोदय को दिया। नौजवान था मैं। जोश था और महाप्रबंधक जैसे शीर्षस्थ अधिकारी का भय नहीं था मुझमें। अन्यथा, कोई भी अन्य अधिकारी इस तरह की “भदेस” प्रेजेंटेशन तकनीक की कल्पना नहीं कर सकता था। 🙂

पर श्रीधरन जी ने मेरी प्रशंसा की और बाद में मण्डल रेल प्रबंधक महोदय ने भी कहा – जीडी, बहुत बढ़िया किया तुमने!

उज्जैन गुड्स यार्ड, जिसे एन सी यार्ड कहा जाता था, ने मुझे रेलवे संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखाया। एन सी यार्ड का मतलब था Newly Constructed Yard. नया बना होगा।

पर बहुत जल्दी रेलवे का फुटकर लदान का युग खत्म हो गया। कोयला लदान के वैगन भी बेहतर बनने लगे। ट्रेनें तीस बॉक्स वैगनों की बजाय पहले चालीस और फिर 56-58 बॉक्स-एन वैगनों की होने लगीं, जिनकी यार्ड में ले कर चालीस या पैंतालीस डिब्बों की ट्रेन बनाने की आवश्यकता ही नहीं रही। और उज्जैन यार्ड अप्रासंगिक हो गया। उज्जैन ही नहीं; पूरी रेलवे के यार्ड अपनी महत्ता खो बैठे। सबसे दयनीय दशा तो मुगल सराय यार्ड की सुनने में आती थी जो एक तरफ बना और दूसरी तरफ बनते ही अप्रासंगिक होने लगा था!

मेरे रतलाम मण्डल में जाने के बाद एक दशक भर लगा यह परिवर्तन होने में।

अनेकानेक यादें जुड़ी हैं उज्जैन गुड्स यार्ड और रतलाम-उज्जैन की लगभग नियमित यात्राओं की। और वे सब एक ब्लॉग पोस्ट में समेटी नहीं जा सकतीं।

(उस जमाने में डिजिटल कैमरा नहीं था। मेरे पास चित्र नहीं हैं। जो चित्र पोस्ट पर लगे हैं वे इधर उधर से प्रतीकात्मक रूप से लगाये गये हैं।)


सवेरे तीन बजे उठ जाना

मैंने रेल जीवन या रेल यात्राओं के बारे में बहुत नहीं लिखा। पर वह बहुत शानदार और लम्बा युग था। जब मैंने अपने जूते उतारे तो यह सोचा कि यादों में नहीं जियूंगा। आगे की उड़ान भरूंगा गांव के परिदृष्य में। पर अब, आज सवेरे इकतीस दिसम्बर के दिन लगता है कि फ्लैश-बैक में भी कभी कभी झांक लेना चाहिये।


सवेरे तीन बजे; कुछ उससे पहले ही नींद खुल गयी। शायद शरीर को श्रम नहीं करना पड़ रहा, तो नींद ठीक से नहीं आती। शायद उम्र का भी असर है। उम्र बढ़ने के साथ साथ नींद कम होती जाती है और जब तब बिन बुलाये झपकी आती रहती है। यह खराब है। और इसका उपाय यही है कि साइकिल और चलाई जाये – आखिर वही एक व्यायाम है मेरे पास।

Gyan Dutt Pandey, Gyandutt Pandey,
अ‍ॅंधेरे बेड रूम से टटोल कर ब्लू टूथ वाला हेडफोन कानों पर लगा कर मोबाइल में अमेजन ऑडीबल का एक एपीसोड सेट करता हूं।

