उज्जैन के रेलवे गुड्स यार्ड की यादें

उज्जैन गुड्स यार्ड, जिसे एन सी यार्ड कहा जाता था, ने मुझे रेलवे संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखाया। एन सी यार्ड का मतलब था Newly Constructed Yard. नया बना होगा, पर बहुत जल्दी रेलवे का फुटकर लदान का युग खत्म हो गया। … उज्जैन ही नहीं; पूरी रेलवे के यार्ड अपनी महत्ता खो बैठे।


सन 1985-86 का समय। रेलवे पच्चीस तीस प्रतिशत यातायात वैगन लोड में लदान करती थी और उसे पटरी पर पूरे रेक के रूप में चलाने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। गुड्स शण्टिंग यार्ड जिंदा थे। रेलवे की प्रोबेशनरी ट्रेनिंग में मैंने बहुत सा समय रेलवे गुड्स यार्डों की कार्यप्रणाली समझने में लगाया था। देश के पूर्वी भाग में अण्डाल, और धनबाद से जुडी रेल कोल लोडिंग साइडिंग्स, कोट्टवालसा – किरंदुल रेल खण्ड की यात्रा और बछेली यार्ड आदि अनुभव अभी भी दिमाग में हैं। उनका मस्तिष्क में दर्ज समय गड्डमड्ड हो सकता है। मेरे नोट्स जो काफी सालों तक मेरे सामान में रहे; तबादलों के दौरान कालांतर में कहीं इधर उधर हो गये हैं। अन्यथा बेहतर तरीके से उनके बारे में लिख सकता।

कोट्ट्वालसा – किरंदुल रेल लाइन, चित्र विकीपेडिया से

मेरा मूल रेलवे पश्चिम रेलवे है; अत: वहां कई यार्ड देखे और ट्रेनिंग में काफी घिसाई की। कोटा रेल मण्डल में ट्रेनिग करते हुये मैंने दिल्ली का तुगलकाबाद यार्ड चार-छ दिन घूम घूम कर देखा। मुझे अब भी याद है कि दिन भर ट्रेनिंग के बाद जब चीफ यार्ड मास्टर वेद प्रकाश जी (आशा है, उनका नाम ठीक से ले रहा हूं) यार्ड ऑफिस में एक कप चाय और एक बालूशाही के साथ आधे घण्टे अपने अनुभव सुनाते थे तो अपना रेलवे के साथ जुड़ाव मजबूत होते पाता था! मैंने उस मण्डल की ट्रेनिंग में आगरा ईस्ट बैंक, जमुना ब्रिज, ईदगाह, गंगापुर और सवाई माधोपुर यार्ड एक कोने से दूसरे कोने तक घूम घूम कर देखे और उनकी शंटिंग का अनुभव किया। शंटिंग इंजनों – स्टीम और छोटे डीजल शंटिंग इंजनों पर भी चढ़ा। शौकिया तौर पर बॉयलर में कोयला भी झोंका। कालांतर में जब मैं कोटा मण्डल का वरिष्ठ परिचालन प्रबंधक बना तो वह पुरानी ट्रेनिंग मेरे बहुत काम आयी।


Header Photo by Neelkamal Deka on Unsplash


पर मेरी पहली पोस्टिंग रतलाम मण्डल में सहायक परिचालन अधीक्षक के रूप में हुई थी। रहने को रतलाम स्टेशन पर एक पुराना सैलून मिला था। उसका फायदा यह था कि एक अटेण्डेण्ट मिल गया था जो (अपनी भयंकर दारू पीने की आदत के बावजूद) अच्छे से मेरे मन माफिक सादा भोजन बनाता था और जब तब तलब लगने पर चाय पिलाया करता था।

नौकरी ज्वाइन करने के बाद दूसरे या तीसरे दिन मुझे उज्जैन यार्ड जाने को कहा गया। 111 नम्बर सवारी गाड़ी में मेरा चार पहिये का सैलून लगा। जो चार पहिये और पुरानी तरह की स्प्रिंग के कारण बहुत हिलता था। उसमें यात्रा करना एक सजा की तरह होता था। रात की यात्रा में सैलून में हिलते डुलते मैं उज्जैन पंहुचा। नींद अच्छे से आयी नहीं थी।

नयी नौकरी में अपने आप को “प्रमाणित” करने का जोश इतना था कि मैं बहुत जल्दी ही गुड्स यार्ड में पंहुच गया। उज्जैन स्टेशन के पूर्वी किनारे पर बना वह यार्ड पच्चीस लाइनों का था, और वैगनों से भरा था। मुश्किल से दो चार रेल लाइनें खाली थीं। इंजन को एक ओर से दूसरी ओर ले जाने के लिये भी एक ही लाइन खाली थी!

