बनियान में छेद

पिछले दो साल से देख रहा हूं कि मेरी बनियानों में छेद हो जाते हैं। सभी ब्राण्ड वाली होती हैं पर ज्यादा नहीं चलतीं। तेजी से बढ़ते हैं छेद। जल्दी ही उनमें से गरीबी बाहर झांकने लगती है। मैं होजियरी वाले अण्डरवियर नहीं पहनता इसलिये कह नहीं सकता कि उस तरह के बुनावट वाले कपड़ों के अधोवस्त्रों में भी छेद बनते हैं या नहीं, पर बनियान में तो छेद पक्के तौर पर हो रहे हैं। शायद वे जान गये हैं कि रिटायरमेण्ट की विपन्नता वाली सोच को इस भौतिक छेदशास्त्र से कुरेद कर गहरा किया जा सकता है।

पर बनियान जैसी साधारण वस्तु को मेरी सम्पन्नता-विपन्नता से क्या लेना देना? क्या मेरे घर में कुछ बेक्टीरिया हैं जो होजियरी टाइप कपड़ों पर हमला करते हैं? क्या प्रकृति कहना चाहती है कि मैं बनियान की बजाय दर्जी से बनवाई हेण्डलूम की बण्डी पहना करूं, जिसके कार्बन फुटप्रिण्ट बुनाई वाली बनियान से कम होंगे और स्थानीय दर्जी को भी रोजगार मिलेगा?

बनियान में छेद

मर्यादी वस्त्रालय वाले विवेक कुमार चौबे जी को मैने अपनी समस्या बताई। उन्होने पूछा – बनियान आप धोते कैसे हैं? मैने उत्तर दिया – मैं तो धोता नहीं। वाशिंग मशीन में धुलती है। पत्नीजी वाशिंग मशीन चलाती हैं या फिर घर में उनकी सहायिका अरुणा। मशीन में जो कपड़े धोने का पाउडर इस्तेमाल होता है उसी से बनियान भी धुलती है।

विवेक कुमार चौबे जी ने सलाह दी – आप वैसे मत धुलवाया करें। बनियान धोने के लिये साबुन की बट्टी का प्रयोग किया करें। होजियरी वाले कपड़े वाशिंग मशीन के साबुन से कटते हैं। उसकी बजाय साबुन की बट्टी से कचार कर धोने से ज्यादा चलेंगे।

विवेक चौबे मुझे स्वावलम्बन की सीख दे रहे थे। जब मैं विद्यार्थी था और अत्यल्प बजट पर हॉस्टल की जिंदगी गुजारनी होती थी तो अपने सम्पन्न सहपाठियों की तरह धोबी से कपड़े नहीं धुलाया करता था। खुद धोता था। चौबे जी का कहना था उसी युग में मैं वापस लौटूं।

घर पर मर्यादी वाले चौबे जी की सीख के बारे में पत्नीजी से चर्चा की। उनका कहना था – “खुद क्यों नहीं धो सकते। तुम्हारा दामाद तो अपने इस तरह के कपड़े खुद धोता है। उसी से सीख ले सकते हो।” मेरी बिटिया ने भी बताया कि विवेक (मेरे दामाद विवेक पाण्डेय) में यह क्वालिटी तो है। अपने अण्डर गारमेण्ट, रुमाल, डस्टर आदि वह खुद धोते हैं। नहाते समय इन्हें धोना उनकी आदत में है। इसके अलावा स्वावलम्बन की और भी कुछ आदतें हैं। मसलन घर की सब्जी वे खुद खरीदते हैं। सब्जी और फल वालों से इतना हेलमेल है कि उस इलाके से कॉर्पोरेटर का चुनाव लड़ सकते हैं। अपनी साइकिल, अपने काम करने का घर और ऑफिस का फर्नीचर विवेक पाण्डे खुद झाड़ते हैं।

सो ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा स्वावलम्बन की सीख का प्रमाण तलाशने के लिये।

अपने छोटे कपड़े खुद धोना शुरू किया है

और मैने अपने छोटे कपड़े खुद धोना प्रारम्भ कर दिये। तीन चार उस तरह के कपड़े नहाते समय धोने होते हैं। मैने उनके लिये वाशिंग मैनुअल भी कोडीफाई कर लिया है। पानी से भिगोने के बाद साबुन की बट्टी प्रत्येक कपड़े पर घिसता हूं और फिर सभी कपड़े एक साथ मन में अठारह बार “हरे राम हरे राम” वाले मंत्र का पाठ करते हुये हाथ से उठाकर बाथरूम के फर्श पर पटकता हूं। उसके बाद पानी से निथार कर हाथ से ही मरोड़ कर उनका पानी निकालता हूं। नहाने के बाद बगीचे में रस्सी पर सुखाने भी जाता हूं।

बारिश अभी खत्म नहीं हुई। वातावरण में नमी बहुत है। साबुन की बट्टी गीली होने से चिपिर चिपिर हो जाती है और ज्यादा घिसती है। उसके लिये कपड़े की साबुनदानी या तो बाहर धूप में सुखाने रख देता हूं या वातानुकूलित कमरे में रख देता हूं।

साबुन की बट्टी के ऑप्टिमल खर्च पर भी एक शोध करना है। अभी तीन बनियान नई खरीदी हैं जिनका प्रयोग पोस्ट स्वावलम्बन युग में होगा। उनकी दीर्घजीविता और उनके छेदों के आकार प्रकार पर भी अध्ययन होगा।

गांवदेहात में एक कहावत है – बैठी बानिन का करे, एंह कोठी क धान ओंह कोठी (बैठाठाला व्यक्ति ऐसे ही छुटपुट काम करता है!)। :lol:

स्वावलम्बन के प्रयोग।

पत्नीजी मेरे इस प्रयोग पर कोई आशावाद नहीं दिखातीं। उनका सोचना है कि यह कुछ दिनों का जोश है। इसके आधार पर एक आध ब्लॉग पोस्ट लिख मारी जायेगी। उसके बाद यह सोचा जायेगा कि साल में दो तीन बनियान का अतिरिक्त खर्च कोई बड़ी बात नहीं। फिर घुटने में दर्द भी होने लगेगा। किसी न किसी बहाने स्वावलम्बन के प्रयोग खत्म हो जायेंगे! :lol:


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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