पास सो रही पत्नीजी की नींद को बिना खलल डाले मैं अपना शौच कर लेता हूं। बिजली आ रही है, तो बिजली की केतली में पानी गर्म कर एक थर्मस चाय – बिना दूध वाली, चाय की ग्रीन पत्ती के साथ – बना कर बैठ जाता हूं घर के दालान नुमा ड्राइंग रूम में। किण्डल पर कोई पुस्तक पढ़ने का प्रयास करता हूं। फिर लगता है कि एक्सरसाइजर पर व्यायाम ही कर लिया जाये। वह साइकिल चलाने जैसा है। टाइमर भी है जिससे पता रहे कि कितने मिनट पैर चलाये। बताने को तो वह कैलोरी जैसी चीज भी बताता है – पर उसपर बहुत यकीन नहीं होता। मुझे लगता है कि वह टाइम बताने के अलावा बाकी झूठ बोलता (दिखाता) है।

My Indian Odyssey Podcast

एक्सरसाइजर के लिये इंतजाम करता हूं। अंधेरे बेड रूम से टटोल कर ब्लू टूथ वाला हेडफोन कानों पर लगा कर मोबाइल में अमेजन ऑडीबल का एक एपीसोड सेट करता हूं। यह विंसेण्ट इब्राहिम की माई इण्डियन ओडिसी में आगरा से दार्जिलिंग यात्रा का पॉडकास्ट है।

उस पॉडकास्ट में ट्रेन की आवाजें, सेकेण्ड एसी डिब्बे की खटर पटर, इब्राहिम की स्वप्निल आवाज में यात्रा विवरण और यात्रा के दौरान चाय वाले, साथ यात्रा कर रहे यात्रियों से बातचीत, रात बीतने के बाद सवेरे नाश्ता सर्व किया जाना और न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पर उतरना – यह सब मुझे अपने अतीत में ले जाता है। अंधेरे बेड रूम से टटोल कर ब्लू टूथ वाला हेडफोन कानों पर लगा कर मोबाइल में अमेजन ऑडीबल का एक एपीसोड सेट करता हूं। कभी कभी पास के गार्ड साहब के डिब्बे में जा कर गार्ड बतियाना हुआ करता था। मैं अपने जूनियर स्केल से विभागाध्यक्ष बनने तक के अपने पीयून लोगों की याद करता हूं। और साथ में यात्रा करने वाले अपने इंस्पेक्टर लोगों की भी। कभी कभी मुझे लगता था – और ऐसा बहुधा होता था – कि वे इंस्पेक्टर अगर सिविल सर्विसेज पास कर रेल में लगे होते तो मुझसे बेहतर अधिकारी होते। वे अधिकतर बहुत होशियार, ईमानदार, और कर्मठ हुआ करते थे। अधिकतर वे मेरे मन को जान जाया करते थे और मेरे स्वाद, रुचियों और खब्तीपन से परफेक्ट तालमेल बनाये हुये होते थे। वे चपरासी और वे इंस्पेक्टर मेरे सुहृद मित्र होते थे। बहुत से तो परिवार के सदस्य की तरह, या परिवार का सदस्य ही थे। उनका जितना तालमेल मुझसे हुआ करता था, उससे ज्यादा मेरी पत्नीजी के साथ होता था।

उस पॉडकास्ट में ट्रेन की आवाजें, सेकेण्ड एसी डिब्बे की खटर पटर, इब्राहिम की स्वप्निल आवाज में यात्रा विवरण और यात्रा के दौरान चाय वाले, साथ यात्रा कर रहे यात्रियों से बातचीत, रात बीतने के बाद सवेरे नाश्ता सर्व किया जाना और न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पर उतरना – यह सब मुझे अपने अतीत में ले जाता है।