यार्ड का मुख्य काम भोपाल की ओर से आने वाली तीस बॉक्स वैगन की कोयले की ट्रेनों को यार्ड में ले कर चालीस वैगनों की ट्रेन बना कर रवाना करना था। इसके अलावा दिन भर में पांच छ मिक्स्ड लोड (फुटकर लदान के वैगनों से बनी ट्रेनें) यार्ड में आते थे, जिनकी छ्न्टाई कर अलग अलग दिशाओं की ट्रेनें बनानी पड़ती थीं। मुझे जल्दी ही समझ आ गया कि अच्छे (और मेहनती) यार्ड मास्टर, मूवमेण्ट इंस्पेक्टर आदि की टीम के बावजूद यार्ड बहुत अच्छी तरह काम नहीं कर रहा था। शण्टिंग की अधिकता, वैगनों के कैरिज-वैगन परीक्षण में लगने वाला समय और उसमें वैगनों का ‘सिक’ किया जाना, अन्य विभागों से तालमेल और मण्डल के परिचालन की समस्याओं के प्रभाव यार्ड की वर्किंग पर थे। महीने में एक या दो बार ऐसा अवसर आता था कि यार्ड वैगनों-ट्रेनों से ‘पैक’ हो जाता था और उसकी सहायता के लिये माल गाड़ियां यार्ड में लेने की बजाय बाई-पास करनी होती थीं।

दो मूवमेण्ट इंस्पेक्टर/चीफ यार्ड मास्टर मुझे अब भी परिवार के अंग की तरह याद हैं। आर एस सोढ़ी सिक्ख थे और अय्यर दक्षिण भारतीय होने के बावजूद बहुत अच्छी हिंदी बोलते थे। इन दोनो से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। महीने में पांच छ दिन तो मैं वहां पंहुचा ही रहता था। मैं अपने को यार्ड का अंग सा मानने लगा था।

यार्ड में बहुत समय व्यतीत करने के कारण मैं उज्जैन यार्ड का ‘एक्सपर्ट’ जैसा हो गया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि ई. श्रीधरन (कोंकण और मैट्रो रेलवे ख्याति वाले) बतौर पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक उज्जैन यार्ड आये थे और यार्ड ऑफिस की दीवार पर बहुत ऊंचे टंगे यार्ड डायग्राम के आधार पर यार्ड कार्यप्रणाली समझाने के लिये मैंने एक लम्बी लकड़ी हाथ में प्वाइण्टर की तरह ली थी। श्रीधरन बहुत बारीकी से किसी भी विषय को समझा करते थे। उस प्वाइण्टर से यार्ड की पच्चीस लाइनों को अपने कद (पांच फुट साढ़े तीन इंच) और डायग्राम की ऊंचाई के कारण मैं अलग अलग चिन्हित नहीं कर पा रहा था। लिहाजा मैंने बिना झिझक जूते उतारे और यार्ड ऑफिस की टेबल पर खड़े हो कर दस पंद्रह मिनट का प्रेजेण्टेशन यार्ड वर्किंग के बारे में महाप्रबंधक महोदय को दिया। नौजवान था मैं। जोश था और महाप्रबंधक जैसे शीर्षस्थ अधिकारी का भय नहीं था मुझमें। अन्यथा, कोई भी अन्य अधिकारी इस तरह की “भदेस” प्रेजेंटेशन तकनीक की कल्पना नहीं कर सकता था। 🙂

पर श्रीधरन जी ने मेरी प्रशंसा की और बाद में मण्डल रेल प्रबंधक महोदय ने भी कहा – जीडी, बहुत बढ़िया किया तुमने!

उज्जैन गुड्स यार्ड, जिसे एन सी यार्ड कहा जाता था, ने मुझे रेलवे संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखाया। एन सी यार्ड का मतलब था Newly Constructed Yard. नया बना होगा।

पर बहुत जल्दी रेलवे का फुटकर लदान का युग खत्म हो गया। कोयला लदान के वैगन भी बेहतर बनने लगे। ट्रेनें तीस बॉक्स वैगनों की बजाय पहले चालीस और फिर 56-58 बॉक्स-एन वैगनों की होने लगीं, जिनकी यार्ड में ले कर चालीस या पैंतालीस डिब्बों की ट्रेन बनाने की आवश्यकता ही नहीं रही। और उज्जैन यार्ड अप्रासंगिक हो गया। उज्जैन ही नहीं; पूरी रेलवे के यार्ड अपनी महत्ता खो बैठे। सबसे दयनीय दशा तो मुगल सराय यार्ड की सुनने में आती थी जो एक तरफ बना और दूसरी तरफ बनते ही अप्रासंगिक होने लगा था!

