जो गलती से लगी, वह दिशा बन गई
नीलकंठ चिंतामणि उमादास को भूल ही गये थे। पर आज सवेरे जब फोन पर रात दो बजे की एक मिस्ड कॉल देखी, और नम्बर के आखिरी अंक 2848 पर नज़र पड़ी — तो एक धुंधली स्मृति तैर गई।
“यह तो वही चित्रकूट जाने वाला यात्री लगता है,” मन ने कहा। बरगद के नीचे मिला था, और वहीं इस नम्बर पर एक रिंग कर पुष्टि की थी कि फोन रीचार्ज हुआ।
अब नीलकंठ के पास काम की आपाधापी नहीं है, समय खूब है, इसलिये मन के कोने में उमादास के लिए हल्की चिन्ता उमड़ आना हो ही गया।
जब नहीं रहा गया तो उस नम्बर पर रिंग कर दिया।
बहुत देर घंटी जाने पर उत्तर मिला —
“नारायण, नारायण! कौन महानुभाव बोल रहे हैं?”
“मैं नीलकंठ। उस दिन हनुमान टेकरी पर बरगद के नीचे आपको चाय पिलाई आपके साथ चाय पी थी। आज दो बजे रात में आपका मिस कॉल देखा…”
“फोन नहीं किया था, जी। थैले में नीचे पड़ा था — बटन दब गया होगा। ढाबे के राजू जी अपना मोबाइल भूल आये थे, उन्हीं की कृपा से यह चार्ज हो गया था शायद।”
“ढाबे में आप क्या कर रहे हैं?”
“पैर में मोच आ गई है। सूजन हो गई थी, तो राजू जी ने डाक्टर को दिखवाया। हड्डी नहीं टूटी, पर डाक्टर ने दो दिन चलने से मना किया है।”
“भोजन और रहने का ठिकाना ढाबे पर ही है?”
“जी। गुरूजी ने कहा था कि किसी से एक समय के भोजन से अधिक न लेना। तब मैने राजू जी से काम माँगा — उन्होंने बरतन धोने को कह दिया।
काम करते करते भजन भी हो जाता है… अच्छा लगता है।”
कुछ क्षण चुप रहने के बाद उमादास ने कहा —
“महानुभाव, कल गीता पढ़ते एक श्लोक मुझे मथ गया। आप बताएँगे?”
नीलकंठ गीता के कोई प्रामाणिक विद्वान नहीं हैं, फिर भी जिज्ञासा से पूछा —
“कौन-सा श्लोक?”
गीता का छोटा गुटका थैले से निकाल उमादास ने पढ़ा —
“योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥”
नीलकंठ थोड़ी देर मौन रहे।
फिर बोले —
“उमादास, तुमसे बड़ा ‘निराशी’ और ‘अपरिग्रही’ कौन होगा?
भोजन के बदले बरतन साफ कर रहे हो — यही तो उस श्लोक का जीता-जागता पाठ है।
इस पर तुम और मनन करो।
और हाँ, फोन को कभी-कभार चार्ज करते रहना। उपकरण बोझ नहीं होना चाहिये — वह तुम्हारे कम्बल की तरह सहायक हो।”
“जी, महानुभाव।
आप जैसे सनेही और सूझ देने वाले तो मेरे गुरुजी जैसे लगते हैं।
जैसा कहा, वैसा करूँगा।
नारायण, नारायण।”
इस पोस्ट को बनाने में चैट जीपीटी से संवाद का योगदान रहा है।
फोन पर बस इतनी ही बात हुई।
पर नीलकंठ को उमादास अब पहले से अधिक प्रिय लगा।
गीता का वही श्लोक उन्होंने किंडल में ढूँढ़कर हाईलाइट कर लिया।
ध्यान आया — बहुत दिनों बाद गीता को हाथ में लिया है, और वह भी उमादास के बहाने।
“योगी को चाहिए कि वह नित्य अपने मन को साधे, एकांत में स्थित होकर, अकेला, संयमित चित्त वाला, बिना किसी अपेक्षा और संग्रह के।”
क्या उमादास नीलकंठ को उसी योग की ओर तो नहीं ले जा रहा है?
बंगला, गाड़ी, वैभव और प्रभुता छोड़कर गंगा किनारे आ बसने का कारण यही तो नहीं था?
एक कौंध-सी हुई।
अब उमादास ही नहीं, नीलकंठ भी इस श्लोक पर मनन करेंगे।

आगे से मैने चैट जीपीटी को नीलकंठ और उमादास के चित्र इस तरह बनाने का अनुरोध किया है कि वे अलग थलग चित्र न लग कर एक पात्र लगें। अगली पोस्ट में देखते हैं कि वे क्या बनाते हैं।
ब्लॉग पोस्ट लेखन में कल्पना तत्व डालने का प्रयास चैट जीपीटी के साथ कम ही हो रहा है। अधिकांशत: लोग उससे शोध कार्य, उत्तर तलाशने और तरतीब से लिखने या स्प्रेडशीट आदि के लिये प्रयोग करते हैं। भारतीय परिवेश में कथा-कल्पना उसके लिये भी कुछ नया होगा। मुझे भी उत्सुकता है कि यह जुगलबंदी कितनी सार्थक निकलेगी!
आप चैट जी के उत्तर का एक अंश देखिये –

चैट जीपीटी ने जोड़ा – यह (उक्त प्रयोग) साहित्य में GPT का प्रयोग नहीं, बल्कि GPT के साथ साहित्य का प्रयोग है। जय हो रचनात्मक साहस की। नारायण नारायण! :-)

“आपको चाय पिलाई थी” के स्थान पर “आपके साथ चाय पी थी” कहने पर नीलकंठ का स्थान एक पायदान ऊपर होने की प्रबल संभावना थी।
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धन्यवाद, सुझाने के लिए! 😊 🙏
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जय हो नीलकंठ उमादास जी जय हो
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