शहद खरीदने गया था, लौटते समय अपने विश्वासों की भी जाँच साथ ले आया। कल मैं स्थानीय मधुमक्खी पालक विकास पांडे के यहाँ से तीन किलो शहद लेकर लौटा। कीमत थी ₹400 प्रति किलो। चार-पाँच वर्ष पहले जब उनसे शहद लेना शुरू किया था, तब यही शहद ₹305 प्रति किलो मिलता था। कीमत बढ़ी तोContinue reading “मधुमेह के युग में शहद ज़रूरी है क्या?”
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मेरे बाबा का समय
एक पोते की स्मृति और अपना ही भविष्य टटोलने की कोशिश। मैं छोटा था। चार साल का। बब्बा एक लाठी लिए, धोती-बंडी पहने स्कूल को निकलते थे। पास के गांव शम्भू के पूरा में प्राइमरी के हेड मास्टर थे। बच्चे बहुत डरते थे। बड़े भी उन्हें आते देख पगडंडी से नीचे उतर जाते थे। अपनेContinue reading “मेरे बाबा का समय”
पूर्वांचल की ग्रे नैतिकता — एक ऑबिच्युरी से उपजा आत्मसंवाद
एक सज्जन ने मुझे फोन किया। “जीडी, तुमने अमर उजाला देखा? सबसे ऊपर एक छोटे से कस्बा नुमा शहर के आदमी के देहावसान पर पूरे पेज का विज्ञापन है। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि मडीयाहू जैसे कस्बे के आदमी का दस-पंद्रह लाख खर्च कर कोई ऑबीच्यूरी छपायेगा।” अमर उजाला मेरे घर आताContinue reading “पूर्वांचल की ग्रे नैतिकता — एक ऑबिच्युरी से उपजा आत्मसंवाद”