मेरे रतलाम मण्डल में जाने के बाद एक दशक भर लगा यह परिवर्तन होने में।

अनेकानेक यादें जुड़ी हैं उज्जैन गुड्स यार्ड और रतलाम-उज्जैन की लगभग नियमित यात्राओं की। और वे सब एक ब्लॉग पोस्ट में समेटी नहीं जा सकतीं।

(उस जमाने में डिजिटल कैमरा नहीं था। मेरे पास चित्र नहीं हैं। जो चित्र पोस्ट पर लगे हैं वे इधर उधर से प्रतीकात्मक रूप से लगाये गये हैं।)


रेणु की “एक आदिम रात्रि की महक” से उभरी रेल यादें

उसी दौरान मैं माही नदी के किनारे बहुत घूमा। उसके दृष्य अभी भी याद हैं। माही नदी में एक बरसाती नदी “लाड़की” आ कर मिलती थी। मेरे मन में यह भी साध बाकी रही कि चल कर लाड़की का उद्गम स्थल देखूं।


एक सज्जन ने मुझे भुवन शोम देखने को कहा, तो दूसरे ने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी एक आदिम रात्रि की महक पढ़ने की सलाह दी –

वात्स्यायन जी ने फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की एक आदिम रात्रि की महक की बात की

और मुझे लगा कि वास्तव में मैंने कितना कम पढ़ा या देखा है! खैर, हिंदी समय पर ‘रेणु’ जी की कहानी मिल गयी और वही नहीं, कई और भी मैंने डाउनलोड कर इत्मीनान से किण्डल पर पढ़ीं।

हिंदी समय के पन्ने पर ‘रेणु’ जी की सात कहानियां थीं। ये सातों एक वर्ड डॉक्यूमेण्ट बना कर किण्डल पर सहेज लीं। एक पुस्तक का मजा देने वाला प्रयोग। यह अमेजन पर खरीदने पर ढाई-तीन सौ लगते!


खैर, मुद्दे की बात; रेणु की कहानी में रेलवे के छोटे स्टेशन का वातावरण तो है। करमा जैसा चरित्र मैंने देखा नहीं, शायद ध्यान देता तो मिल जाता। पर यहीं कटका स्टेशन पर लखंदर है। मास्टर साहब हजार डेढ़ हजार की एवजी में उसे रखते हैं। स्टेशन की सफाई करता है। यहां तो नहीं, पर अपनी नौकरी के दौरान कई एवजी (दिहाड़ी वाले या कॉट्रेक्ट कर्मी) बड़े स्मार्ट देखे हैं मैंने। ब्रांच लाइन पर तो ब्लॉक वर्किंग और सिगनल एक्स्चेंज भी कर लेते हैं – ऐसा सुना है। उनके अथवा चतुर्थ श्रेणी के रेगुलर कर्मचारी से यह काम कराये जाने की रिपोर्ट होने पर मास्साब नप जाते हैं। पर ब्रांच लाइन में इस तरह का रिस्क दिलेर लोग ले ही लेते हैं यदा कदा।

छोटे स्टेशनों पर निरीक्षण करते इस तरह के दृष्य पर ध्यान देने और उसे मोबाइल कैमरे में लेने का शौक मुझे रहा है। रेल कर्मी अपना भोजन यूं भी बना लेते हैं प्लेटफार्म पर।

छोटे स्टेशन पर पनपते प्रेम-प्यार को देखने का अवसर नहीं मिला। मेरे साथ कम से कम चार पांच लोगों की “भीड़” रहती थी। उसमें निहायत व्यक्तिगत व्यवहार के दर्शन नहीं हो पाते। हां, नौकरी के शुरुआती दिनों में, जब गोधरा-रतलाम खण्ड का विद्युतीकरण का काम चल रहा था तो तीन ब्लॉक सेक्शन जिनमें सिंगल लाइन हुआ करती थी, वहां के काम को देखने के लिये फील्ड में मुझे जाना पड़ा।

वे लगभग जंगल के बीच के अनास, पंचपिपलिया और भैरोगढ़ थे। उन स्टेशनों पर मुझे हफ्तों रहना पड़ा। अनास स्टेशन पर, रात के एक बजे, यूं ही अकेले पटरी के किनारे दो किलोमीटर निकल गया। बीच का अनास नदी का पुल भी पार किया एडवेंचर के लिये। टपक जाता तो नीचे जल विहीन अनास नदी 25 – 30 मीटर नीचे थी। तब कोई मोबाइल होते नहीं थे। स्टेशन पर हल्ला मचा कि एओएस साहब गुम हो गये हैं। वह इलाका भील जनजाति का है और उनसे शहरी मानव के सम्बंध बहुत मधुर नहीं थे। कम से कम रेल स्टाफ वैसा ही समझता था कि अगर उनके चंगुल में मैं फंसता तो छिनैती करते और वह भी बिना मारे पीटे नहीं!

रात में दो-तीन कर्मचारी साथ में आरपीएफ रक्षक को ले कर मुझे ढ़ूंढने निकले। पर तब तक मैं दूसरी ओर के कैबिन में पंहुच गया था। उन सब ने राहत की सांस ली और मुझे समझाइश दी कि वैसा एडवेंचर रात में न करूं।

भैरोगढ़ स्टेशन पर चाय की गुमटी में बैठी वह किशोरी अभी भी मुझे याद है। वह किसी रेलवे कर्मी की बच्ची थी जो बहुत से बाहर से वहां आये कर्मचारियों को चाय पिलाया करती थी। उसी पर कुछ रेणु जी जैसे कथा बुनने की सम्भावना बनती थी।

उसी दौरान मैं माही नदी के किनारे बहुत घूमा। उसके दृष्य अभी भी याद हैं। माही नदी में एक बरसाती नदी “लाड़की” आ कर मिलती थी। मेरे मन में यह भी साध बाकी रही कि चल कर लाड़की का उद्गम स्थल देखूं।

इंजीनियरिंग विभाग के पीडब्ल्यूआई साहब का रजिस्टर का पोटला लादे चतुर्थ श्रेणी का कर्मी। रेणु इस पर खूब बढ़िया कहानी लिखते!