Vincent Ebrahim
विंसेण्ट इब्राहिम

मैं व्यायाम खत्म कर विंसेण्ट इब्राहिम के बारे में मोबाइल पर खंगालता हूं। यह दक्षिण अफ्रीका का कोई अभिनेता है। चेहरे से भारतीय लगता है। उसके दादा यहां सत्रह साल भारत में रहे। मुहम्मद कासिम। दादा जहां जहां रहे वहां वहां की यात्रा कर दादा की जिंदगी से परिचय पाने का प्रयास कर रहा है वह। और उस प्रक्रिया में क्या शानदार पॉड्कास्ट बनाये हैं विंसेण्ट इब्राहिम ने। उस पॉडकास्ट की बदौलत मैं अपने रेल अतीत में हो आया। अन्यथा, सामान्यत: मैं रेल छोड़ने के बाद साइकिल ले कर गांवदेहात की ही सोचता-जीता रहा हूं।

मैंने रेल जीवन या रेल यात्राओं के बारे में बहुत नहीं लिखा। पर वह बहुत शानदार और लम्बा युग था। जब मैंने अपने जूते उतारे तो यह सोचा कि यादों में नहीं जियूंगा। आगे की उड़ान भरूंगा गांव के परिदृष्य में। पर अब, आज सवेरे इकतीस दिसम्बर के दिन लगता है कि फ्लैश-बैक में भी कभी कभी झांक लेना चाहिये।

इब्राहिम का पॉडकास्ट खतम कर मैं अपने लैपटॉप पर यह लिखने बैठ गया हूं। अब जब खत्म कर रहा हूं यह लेखन तो सवेरे पौने छ बजे का अलार्म बज रहा है। मेरे सामान्यत: उठने का समय हो गया है। पर उठने के समय पर आज बहुत कुछ कर चुका हूं। नये साल के लिये कुछ सोचने की भूमिका होगी यह! 🙂


जैसा मैंने कहा, मैंने बहुत नहीं लिखा है अपनी रेल यात्राओं के बारे में। पर यात्रा पर एक छोटी पोस्ट है – सोनतलाई। शायद आपको रुचिकर लगे।


राजकुमार साहनी की नाव #गांवकाचिठ्ठा #गांवकेचरित्र

राजकुमार की उम्र तैतीस साल की है। देखने में वे उससे भी कम उम्र के लगते हैं। उनका कहना है कि अपने शरीर की सुनते हैं। किसी दिन खूब मेहनत करने का मन होता है तो करते हैं। किसी दिन आराम करने का मन हुआ तो वह कर लेते हैं।


मैं सीताराम से मिलने गया था। पंद्रह मिनट पहले घर से निकला। भोर में पौने पांच बजे। अंधेरा छंटा भी न था, जब घर से साइकिल ले कर चला। द्वारिकापुर गंगा घाट पर पंहुचा, तब भी सूर्योदय का समय नहीं हुआ था। सीताराम नाव पर नहीं थे। निवृत्त होने गये थे शायद। उनके जोड़ीदार चंद्रमोहन मिले। पास की नाव पर एक नौजवान दोहर ओढ़ कर लेटा था।

राजकुमार साहनी।

सीताराम आये तो मैंने ब्लॉग पर अपनी पोस्ट दिखाई।

उससे उनको स्पष्ट हुआ कि उनके बारे में जानकारी लेने का ध्येय उनपर लेख लिखना है। मेरे बहुत से पात्रों को अपने बारे में लिखा पढ़ने का शौक नहीं होता, पर अपने बारे में ब्लॉग पर लिखा देख कर और उसमें अपने चित्र देख कर उनकी प्रसन्नता देखते ही बनती है। सीताराम इस दूसरी प्रकार के जीव निकले। तब तक बगल की नाव में लेटा नौजवान पास आ गया था। उसे मेरे मोबाइल में लिखा लेखन रोचक लगा। पहले सामने खड़े हो और फिर अपनी नाव के कोने पर बैठ कर उसने अपने बारे में बहुत कुछ बताया।

Continue reading “राजकुमार साहनी की नाव #गांवकाचिठ्ठा #गांवकेचरित्र”

