होम-कल्पवास का ट्रायल रन लेना शुरू कर रहा हूं।
कल्पवास में तो प्रयागराज के संगम पर कुटिया बना माघ मास व्यतीत करने का अनुशासन है। पर कल पढ़ा कि सेमराधनाथ में भी लोग कल्पवास कर रहे हैं।
अर्थात कल्पवास में संगम-गंगा सानिध्य की मानसिक अवधारणा तो कहीं भी, किसी तरह की जा सकती है। … आर्जेंटीना या नैरोबी में रहने वाला राम प्रसाद पांडे भी अमेजन से ऑन लाइन गंगाजल मंगवा कर एक महीना एक कुटिया में कल्पवास कर सकता है!
और मेरे पास तो बेहतर ऑप्शन है। गंगाजी मेरे घर से 2 किलोमीटर दूर हैं। मैने तय किया कि घर के ऊपर के कमरे को मैं कल्पवास की कुटिया बनाऊंगा। अगले बारह साल फरवरी के मास में वहां होम-कल्पवास बिताऊंगा।
हो सकता है बारह साल का यह अनुशासन मुझे “पुनरपि जननम, पुनरपि मरणम” के चक्र से मुक्त कर दे। बिना संगम के, बिना मेला क्षेत्र के, बिना प्रयागराज के!
जैसे एक नई रेल पटरी बनती है तो उसपर कई बार लाइट इंजन रन किया जाता है जिससे ट्रैक रेलगाड़ी का अभ्यस्त हो जाये; उसी तरह मैने गंगा किनारे जा कर एक लीटर गंगाजल एकत्र किया।
कोलाहलपुर का गंगा करार काफी ऊंचा है। करीब तीस-चालीस फुट नीचे हैं गंगा। मैं कठिनाई से नीचे उतर रहा था तो पंडित दिख गया। वह राम उजागर है, पर अपनी साधु वृत्ति के कारण पंडित के नाम से जाना जाता है।
पंडित ने मेरे अनुरोध पर दौड़ते आ कर मेरी बोतल ली और गंगाजी से जल ले दौड़ते हुये मुझे ला कर दिया। पंडित की ऊर्जा ने मुझे होम-कल्पवास के लिये और प्रेरित किया!
आज सवेरे सवेरे उठ कर शौच के उपरांत गंगाजी की ओर मुंह कर, गुनगुने पानी में थोड़ा गंगाजल मिला कर स्नान किया।
इतनी सवेरे स्नान तो कई दशकों बाद किया होगा!
उसके बाद भगवान जी के सामने बैठा। थोड़ा ध्यान और फिर भग्वद्गीता की स्वामी चिन्मयानंद जी की टीका का पाठ प्रारम्भ किया।
यह तय किया कि एक दिन में दो तीन बार मिला कर उतना पढ़ा जायेगा जिससे एक मास में गीता पारायण-नोट टेकिंग और उसपर डायरी लेखन पूरा हो सके।
अभी तो आज नई पटरी पर लाइट इंजन रन है जो गिट्टी, मिट्टी, ट्रैक की रोलिंग करने के लिये है। अभी घर के ऊपरी कमरे की साफ सफाई हो रही है।
होम-कल्पवास के मॉडीफाइड नॉन-इंटरलॉक वर्किंग (NI Working – it is Railways terminology :-) ) नियम भी तय किये जा रहे हैं।
बारह साल का यह होम-कल्पवास का डीटॉक्स चलेगा। बारह साल में मैं 82 का हो जाऊंगा। तब तक शायद छोटा-मोटा ऋषि-मनीषी बन जाऊं। एक सामान्य आदमी का जीवन के तीसरे चेप्टर में ध्येय तो वही होना चाहिये।
देखें, क्या होता है!
[ चित्र – राम उजागर (पण्डित) गंगाजल ले कर आता हुआ और मेरे पास अपनी साइकिल पर बैठ मुझसे बात करता हुआ। ]