भैरोगढ़ स्टेशन पर चाय की गुमटी में बैठी वह किशोरी अभी भी मुझे याद है। वह किसी रेलवे कर्मी की बच्ची थी जो बहुत से बाहर से वहां आये कर्मचारियों को चाय पिलाया करती थी। उसी पर कुछ रेणु जी जैसे कथा बुनने की सम्भावना बनती थी। कोई भी जवान गैंग मैन या जूनियर पी डब्ल्यू आई भी उसके प्रेम में पड़ सकता था। उसकी चमकती आंखें और भरा शरीर अभी भी मुझे याद है। उसकी चाय की बिक्री खूब होती थी।


कृपया ब्लॉग सब्स्क्राइब करने का कष्ट करें। इससे आपको नयी पोस्टों की सूचना मिल सकेगी।


बहुत समय बाद; तीस साल बाद; रिटायरमेण्ट के समय मैं एक बार पुन: भैरोंगढ़ और माही नदी के समीप गया। और सांझ का दृष्य वैसा ही लगा, जैसा मेरे रेल के शुरुआती दिनों में था।

माही नदी किनारे शाम। चित्र 2015 का है।

पंचपिपलिया, जैसा नाम है, बड़े बड़े पीपल के वृक्षों से आच्छादित था। कहा जाता है कि भीम की पत्नी हिडिम्बा यहीं की थी। वहां मैं एक सप्ताह रहा। वह भी जंगल और ऊबड़ खाबड़ इलाका। पर हिडिम्बा तो क्या, किसी नारी की छाया भी नहीं दिखी। मेरे भीतर के रेणु को जगाने के लिये न सही मन था और न माहौल। मैं एक शुष्क रेल यातायात सेवा का सहायक ऑपरेशन अधीक्षक था। जिसे अपने विभाग में अपनी ‘धाक’ जमाने की ज्यादा फिक्र थी। 😦

फणीश्वर नाथ रेणु तो क्या, किसी भी स्तर का कथाकार बनने के गुण मुझमें नहीं थे। आगे विकसित होंगे? राम जाने! लेकिन ट्विटर पर वात्स्यायन जी ने जब कहानी पढ़ने के लिए अनुशंसा की थी तो इस लिए तो कदापि नहीं की होगी कि मैं अपने आप को रेणु जी से तुलना कर देखने लिखने लगूं।

उस कहानी ने इतनी यादें ताजा कीं, वही बहुत है। कहानी का ध्येय वही होता है!


मेरी रेलवे की यादों को कुरेदती फिल्म भुवन शोम

मैं अपने तनाव, शरीर और मन की उपेक्षा और रोज रोज की चिख चिख से अपने को असम्पृक्त नहीं कर सका। अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता।


मैंने दूसरी पारी की शुरुआत के विषय में लिखना प्रारम्भ किया तो एक सजग किंतु अनाम पाठक ने ट्विटर पर टिप्पणी की –

एग्रेरियन महोदय ने कहा कि मैं समय निकाल कर भुवन शोम देखूं

मैंने फिल्में बहुत ही कम देखी हैं। कई बार तो दशकों बीत गये बिना किसी फिल्म को देखे। जब नौकरी ज्वाइन की थी तो इस तरह के किस्से सुने थे कि फलाने साहब सिनेमा देखने गये और बीच में ही अनाउंसमेण्ट कर उन्हें रेलवे की एमरजेंसी से निपटने के लिये सीधे कण्ट्रोल रूम में पंहुचने को कहा गया।

वह छोटा शहर (रतलाम) था। आपको ट्रेन कण्ट्रोल को बता कर जाना होता था कि कहां जा रहे हैं और आपको कैसे सम्पर्क किया जा सकता है। मोबाइल का जमाना नहीं था। बहुधा आप अगर रेलवे के तंत्र के बाहर हैं तो रेलवे नियंत्रण कक्ष से किसी न किसी को रवाना किया जाता था किसी भी एमरजेंसी की दशा में।

और वह मण्डल (रतलाम) ऐसा था कि एमरजेंसियाँ होती ही रहती थीं। ट्रेनों का पटरी से उतरना, वैगनों का ऊंचाई पर अन-कपल होना, रेलखण्ड का घण्टे भर से ज्यादा बिना सूचना के किसी अनहोनी से बंद रहना या फिर सीधे सीधे सवारी गाड़ी की दुर्घटना आम थे। दिल्ली और बम्बई से ट्रेने‍ सपाट रेल पर चलती चली आती थीं पर रतलाम – गोधरा खण्ड, जो सत्तर प्रतिशत गोलाई, टनल और ग्रेडियेण्ट पर था, वहां असली दिक्कत होती थी परिचालन की। … सो मैंने सिनेमा देखना ही बंद कर दिया। वही आदत अभी तक कायम है।

