इकराम अंसारी

सुपर मार्केट में मुस्लिम दंपति हेडर

वह आदमी दुबला सा, गौरैया जैसा था। ओरोंथोलॉजिस्ट सलीम अली की तरह— शांत, पर्यवेक्षक। स्पेंसर्स के सुपर बाजार में अपनी बुर्का पहने पत्नी के साथ। ट्रॉली नहीं लिये था, एक बास्केट में थोड़ा सामान लेने आये थे दंपति।

मेरी ओर देखा तो मैने कह दिया – आपकी पर्सनालिटी बहुत आकर्षक लग रही है।”

वे मुस्कुराए, बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया। नाम बताया—इकराम अंसारी। भदोही में ही रहते हैं। नया बाजार में।

उनकी उम्र उनकी पत्नी ने बताई 75 प्लस। मैने अपनी बताई – सत्तर प्लस। उनकी बेगम इस अचानक मुलाकात से खुश नजर आ रही थीं।

बस।
कोई धर्म-चर्चा नहीं।
कोई राजनीति नहीं।
कोई ज्ञान नहीं बघारा – न उन्होंने न मैंने।

अपरिचित व्यक्ति, पर एक छोटी बातचीत दोनो को प्रसन्न कर गई!

आजकल हिन्दू–मुसलमानों के बीच बड़ी खाई हो गई है। यह बात आंशिक रूप से सही भी है।
लेकिन मुझे लगता है—खाइयाँ नारे से नहीं, अनुभव से भरती हैं।

कभी अगर इकराम जी की किसी महफ़िल में हिन्दुओं को लेकर कड़वी बात चले, तो शायद वे इतना कह सकें—
“नहीं, एक सज्जन अच्छे भी मिले थे स्पेंसर्स के मार्केट में।”

और कभी मेरी किसी बातचीत में मुसलमानों को एक ही रंग में रंगने की कोशिश हो, तो मेरे दिमाग में भी इकराम साहब का ‘सलीम अली’ वाला चेहरा आ जाएगा।

समाज को जोड़ने का काम बड़े भाषण नहीं करते,
छोटे, सच्चे मानवीय क्षण करते हैं।

आज का दिन ऐसा ही एक छोटा क्षण दे गया।
बस, साझा कर लिया। 🌱

इकराम अंसारी और उनकी बेगम

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शायद समाज को जोड़ने के लिए हमें बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं होती।
कभी-कभी बस इतना काफ़ी होता है कि हम सामने वाले को पहले एक इंसान की तरह देखें,
फिर बाकी पहचानें अपने-आप अपनी जगह पर आ जाती हैं।
सुपरमार्केट जैसे साधारण स्थानों में, ऐसे साधारण क्षण
चुपचाप याद दिला जाते हैं कि सामाजिक रिश्तों की मरम्मत
अक्सर बहुत छोटे औज़ारों से हो जाती है।

आज का दिन ऐसा ही एक छोटा औज़ार दे गया।

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

5 thoughts on “इकराम अंसारी

  1. बस इतना काफ़ी होता है कि हम सामने वाले को पहले एक इंसान की तरह देखें,
    फिर बाकी पहचानें अपने-आप अपनी जगह पर आ जाती हैं। – बस!! इतना ही तो समझने को लोग तैयार नहीं है।

    आज ही किसी के घर गया था वो अपनी सोसायटी घूमा रहे थे और बड़े गर्व से बता रहे थे कि इस सोसायटी की अच्छी बात यह है कि इसमें किसी मुसलमान को घर नहीं दिया जाता – इसमें अच्छी बात क्या है यह मैं अब भी प्रोसेस करने में सक्षम नहीं हो पा रहा हूँ

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