यात्रायें, यादें और कोविड19 – रीता पाण्डेय

भरतपुर में मालगाड़ी को सिगनल मिल गया था। वह हिलने लगी तब स्टेशन मास्टर साहब दौडते हुये आये और अपने घर से बनी चाय और पेपर कप हमें थमा दिये। हिलते ब्रेकवान में खड़े खड़े हमने गार्ड साहब से शेयर करते चाय पी। … मेरे और मेरे बच्चों के लिये यह यादगार अनुभव था।


रीता पाण्डेय लिखती चली जा रही हैं। लिखने बैठती हैं तो मालुम नहीं होता कि किस विषय पर लिखेंगी। अनेक विषय कुलबुलाते हैं। शायद कागज कलम उठाने तक तय नहीं होता और कुछ मिनट व्यतीत होने पर ही लिखने की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है।

मेरे विचार से जो लिखा जाता है, उसकी एक दो बार एडिटिंग होनी चाहिये। हल्की फुल्की, वाक्य विन्यास और हिज्जों की एडिटिंग तो मैं कर दे रहा हूं, पर विचारों के प्रवाह में जो तरलता या गड्डमड्ड होना है, उसे जस का तस रख रहा हूं।

आखिर, ब्लॉग है ही खुरदरा लेखन। बहुत तराशने पर उसका मूल तत्व (प्रकार, या सौंदर्य) समाप्त होने का खतरा होता है।

आप रीता पाण्डेय का लिखा पढ़ें –


स्कूल में निबंध लिखने को कहा जाता था। गाय पर, त्यौहार पर या फिर यादगार यात्रा पर। यूं तो मैंने अपने जीवन में बहुत यात्रायें की हैं पर कुछ यात्रायें यादगार हैं।

उस समय बच्चे छोटे थे। दिल्ली में अपने भाई के घर छुट्टियां बिता कर रतलाम (जहां मेरे पति रेल सेवा में पदस्थ थे) आ रही थी बच्चों के साथ। ट्रेन सफर के पहले भाई ने कुछ पूरी-सब्जी साथ में दी थी। मन में था कि शाम तक रतलाम पंहुच जायेंगे। इस लिये ज्यादा भोजन रखने के लिये मैंए बहुत आनाकानी की। यह सोचा कि लंच केटरिंग से कोटा में मिल ही जायेगा। पर ट्रेन लेट होती गयी और होती गयी। रास्ते में कुछ नहीं मिला। कोटा पंहुचते पंहुचते शाम के सात बज गये। और वहां दूध, चाय और कुछ नाश्ता मिलने पर बड़ी राहत मिली।

एक बार दीपावली के अवसर पर हमें रतलाम से अपने पैतृक घर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) जाना था। रेलवे में छुट्टी मिलना अंत समय तक निश्चित नहीं होता। एन मौके पर छुट्टी मिली और हम ताबड़तोड़ किसी खटारा रेलगाड़ी से रवाना हुये। ट्रेन को भरतपुर में छोड़ कर किसी अन्य ट्रेन से दिल्ली पंहुचना था। वहां से प्रयागराज एक्सप्रेस से इलाहाबाद। खटारा गाड़ी लेट होती गयी। भरतपुर में उतर कर लगा कि दिल्ली समय से पंहुच ही नहीं सकते।

ऐसे में ट्रेन कण्ट्रोलर ने जुगाड़ बिठाया। एक मालगाड़ी के ब्रेकवान में हमको बिठा कर मथुरा भेजने का इंतजाम किया। … भरतपुर में मालगाड़ी को सिगनल मिल गया था। वह हिलने लगी तब स्टेशन मास्टर साहब दौडते हुये आये और अपने घर से बनी चाय और पेपर कप हमें थमा दिये। हिलते ब्रेकवान में खड़े खड़े हमने गार्ड साहब से शेयर करते चाय पी। मेरे पति के पास तो इस तरह ब्रेकवान में चलने के बहुत अनुभव होंगे, पर मेरे और मेरे बच्चों के लिये यह यादगार अनुभव था। हम गार्ड साहब के डिब्बे की रेलिंग पकड़ कर पीछे जाती पटरी को ध्यान से देख रहे थे। ऐसा दृष्य पहले नहीं देखा था।