भुवन शोम में उत्पल दत्त

खैर, एग्रेरियन महोदय की सलाह पर मैंने “भुवन शोम” खोजी। किसी ओटीटी प्लेटफार्म पर नहीं मिली। यू-ट्यूब पर थी पूरी डेढ़ घण्टे की फिल्म। डाउन लोड की और देर रात तक देखी मोबाइल पर। काली-सफेद, 35 एमएम का पर्दा वाली फिल्म। धीरे चलने वाली। मारधाड़ विहीन। पर क्या गजब फिल्म! मृणाल सेन और उत्पल दत्त तो कालजयी हैं! बनफूल (बलाई चंद मुखोपाध्याय) की कहानी पर बहुत जानदार फिल्म बनाई है उन्होने।

भुवन शोम में पक्षियों की तलाश में गंवई पोशाक में उत्पल दत्त और गौरी (सुहासिनी मुळे)

और फिल्म भी मेरे पुराने विभाग, रेलवे के इर्दगिर्द है। रेल की सम्भवत: यातायात सेवा का अफसर है भुवन शोम (उत्पल दत्त)। काम के बोझ से उकता कर एकबार पक्षियों के शिकार पर निकलता है। छोटे से स्टेशन पर टिकेट कलेक्टर है साधू मेहर। उसकी चार्जशीट लगभग तय कर चुका है भुवन शोम। भ्रष्टाचरण के सिद्ध चार्ज में वह नौकरी से हाथ धो बैठेगा।

पक्षियों की तलाश में उत्पल दत्त जिस गांव में जाता है वहां उसकी सहायता को मिलती है लड़की गौरी (सुहासिनी मुळे), जिसका गौना साधू मेहर से होने वाला है। सरल, निश्छल गौरी उत्पल को बहुत प्रभावित करती है और वापस जा कर वह अधिकारी साधू मेहर को बुला कर डांट लगाता है, पर उसकी चार्जशीट रद्द कर देता है।

भयभीत, पर भ्रष्ट साधू मेहर। उसको उत्पल दत्त डांटता है, पर चार्जशीट रद्द कर देता है।

फिल्म सरकारी अफसर की मोनोटोनी, ऊब, मानवीय सम्वेदना और अपनी कड़े अफसर की ओढ़ी इमेज के अनुसार स्वयम को प्रमाणित करने की चाह (या जिद) को बखूबी दर्शाती है। उत्पल दत्त की जगह लगभग पूरे फिल्म के दौरान मैं अपने को देखता रहा। और उसने बहुत सी यादें कुरेद दीं। (बाई द वे; कुरेदना, सुरसुरी या गुदगुदी का एक प्रसंग भी फिल्म में है जिसमें गाड़ीवान बैलोंंको उनके पृष्ठ भाग में सुरसुराता-खोदता है जिससे वे तेज दौड़ें।)

शिकार करने गया उत्पल दत्त। उनकी गोली से कोई चिड़िया नहीं मरती!

मुझे याद हो आयीं अपने द्वारा दी गयी या निपटाई चार्जशीटें। जब मैंने असिस्टेण्ट डिविजनल ऑपरेशंस सुपरिण्टेण्डेण्ट (एओएस) के रूप में ज्वाइन किया था तो मेरी टेबल पर सौ से ज्यादा चार्जशीटें थीं; जिन्हे मेरे पहले वाले अफसर जारी कर गये थे और वे पेण्डिंग थीं। वे सभी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की चार्जशीटें थीं। नौकरी से गायब रहना, हुक्म न मानना, दारू पी कर ड्यूटी करना, मारपीट, एक से ज्यादा पत्नी होना, यात्रियों से अभद्र व्यवहार आदि अनेक विषय उनमें दर्ज थे।

ट्रेन ऑपरेशंस का जो बोझ था, उसके सामने इन चार्जशीटों का निपटारा करना अंतिम वरीयता रखता था। विभाग में मेरे ऊपर के अफसर इस बात की फिक्र नहीं करते थे कि कितनी चार्जशीटें मैंने निपटाईं। उनकी वरीयता ट्रेन का परिचालन थी। केवल एस्टेब्लिशमेण्ट अधिकारी के रिपोर्ट पर, जिसमें हर अफसर के नाम के आगे उनके पास पैण्डिंग चार्जशीटों के आंकड़े होते थे, मण्डल रेल प्रबंधक जरूर कहा करते थे। एक दो डिस्प्लेजर नोट भी दिये उन्होने। पर चूंकि व्यक्तिगत रूप से वे मुझे बहुत पसंद करते थे; उनके डिस्प्लेजर नोटों की ज्यादा फिक्र नहीं करता था मैं।

