कल हमारे प्रेमसागर जी रतलाम में थे। स्टेशन के सामने का एक दृश्य भेजा। वहां पर लगभग दो दशक गुजारे हैं मैंने। वह चित्र देख कर अतीत का बहुत कुछ सामने आ गया। जवानी और जवानी से प्रौढ़ होने की ओर जाता ज्ञानदत्त पाण्डेय वहीं का है।
स्टेशन याद आया और स्टेशन रोड भी। कई दुकानें थी वहां रतलामी सेव बनाने वालों की। रेलवे स्टेशन पर स्टॉलों में नमकीन बेचने वालों का टेण्डर निकला करता था जिसे साल दर साल लोकल माफिया – उजाला ग्रुप – हथियाता था। वहां से गुजरते हुये; और मैं बहुधा पैदल ही गुजरता था; छनती रतलामी सेव की गंध अभी भी यादों में है। उनकी भट्टियां, बनियान पहने एक हांथ से झारा साधे और दूसरे से बेसन की लोई दबा कर नमकीन झारते लोगों की छवियां मन में बनी हुई हैं। तब डिजिटल कैमरे या मोबाइल का युग नहीं था। मैं हिंदी में लिखता भी नहीं था। ब्लॉग जैसी चीज तो थी नहीं। अन्यथा उस समय पर बहुत कुछ लिखा जाता।

रतलामी सेव से याद आया कि उसका ब्लॉगिंग शुरू करने की दुर्घटना (?) में बड़ा हाथ है। सन 2007 के शुरू में मैं नेट पर Ratlami Sev सर्च कर रहा था और रवि रतलामी का नाम और कुछ पेज सामने आ गये। तब यह पता चला कि हिंदी में भी नेट पर लिखा जा सकता है और ब्लॉग नाम की चीज बनाई जा सकती है। रवि श्रीवास्तव जी ने अपना तखल्लुस रतलामी न रखा होता तो नेट पर हिंदी के दर्शन न होते और शायद मेरी ब्लॉगिंग इस रूप में न होती जो आज है।
रतलाम और रतलामी सेव का मेरे द्वारा ब्लॉग पर पांच दस हजार पेजों को लिखे जाने में बड़ा योगदान है।
यहां पूर्वांचल में रतलामी सेव नहीं मिलती। यूं कहा जाये तो इस अंचल में नमकीन बनाने की तमीज ही नहीं है। रतलामी सेव ही नहीं किसी भी तरह का नमकीन बनाने की तमीज। ज्यादा अच्छा बनाने के चक्कर में “देसी घी की नमकीन” जैसी कोई चीज बना देते हैं जो घियाहिन-घियाहिन महकती है। जो नमकीन इंदौर रतलाम में मिली, उसका पासंग नहीं कहीं भी। मेरे साले साहब की एक बस इंदौर तक चलती थी। वे जब मुझपर प्रसन्न होते थे तो एक दो किलो रतलामी सेव मंगवा कर मुझे दिया करते थे। अब शायद उनकी बसों का रूट बदल गया है। … कोई वहां का मित्र नहीं है जो हर महीने दो किलो रतलामी सेव भेजने का ठेका ले ले।