मथुरा में एक रोड वैहीकल का इंतजाम कर दिया था ट्रेन कण्ट्रोल ने। सो मथुरा से दिल्ली तक की यात्रा सड़क मार्ग से पूरी की। रेल सेवा के अमले का इंतजाम न होता तो हम किसी भी प्रकार नई दिल्ली पंहुच कर प्रयागराज एक्सप्रेस नहीं पकड़ सकते थे।

बहुत सी यादें रेल की पटरी के इर्द-गिर्द हैं।

रेलसेवा की बदौलत एक और यात्रा, जो वैसे न हो पाती, सम्भव हो सकी। रतलाम में दोपहर खबर मिली कि मेरी माताजी (सास) पीजीआई, लखनऊ में अकस्मात भर्ती की गयी हैं। उनके पैर में रक्त जम गया था और अगर ठीक नहीं हो पाया तो पैर की सर्जरी तक की सम्भावना थी। ट्रेन कण्ट्रोल ने आननफानन में यात्रा का इंतजाम किया। रतलाम से उज्जैन एक खटारा मेटाडोर वैन में यात्रा कर हम उज्जैन पंहुचे। वहां से मालवा एक्सप्रेस में आरक्षण करा दिया था मण्डल के नियंत्रण कक्ष ने, और उस ट्रेन से हमें आगरा पंहुचना था। आगरा सेण्ट्रल स्टेशन से लखनऊ किसी अन्य ट्रेन में यात्रा का इंतजाम किया गया।

उज्जैन पंहुचने में देर हुई। शायद बारिश के कारण या खटारा वाहन के कारण। लगा कि मालवा एक्सप्रेस मिस हो जायेगी। स्टेशन पर पंहुचे तो स्टेशन मास्टर साहब स्टेशन के बाहर इंतजार करते मिले। मालवा एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी थी। तेज चाल से चलते जब मालवा एक्सप्रेस में बैठे तो स्टेशन मास्टर साहब ने हल्के से बताया कि वह ट्रेन करीब आधा घण्टा हमारे लिये रोक रखी थी ट्रेन कण्ट्रोल ने। मास्टर साहब ने कहा कि आप फिक्र न करें – रतलाम मण्डल की सीमा के अंदर ही ट्रेन रनिंग पर ध्यान दे कर उसे भोपाल सही समय पर पंहुचा दिया जायेगा। वैसा ही हुआ। पर जब तक हम भोपाल नहीं पंहुचे, तब तक हमारे लिये मालवा एक्सप्रेस जैसी महत्वपूर्ण ट्रेन को आधा घण्टा रोकने का अपराध बोध होता रहा…

अभी तेरह मार्च को मेरी बेटी अपने पुत्र के साथ बोकारो से वाराणसी आयी थी। मैं भी उसके साथ एक सप्ताह वाराणसी में रही। उस दौरान कोरोनावायरस का हल्ला गम्भीर से गम्भीरतर होता गया। मेरे दामाद ने अपना वाहन भेज दिया था मेरी बेटी को वापस बोकारो ले जाने के लिये। पर जाना एक दो दिन यहां लोगों की मनुहार पर टला। इस बीच बाईस मार्च को मोदी जी द्वारा जनता कर्फ्यू की घोषणा हुई। अफरातफरी मच गयी। बिहार सरकार अपनी सीमायें सील करने का निर्णय कर चुकी थी।