और फिक्र करता भी तो क्या? मेरे पास यातायात परिचालन की चौबीसों घण्टे की ड्यूटी के आगे समय ही नहीं बचता था कि चार्जशीटों का निपटारा करूं। मैंने काम के बोझ में अपने परिवार की ओर भी बहुत कम ध्यान दिया। उसका उलाहना मेरा परिवार अब भी देता है और वह अब भी मुझे कचोटता है।

दारू पी कर ड्यूटी करना मेरी निगाह में बहुत बड़ा गुनाह था। शायद इस लिये भी कि मैंने कभी शराब छुई नहीं। मैंने दो तीन कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया इस चार्ज पर। और बहुत हल्ला मचा। यूनियन वाले भी चिल्लाये। मेरे सीनियर (जो बहुत कुशल अधिकारी थे पर बहुत ज्यादा शराब के शौकीन भी थे) ने मुझसे कहा – “यार, तुम तो गजब अफसर हो। दारू पीने पर नौकरी ले लेते हो।” जाहिर है, उन्होने सभी मामलों में अपील पर नौकरी से निकालने की सजा रद्द कर दी, पर थोड़ा बहुत प्रसाद तो देना ही पड़ा कर्मचारियों को!

लेकिन मेरे व्यक्तित्व की प्रारम्भिक सालों की कड़ाई ज्यादा टिकी नहीं। मैं यह समझ गया कि चार्जशीट देना दुधारू तलवार है। उससे अपना भी काम बहुत बढ़ता है। चार्जशीट देने की बजाय मौके पर डांटना, फटकारना, फजीहत कर भूल जाना कहीं बेहतर है। और, इसके उलट कर्मचारियों को उनकी गलती बता कर सुधारना और भी बेहतर।

डांटने फटकारने के लिये मुझे “थानेदारी” भाषा सीखनी पड़ी। भीषण अपशब्द तो मेरी भाषा में नहीं आये, पर व्यंग और आवाज की पिच बढ़ाने से वह प्रभाव डालने में अधिकांशत: सफल रहा।

समय के साथ व्यक्तित्व के खुरदरे पत्थर घिस कर पर्याप्त चिकने बन गये। समय ने और मेरे बेटे की दुर्घटना ने मुझे बहुत सिखाया।

मेरे जूते उतारने के पौने दो साल पहले जब मैं गोरखपुर में परिचालन विभाग का अध्यक्ष बना तो मेरे पूर्ववर्तियों द्वारा अनुशासनात्मक प्रक्रिया के लगभग तीस अपील के मामले पेण्डिंग थे। पहले के कई विभागाध्यक्ष उन्हे बिना निपटाये चले गये थे। अपने गोपनीय सचिव रमेश चन्द्र श्रीवास्तव जी की विशेष सहायता से (उन्होने नियमों, धाराओं और पूर्व में निपटाये मामलों को बड़ी दक्षता से नत्थी कर मुझे निर्णय लेने में सहायता की) एक एक कर उन अपीलों का निपटारा किया। येे अपील कर्मचारी के लिये विभागीय सुप्रीम कोर्ट के समान थीं। मुझसे ऊपर कहीं सुनवाई उनके लिये सम्भव नहीं होती।

मैंने लगभग हर एक मामले में सहृदयता खुले दिल से दिखाई। कुछ उसी तरह, जिस तरह उत्पल दत्त ने साधू मेहर की चार्जशीट फाड़ कर दिखाई थी। मेरा यह कृत्य मेरे रेल के प्रारम्भिक दिनों से 180 डिग्री उलट था। मैं अपने में काफी बदलाव ला चुका था।

मुझे सहृदय बनाने के लिये कोई रेल के इतर घूमने और वहां किसी गौरी (सुहासिनी मुळे) से मिलने का अवसर नहीं मिला; पर समय के थपेड़ों ने वह काम बखूबी किया। हां, वह सब इतना धीरे धीरे हुआ कि मुझे पता भी न चला। रिटायर होने के बाद जब मैंने अपने व्यवहार का विश्लेषण किया तो पाया कि दो ढाई दशकों में वह बदलाव आया। वह ऐसे आया कि मैं अपने तनाव, शरीर और मन की उपेक्षा और रोज रोज की चिख चिख से अपने को असम्पृक्त नहीं कर सका। अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता। नींद के लिये दवाई लेने की आदत छूट चुकी होती। हाइपर टेंशन, मधुमेह आदि न होते और एक दशक में चार बार अस्पताल में भरती होने की नौबत न आती।

पर जो होना था, वह हुआ! अपनी गलतियां सुधार कर नये सिरे से दूसरी पारी खेली जा सकती है, पर पहली पारी फिर खेलने को तो नहीं मिलती, किसी को भी।

“अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता। नींद के लिये दवाई लेने की आदत छूट चुकी होती। हाइपर टेंशन, मधुमेह आदि न होते और एक दशक में चार बार अस्पताल में भरती होने की नौबत न आती।”

दूसरी पारी की शुरुआत – पहला दिन

मजेदार बात यह रही कि मेरे फोन नम्बर पर दो तीन अधिकारियों-कर्मचारियों के फोन भी आये। वे मुझे माल गाड़ी की रनिंग पोजीशन बता रहे थे। मैं तो रेलवे को छोड़ रहा था, पर वे मुझे छोड़ना नहीं चाह रहे थे।