आज अचानक कस्बे के बाजार से गुजरते हुये एक पाउच पर नजर पड़ी – रतलामी सेव के पांच रुपये के पाउच की लड़ी। मैंने वाहन रुकवा कर दुकान में जितने भी पाउच थे, खरीद लिये। दुकानदार ने बताया कि रतलामी सेव यहां कोई खाता नहीं तो सप्लाई भी नहीं होती। अब मेरी जरूरत देख कर वे मंगवाने की कोशिश करेंगे। यह पाउच तो कोई देवार्पण ब्राण्ड का था। उत्तराखण्ड में बना हुआ। स्वाद बाकायदा रतलामी था। थोड़ा तीखा था – लौंग ज्यादा थी। पर पोहा उसको मिला कर खाने में रतलाम-मालवा की फीलिंग आ गयी।
रतलामी सेव के कई लोकल ब्राण्ड याद हो आये। जलाराम की नमकीन तो हम बहुधा लिया करते थे। मेरे ऑफिस के पास दो-बत्ती चौराहे पर ही दुकान थी। गेलड़ा की नमकीन भी प्रसिद्ध थी। मेरी बिटिया की कक्षा में गेलड़ा परिवार का अंकित गेलड़ा पढ़ता था। उसके टिफन में अखबार के टुकड़े में लिपटा रतलामी सेव अक्सर हुआ करता था। मेरी बिटिया बताती है कि अंकित गेलड़ा से रतलामी सेव की गंध आया करती थी। कई दुकान वाले तो सस्ता बनाने के चक्कर में कपास्या (कपास का तेल) से नमकीन छानते थे, पर जलाराम और गेलड़ा की नमकीन तो मूंगफली के तेल से बनती थी। तब मूंगफली – सींगदाना – पंद्रह रुपये किलो था। अब तो उससे दस गुना दाम बढ़ गये हैं। अब तो शायद सारी नमकीन इंदोनेशिया के पॉम-ऑयल में बनती है।
भला हो प्रेमसागार जी का जो वे रतलाम से गुजरे। उनके चित्र से रतलाम की याद आयी और रतलाम के माध्यम से रतलामी सेव की।
इस बीच प्रेमसागर चित्रकूट, शहडोल, उज्जैन हो लिये हैं। उज्जैन में उन्होने दो शक्तिपीठों के दर्शन कर लिये हैं। अब वे जूनागढ़ के रास्ते में हैं। उनके पास पैसे नहीं हैं। महादेव बड़े लस्टम-पस्टम तरीके से कभी हैरान करते हुये और कभी ठीकठाक इंतजाम करते हुये उन्हें लिये जा रहे हैं। इस बीच अपनी अस्वस्थता के कारण मैं उनका डियाक (डिजिटल यात्रा कथा) लेखन नहीं कर पाया। अब बीच का इतना बैकलॉग हो गया है कि लिखना तीन-चार दिन की बैठकी मांगता है। पता नहीं वह कैसे होगा?!
रतलामी सेव का इतिहास क्या है? मैंने गूगल बार्ड से पूछा तो रोचक बात पता चली। कथा है कि उन्नीसवीं सदी में कोई मुगल जागीरदार रतलाम के पास से गुजर रहा था। मुगलई खाने में सेंवई की जरूरत पड़ी। स्थानीय भील लोगों के पास गेंहूं और उसका आटा था ही नहीं। उन्होने बताया कि सेंवई नहीं बन पायेगी। उनके पास तो मक्का और चना ही है। जागीरदार तुनुक मिजाज रहा होगा। उसके जोर देने पर चने की सेंवई बनाई गयी और उसे छानने पर लाजवाब चीज जो बनी, उसका नाम जगह के नाम पर रतलामी सेव रखा गया।
गूगल बार्ड का उत्तर –
रतलामी सेव का इतिहास 19वीं शताब्दी के अंत में शुरू होता है। कहा जाता है कि मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र की यात्रा पर एक मुगल शासक जब रतलाम शहर में आए, तो वे सेवई (गेहूं की सेंवई) की लालसा कर रहे थे, लेकिन उस समय रतलाम में गेहूं उपलब्ध नहीं था। अपनी लालसा को शांत करने के लिए, मुगलों ने स्थानीय आदिवासी समुदाय (भील) से स्थानीय रूप से उपलब्ध चना के आटे से सेवई बनाने का अनुरोध किया। और वाह! यही पहली रतलामी सेव की रेसिपी थी।
भील जनजाति शुरू में चना के आटे से सेवई बनाने से हिचकिचा रही थी, क्योंकि वे मानते थे कि यह गेहूं के संस्करण की तरह स्वादिष्ट नहीं होगी। हालांकि, मुगलों ने जोर दिया, और भील जनजाति ने अंततः इसे आजमाने के लिए सहमति व्यक्त की। आश्चर्य हुआ। चना के आटे से बनी सेव वास्तव में काफी स्वादिष्ट थी। मुगल इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे उस शहर के नाम पर “रतलामी सेव” का नाम दिया जहां इसका आविष्कार किया गया था।

kya hua sir aapko..jaldi se swasth hon…
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