रीता पाण्डेय और गंगा किनारे का सूर्योदय

बिटिया अपने वाहन में बैठ कर चलने ही वाली थी कि टेलीवीजन की खबरों से पता चला रास्ता बंद कर दिया गया है। वह वापस वाराणसी में अपने मामा के घर लौटी। … पर भला हो मेरे दामाद का। उन्होने पता किया कि बिहार सरकार ने अभी-अभी तो निर्णय ही लिया है। उसके कार्यान्वयन में इतनी तत्परता बिहार प्रशासन-पुलीस नहीं दिखा सकते। विवेक (दामाद) ने विवेक से काम लिया और वाणी-विवस्वान (बेटी-नाती) को तुरंत निकल चलने के लिये कहा। वाणी फिर यात्रा पर रवाना हुई और वास्तव में रास्ते में किसी ने कुछ नहीं पूंछा। सड़के वीरान थीं। जिस यात्रा में वाराणसी से बोकारो तक नौ-दस घण्टे लगते, वह उन्होने छ घण्टे में ही सम्पन्न कर ली। … पर जब तक रात दो बजे तक वह बोकारो पंहुच नहीं गयी, हमारी जान अटकी रही।

उसके और मेरे लिये यह यात्रा भय देने वाली और रोमांचक थी। कोविड19 के कालखण्ड का यह रोमांचक अनुभव था।


यात्रा – ये साधू थे जो मुझे बह्मावर्त (बिठूर) में गंगा किनारे मिले थे। यात्राओं की खुदरा यादें बहुत हैं। मेरे पास भी और रीता पाण्डेय के पास भी।

रीता पाण्डेय ने तो ऊपर कुछ यात्राओं के बारे में लिखा है। मुझे लगता है कि गरीब लोगों का कोरोनावायरस लॉकडाउन संदर्भ में जो पलायन हुआ है; जिस प्रकार पैदल, कण्टेनर में ठुंस कर या अन्य प्रकार से लोगों ने अकेले या सपरिवार यात्रायें की हैं; जिस प्रकार प्रशासन-पुलीस की क्षमता/अक्षमता देखी है; उसका विवरण अभूतपूर्व होगा। उस महापलायन पर अगर कोई मेमॉयर लिखे और पब्लिश हो तो चाहे जितनी कीमत हो, मैं खरीदूं और पढूंगा जरूर।


नेफ्रॉलॉजिस्ट डा. अशोक कुमार बैद्य और जीवन की लॉन्गेविटी के प्रश्न

यह ब्लॉग पोस्ट बढ़ती उम्र, अस्वस्थता, उससे उत्पन्न व्यग्रता और जीवन की सार्थकता संबंधी व्यथा पर है। व्यक्तिगत अनुभव।



उम्र बढ़ रही है और लगता है कि अस्पताल के चक्कर लगने की संभावनायें भी बढ़ जाएंगी। 😕

अपने जीवन की दूसरी पारी में, गांव में रहने का निर्णय लेने में यह द्वन्द्व था कि गांव में मैडीकल सुविधायें नहीं मिलेंगी। पर यह भी लग रहा था कि वहां अगर नैसर्गिक जीवन जिया गया, और तनाव कम रहा तो मैडीकल सुविधाओं की जरूरत भी कम रहेगी।

और, पहले चार साल बढ़िया कटे। शायद ही किसी दिन बीमार रहा। पर चार साल बीतते बीतते सारी अस्वस्थता की कसर पूरी हो गयी। मेरे पिताजी अस्पताल में भर्ती हुये और चल बसे। मेरी आशावादी सोच थी कि वे नब्बे की उम्र पायेंगे, पर वे पच्चासी ही पार कर पाये। उसके बाद उनके न रहने के अवसाद और कर्मकाण्डों के तनाव का परिणाम यह हुआ कि तीन सप्ताह के अंतराल में दो बार मुझे UTI – urinary tract infection की अधिकता के कारण अस्पताल मेँ भर्ती होना पड़ा।

Continue reading “नेफ्रॉलॉजिस्ट डा. अशोक कुमार बैद्य और जीवन की लॉन्गेविटी के प्रश्न”