दूसरी पारी का पहला दिन यानी एक अक्तूबर 2015।

मैं 30 सितम्बर 2015 को रिटायर हुआ। उस समय मैं पूर्वोत्तर रेलवे का परिचालन प्रमुख था। रिटायरमेण्ट से एक दो साल पहले से शुभचिंतकों के सुझाव थे कि मैं अपने जूते न उतारूं। साठ साल की उम्र घर बैठने की नहीं होती। उसके बाद भी किसी न किसी हैसियत में काम करना चाहिये। पर मैं सोचता था, रोज रोज खटने का काम बहुत हुआ। मेरा शरीर और उससे ज्यादा मेरा मन दिनचर्या में व्यापक बदलाव चाहता था। शायद आराम भी।

मैं मूलत:, अपनी प्रवृत्ति के हिसाब से, एक छोटी जगह का आदमी हूं। मेरा जन्म गांव में हुआ और छोटे शहरों, कस्बों में रहना मुझे भाया। मेरे पिताजी दिल्ली, राजस्थान में जोधपुर और नसीराबाद (अजमेर के पास छावनी), पंजाब में ऊंची बस्सी (पश्चिमी-उत्तरी पंजाब की एक गांव में छावनी), और चण्डीगढ़ में रहे। जोधपुर, नसीराबाद और ऊंची बस्सी मुझे छोटी जगहों के अहसास देते रहे। फिर मेरी उच्च शिक्षा पिलानी में हुई। बिरला तकनीकी और विज्ञान संथान (BITS -बितविस) भी कोई मैट्रो में नहीं था; पिलानी गांव ही था। रेल की नौकरी में भी बड़ा समय मैंने रतलाम जैसे छोटे शहर में काटा। सत्तरह से अधिक साल वहां रहा। इसके अलावा कोटा या उदयपुर में भी रहा पर वहां भी अपने रेल परिसर में ही रहा, शहर बहुत कम देखा। रेल परिसर एक छोटा शहर या गांव ही होता है।

मुझे फुसला कर 1994 में बम्बई पोस्ट किया गया था। चर्चगेट में अच्छा दफ्तर था। महत्वपूर्ण पद और कोलाबा (बधवार पार्क) में एक फ्लैट का अलॉटमेंट। फ्लैट की चाभी मेरे जेब में थी और चर्चगेट पर दो कमरे के रेस्ट हाउस में रह रहा था। ऐसी पोस्टिंग पाने की कल्पना से ही बहुत से अधिकारियों का मन-मयूर नाच सकता है। पर मुझे बम्बई रास नहीं आयी। मैंने कोटा रेल मंडल में वरिष्ठ परिचालन प्रबंधक में पोस्टिंग जुगाड़ी और महानगर को नमस्कार कर पोस्टिंग ऑर्डर हाथ में आते ही, दो घण्टे में वह पद और वह स्थान त्याग दिया। बमुश्किल दो महीने रहा बम्बई में!

अधिकारियों ने कहा कि मुझसे बड़ा बेवकूफ़ नहीं हो सकता। पर बड़े शहर का मुझे फोबिया था। और इस तरह बड़े शहर के फोबिया ने कई बार लोगों को मुझे बेवकूफ़ कहने का अवसर प्रदान किया।

शायद यह शहरों का फोबिया ही था कि रिटायरमेण्ट के पहले मैंने गांव में बसने की तैयारी शुरू कर दी । एक साल पहले से साइकिल खरीद कर चलाने का अभ्यास किया। अपनी ससुराल के गांव में बसने का निर्णय लिया – वह जगह नेशनल हाईवे और रेलवे स्टेशन के पास थी। वहां रिटायरमेण्ट से एक साल पहले जमीन खरीदी और अपने साले साहब (भूपेंद्र कुमार दुबे) को मकान का नक्शा और आर्थिक रिसोर्स दिये। सब कुछ इस तरह से सिन्क्रोनाइज किया कि रिटायरमेण्ट के समय मकान बन कर तैयार रहे उसमें शिफ्ट होने के लिये।

तीस सितम्बर को मैं गोरखपुर से सेवा निवृत्त हुआ और अगले ही दिन चौरी चौरा एक्स्प्रेस से माधोसिंह स्टेशन पर पूरे परिवार और सामान के साथ पंहुच गया। गोरखपुर शहर से मुझे रेल के इतर लगाव नहीं था और रेल की नौकरी खत्म तो लगाव का निमित्त भी जाता रहा। गांव मुझे खींच रहा था। सो वहां एक भी दिन वहां रुका नहीं।

आत्मकथ्य, इसी पोस्ट से

पर वैसा हुआ नहीं। लगभग एक महीने की देरी हुई मकान बन कर तैयार होने में। ऐसे में मेरे वाराणसी मण्डल के मित्र प्रवीण पाण्डेय की सहायता से मुझे गांव के पास के बड़े रेलवे स्टेशन माधोसिंह स्थित रेलवे रेस्ट हाउस में रहने की अनुमति मिल गयी।

माधोसिंघ स्टेशन, सवेरे के धुंधलके में। दो अक्तूबर 2015 का चित्र।

तीस सितम्बर को मैं गोरखपुर से सेवा निवृत्त हुआ और अगले ही दिन चौरी चौरा एक्स्प्रेस से माधोसिंह स्टेशन पर पूरे परिवार और सामान के साथ पंहुच गया। गोरखपुर शहर से मुझे रेल के इतर लगाव नहीं था और रेल की नौकरी खत्म तो लगाव का निमित्त भी जाता रहा। गांव मुझे खींच रहा था। सो वहां एक भी दिन वहां रुका नहीं। ट्रेन में ही एक पार्सल वान लगा था, जिसमें मेरा घर का सारा सामान था। एक साथी अधिकारी धीरेन्द्र कुमार जी इलाहाबाद निरीक्षण पर जा रहे थे, तो उन्ही के सैलून में मुझे और मेरे परिवार (मेरी पत्नीजी और पिताजी) को जगह मिल गयी थी। खण्ड के यातायात निरीक्षक भोला राम जी ने हमारी अगवानी की। सामान उतरवाया। गाड़ी उस प्रक्रिया में आधा घण्टा खड़ी रही। पर ट्रेन समय से पहले पंहुच गयी थी माधोसिंह तो उसने यह टाइम कवर कर लिया और इलाहाबाद समय पर ही पंहुची।

मेरे साथ रेलवे के निरीक्षण यान में यात्रा कर रहे मनीश कुमार (जो मेरे लगभग पौने दो साल से सहायक और अटैच्ड निरीक्षक थे) तथा अपने चपरासी राम मिलन से ट्रेन के माधोसिंह से रवाना होते समय गले मिला तो लगा कि एक लम्बा युग समाप्त हो गया!

साफ सफाई की जा चुकी थी माधोसिंघ रेस्टटहाउस की। पहली ही नजर में वह स्थान मुझे बहुत भा गया। स्टेशन प्लेटफार्म से रेस्ट हाउस तक छोटी झाड़ियां थीं और उनके बीच पतली पगडण्डी से गुजरते समय बड़ी मधुर सुगंध आ रही थी। पौधों को ध्यान से देखा तो उनमें पाया कि वन तुलसी बहुतायत से थी। अपनी साइकिल निकाल कर माधोसिंह की रेलवे कालोनी का एक चक्कर भी लगा आया। कालोनी भी छोटी और सुंदर लगी। सड़क और पगडण्डियां साफ थीं। बरसात खत्म होने के कारण झाड़ियां – मुख्यत: वनतुलसी और उसके जैसी एक और झाड़ी जिसमें गंध नहीं थी, पर मंजरी वाले फूल थे, बहुतायत से थीं। लोगों ने अपने अपने क्वार्टर के आसपास सब्जियां उगा रखी थीं।

इन सब के बीच मुझे अगले दो तीन सप्ताह गुजारने थे।

रेस्ट हाउस के दो कमरों में हमारा सामान व्यवस्थित किया गया। भोला राम जी ने एक गैस सिलिण्डर का इंतजाम कर दिया था। सो किचन भी व्यवस्थित हो गयी। घर व्यवस्थित करने के लिये मेरा पुराना बंगलो पियुन मोनू (जो अब वाराणसी मण्डल में प्रवीण पाण्डेय के यहां पदस्थापित था) हमारी सहायता कर रहा था। रिटायरमेण्ट, रेलवे स्टेशन की सुविधा, रेस्ट हाउस और पुराना बंगलो पियून – कुल मिला कर रिटायरमेण्ट के अगले दिन बहुत अधिक डिसकण्टीन्यूटी नहीं थी। मजेदार बात यह रही कि मेरे फोन नम्बर पर दो तीन अधिकारियों-कर्मचारियों के फोन भी आये। वे मुझे (जैसा कल तक बताया करते थे) माल गाड़ी की रनिंग पोजीशन और सवारी गाड़ियों की पंक्चुअलिटी बता रहे थे। मैं तो रेलवे को छोड़ रहा था, पर वे मुझे छोड़ना नहीं चाह रहे थे। एक तरह से यह अच्छा लगा; पर इतना स्पष्ट था कि रेलवे के रूटीन और कम्फर्ट जोन से जितना जल्दी मैं अपने को मुक्त कर लूं; उतना बेहतर होगा।

सुबह शाम सुहावनी थी, पर दिन में गर्मी हो गयी। कूलर का इंतजाम था। बिजली की सप्लाई अनियमित थी तो उसके बैक अप के लिये स्टेशन मास्टर सतीश जी स्टेशन का जेनरेटर चलवा रहे थे। मेरे पिताजी को कुछ अटपटा सा लग रहा था नयी जगह पर। लेकिन वे तेजी से अपने को व्यवस्थित कर रहे थे।

दूसरी पारी का पहला दिन अच्छा ही रहा।